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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

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चतुर्थ संस्करण की भूमिका
आज से 16 साल पहले 'बन्दी जीवन' का लिखना प्रारम्भ किया था ।
'बन्दी जीवन' के प्रथम संस्करण की भूमिका मे मैंने लिखा था 'मेरी अभी तक
यह धारणा है कि यह पुस्तक तीन खण्डों में समाप्त होगी, लेकिन कर्मक्षेत्र की
विषम उलझनों में पडकर मैं नहीं कह सकता कि इस पुस्तक का कितना अंश
लिख पाऊँगा । कारण आज तक जितने काम मैंने अपने हाथ मे लिए, किसी को
भी मैं निर्विघ्न रूप से पूर्ण नही कर पाया ।' ये वाक्य कलकत्ता में बैठे हुए 25
अगस्त, सन् '22 के दिन मैंने लिखे थे । अदृष्ट की क्या खूबी है कि इस पुस्तक के
दो भाग भी मैं यथार्थ रूप में लिख नही पाया था कि फिर जेल में घर घसीटा गया ।
अब 16 साल के बाद आज फिर इस पुस्तक के सम्पादन कार्य में हाथ लगाया है ।
मैं फरवरी, सन् '20 मे अण्डमन से लौटा । लौटकर माताजी एवं भाइयों के
अनुरोध से ईंटें बनवाने के काम मे फँस गया । किसी कारबार में फँसने से कितनी
उलझनो मे जान फँस जाती है उसको भुक्तभोगी ही जान सकता है । इसी उल-
झन मे पड़े हुए मैंने 'बन्दी जीवन' लिखना प्रारम्भ किया । इसके थोड़े ही दिन
बाद सन '21 के शुरू मे मैं जमशेदपूर में मजदूर संगठन के कार्य मे लग गया ।
मेरी इच्छा तो यह थी कि मैं 'बन्दी जीवन' को धीरे-धीरे लिखता जाऊँ लेकिन
मेरे एक मित्र श्री हेमन्तकुमार सरकार जबर्दस्ती मेरी हस्तलिखित पोथी को
प्रकाशनार्थ ले गये । उस समय हेमन्तकुमार देशबन्धु सी० आर० दास के विश्वस्त
अनुयायियो मे थे । सी० आर० दास के सम्पादकत्व में 'नारायण' नाम का एक
मासिक-पत्र निकलता था । हेमन्तकुमार इस मासिक-पत्र का संचालन-भार लिये
हुए थे । मुझे विश्वास नही था कि मेरा लेख प्रकाशित करने के योग्य है । हेमन्त-
कुमार ने मुझे आश्वासन दिया कि मेरा लेख काफी अच्छा है, और इसे वे 'नारायण'
में अवश्य प्रकाशित कराएँगे । इस प्रकार से जीवन में सर्वप्रथम मैंने लिखना
प्रारम्भ किया ।
लेकिन मैं अधिक नहीं लिख पाया था कि इसी बीच में मासिक-पत्र में मुझे
प्रति मास नियमित रूप से लेख देना पड़ा । इधर मजदूर संगठन के काम में तो
दिन-रात व्यस्त रहता ही था, इसलिए इस पुस्तक को वांछित रूप से तो नहीं ही
लिख पाया ।
आज जब पुनः इस पुस्तक का सम्पादन करने बैठा हूँ तो सहस्रों प्रकार की

12 / बन्दी जीवन
बातें मेरे मन में आ-आकर अपनी अभिव्यक्ति के लिए उमड़ी पड़ रही हैं। बात
यह है कि काल के प्रवाह से भारत में आज नई-नई बातें पैदा हो रही हैं, नये
आदर्शों के द्वन्द्व के कारण भारत के राष्ट्रक्षेत्र में आज तरह-तरह की उलझनें
पैदा हो रही हैं। जिस समय मैंने सर्वप्रथम राजनीति में कार्य करना प्रारम्भ
किया था उस समय भी कम उलझने न थीं, लेकिन आज उन उलझनों को पार
करके अब मुझे दूसरी उलझनों का सामना करना पड़ रहा है। इन दोनो युगों
की उलझनों मे जो अन्तर है उसे समझे बिना मेरी वर्तमान परिस्थिति को कोई
समझ नही सकता, एवं आधुनिक युग के आदर्श-गत द्वन्द्वों का स्पष्टीकरण किए
बिना आज मैं इस पुस्तक की भूमिका ठीक तरह से नहीं लिख सकता।
यहाँ पर जीवन की कुछ गूढ़ बातें कहना आवश्यक हो गया है। यद्यपि मैं
यहाँ अपनी आपबीती नही लिखना चाहता, तो भी मुझे अपनी मानसिक स्थिति
का कुछ अंश यहाँ पर खोलना ही पड़ेगा।
जब मैं बालक ही था, तभी से नाना कारणो से मैने सकल्प कर लिया था
कि भारतवर्ष को स्वाधीन किया जाना है और इसके लिए मुझे सामरिक जीवन
व्यतीत करना है। सर्वप्रथम यह भावना मेरे मन मे कैसे आई इसका भी एक
छोटा-सा इतिहास है, अन्य स्थान पर इसकी चर्चा मुझे करनी पड़ेगी। जिस समय
क्रान्तिकारी भावना को लेकर मैने सर्वप्रथम बनारस मे सगठन प्रारम्भ किया
था, सयोगवश उसी समय करीब-करीब मेरी ही उम्र के एक नवीन युवक के साथ
मेरी गहरी मित्रता हो गई थी। यह नवीन युवक अभी कलकत्ता से आये हुए थे।
ऐसी मित्रता कैसे उत्पन्न होती है यह एक रहस्य की बात है। नवीन भावनाओ
की तरह सहसा किसी एक दिन ऐसे मित्र जीवन-पथ मे आकर खडे हो जाते है।
पहले ही दर्शन मे यह प्रतीत हो जाता है कि यह मेरे बड़े प्रियजन है। मोल-भाव
करके दुनिया की चीजे खरीदी जाती है, लेकिन जीवन की जो श्रेष्ठ सम्पदा है वह
यो ही मिला करती है। इस प्रकार से जीवन के एक महान् अवसर पर मैने इस
तरह से यो ही अपने मित्र को पाया था—लेकिन थोडे ही दिनो मे जीवन के
आदर्श को लेकर उनके साथ मेरा मतभेद उत्पन्न हुआ। मै तो पहले ही सकल्प
कर चुका था कि भारत को विदेशियो के हाथ से मुक्त करूँगा और इस महान्
कार्य को सम्पन्न करने के लिए गोपनीय रूप से जनबल एव अस्त्रबल सग्रह करना
पडेगा। उस समय शिवाजी को मै आदर्श पुरुष समझने लगा था। पिताजी जब
पूछते थे कि तुम आगे चलकर क्या करोगे, तो मैं कहता था कि मैं शिवाजी बनूँगा,
नेपोलियन की तरह में जीवन बिताना चाहता हूँ। लेकिन अब मेरे मित्र ने मेरे
मन मे एक भीषण उलझन पैदा कर दी। हम लोगो की अवस्था उस समय
पन्द्रह-सोलह साल की थी। इसी उम्र मे मेरे मित्र ने सन्यास का आदर्श पसन्द
कर लिया था, जिसका अर्थ होता है समाज-सेवा के काम से अलग होकर व्यक्ति-
गत साधना मे जीवन व्यतीत करना। मेरे लिए सामाजिक कर्म को छोडना एक
प्रकार से असम्भव-सा था। लेकिन मेरे मित्र ने मुझे यह समझाना चाहा कि

भूमिका / 13
मनुष्य का श्रेष्ठ आदर्श है जीवन में ईश्वर की उपलब्धि करना । ईश्वर का
साक्षात्कार हुए बिना हम जो कुछ भी करेंगे उससे समाज का यथार्थ कल्याण
होगा या नहीं यह कहना कठिन है । सत्य की अनुभूति हुए बिना हम कैसे ठीक
रास्ते को अख्तियार कर सकते हैं ? ईश्वर का साक्षात्कार होने के पश्चात् ही
हम यथार्थ रूप में समझ सकते हैं कि क्या सत्य है और क्या असत्य, क्या कल्याण-
कारी है और क्या अमंगलप्रद । ईश्वर का साक्षात् किए बिना समाज का
कल्याण करने जाना मानो अन्धे होकर, अन्धे को रास्ता दिखलाना है। ईश्वर
का साक्षात्कार करने के पश्चात् ईश्वर की आज्ञा से, ईश्वर की इच्छानुसार जब
हम समाज की सेवा मे लगेगे तभी हमारी समाज-सेवा सार्थक हो सकती है।
अपने पक्ष की पुष्टि के लिए मेरे मित्र ने स्वामी विवेकानन्द एवं परमहंस राम-
कृष्ण देव की जीवनी का उल्लेख किया ।
इस प्रकार जीवन मे सर्वप्रथम आदर्शगत द्वन्द्व उपस्थित हुआ। एक तरफ मैं
समाज को छोड़ नही सकता था; दूसरी तरफ अपने जीवन के परम मित्र से भी
मैं दूर नही रह सकता था, लेकिन मेरे मित्र मेरे साथ चलने के लिए तैयार न थे।
मैं भी अपने मित्र के रास्ते पर चलने को तैयार न था । छः महीने तक दिन और
रात इस उलझन मे फँगे रहे । उस किशोरावस्था की मित्रता मे एक अजीब
मोहिनी शक्ति थी। हम एक-दूसरे को छोड़ भी नही पाते थे, ग्रहण भी नही
कर पाते थे । आज भी मेरे मित्र संन्यास मार्ग में अवस्थित हैं और मैं गृहस्थ
आश्रम मे जकडा हुआ गोता खा रहा हूँ ।
अपने मित्र के बताने पर मैने स्वामी विवेकानन्द एवं श्रीरामकृष्ण परमहंस-
देव की जीवनी पढी, उनकी तमाम उक्तियो को लेकर एकाग्र मन से एकान्त में
गम्भीर रूप से मनन किया । उपनिषद् एवं गीता अनुवाद की सहायता से बार-
बार पढी, साधु-संगति भी करने लग गया । इस प्रकार से हिन्दू-समाज की मर्म-
कथा को भली प्रकार से समझने की मैंने अपने अन्तरतम मे चेष्टा की । साधु-सन्तों
की संगति मे जीवन में प्रभूत लाभ हुआ इसमें कोई सन्देह नही; लेकिन जी को
तसल्ली नही हुई । मेरी समझ मे यह बात नही आई कि हमारे समाज के श्रेष्ठ
महापुरुष क्यो समाज में नही आते, क्यों सामाजिक काम मे अग्रणी नहीं होते ?
साधु-सन्तो के ससर्ग मे आकर मैने यह देखा कि साधन-भजन करना छोड़कर ये
लोग एक कदम भी इधर-उधर नही जाते । यहाँ तक कि साधन-भजन के बारे में
भी इनके जो कुछ अनुभव हैं उन्हे भी ये पुस्तक के आकार में समाज को देना
नही चाहते । इनमें त्याग है, अध्ययनशीलता है, दत्तचित्त होकर एक काम में
लग जाने की शक्ति है, लेकिन ये समाज-सेवा के किसी काम में आना नहीं चाहते ।
मैंने अपने मन में यह सोचा कि यदि हमारे पूर्वज भी ऐसे ही होते तो आज हमें न
पाणिनि जैसा व्याकरण ही मिलता, न वेद-वेदान्त, उपनिषद्, ज्योतिष, गणित या
आयुर्वेद शास्त्र ही प्राप्त होते । मेरे मन में यह सन्देह पैदा हुआ कि सम्भव है
आजकल के साधु-सन्त चाहे जितने भी भले हों, लेकिन इनमें प्राचीनकाल की

तरह वह प्रतिभा नहीं है, वह सम्यक् दृष्टि भी नहीं है, जिसके कारण एक दिन
भारतवर्ष सभ्यता के चरम शिखर पर आरूढ़ था। मुझे तसल्ली नहीं हुई। गीता
के कर्मयोग के आदर्श ने मुझे बहुत कुछ सहारा दिया; उपनिषद् से भी मुझे इस
बात का सहारा मिला। विवेकानन्द की वाणी में कर्मयोग एवं संन्यास दोनों तरह
की ही बातें मिलीं। लेकिन प्रामाणिक रूप से मुझे यह सबूत नहीं मिला कि कर्म
का मार्ग ही एकमात्र सत्य रास्ता है। तब मैंने यह निश्चय किया कि सम्भवतः
हम अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार योग, कर्मयोग या संन्यासयोग को ग्रहण कर
सकते हैं, कोई रास्ता किसी दूसरे रास्ते से न छोटा है, न बड़ा। अपनी-अपनी
प्रकृति के अनुसार जिस रास्ते को हम ग्रहण करेंगे वही रास्ता हमारे लिए सही
है, एवं और सब रास्ते गलत हैं। कम-से-कम दूसरे रास्ते में जाने से हमें अवश्य
कुछ-न-कुछ हानि होगी। अब यह निर्णय कैसे होगा कि मेरी प्रकृति कैसी है, एवं
कौन-सा रास्ता मेरी प्रकृति के अनुकूल है ? साधु-संगति करके एवं शास्त्र-वचनों
से मुझे यह पता चला कि ऐसा निर्णय करने के लिए तीन साधन मौजूद हैं। एक
तो अपनी विचारबुद्धि है, दूसरा सतगुरु की सहायता है और तीसरा शास्त्रवचन
है। इन तीनों में यथार्थ मेल होना चाहिए। केवल शास्त्रवचन से काम नहीं
चलेगा। कारण, एक तो शास्त्र बहुत हैं, इसलिए उनमें से अवश्य ही चुनाव
करना पड़ेगा। यह बात सच है कि शास्त्रवचन भी अभिज्ञता के आधार पर स्थित
हैं, तथापि विभिन्न महापुरुषों ने अलग-अलग रास्ते पर चलकर सत्यानुभूति की
है। इसलिए कौन-सा मार्ग मेरे लिए प्रशस्त है, इसका निर्णय शास्त्रवचन मात्र
से ही नही हो सकता इसके लिए शिक्षक की आवश्यकता है। जब संसार के
प्रत्येक काम में शिक्षक की आवश्यकता है तो क्या सत्यानुसंधान के काम में ही
शिक्षक की आवश्यकता नहीं होगी ? किन्तु केवल शिक्षक से ही काम नही चल
सकता। शिक्षा लेनेवाला यदि उपयुक्त न हो, तो शिक्षक क्या करेगा ?
एवं कौन मेरा शिक्षक होगा यह निर्णय भी तो मुझे ही करना पड़ेगा ? इस-
लिए अन्त में अपनी विचारबुद्धि पर ही निर्भर करना पड़ता है। लेकिन अपनी
प्रकृति को छोड़कर उसका उल्लंघन करके मैं कुछ नही कर सकता। इसलिए
भारतीय साधन-पद्धति में सर्वप्रथम बात यह है कि सत्य की खोज करने के पहले
अपने को निष्पक्षतापूर्ण बनाना पड़ता है। सम्पूर्णतया निष्पक्षपाती हुए बिना
सत्य की खोज सम्भव नहीं है। लेकिन यथार्थ रूप में निष्पक्षपाती होना आसान
बात नहीं है। इसके लिए हमें स्वार्थशून्य होना आवश्यक है। और स्वार्थशून्य
हम तभी हो सकते हैं, जब हम अपनी वासना के वशीभूत न हों। वासनातीत
होना और वैराग्यवान होना एक ही बात है। इसलिए भारतीय साधना-पद्धति में
वैराग्य होना सर्वप्रथम आवश्यक है। वासनातीत होने का अर्थ यह नहीं है कि
मुझमें किसी प्रकार की वासना न हो, बल्कि वासनातीत होने का अर्थ यह है कि मैं
किसी वासना के अधीन न होऊँ, प्रत्येक वासना मेरे अधीन रहे। इस प्रकार से
अपने को यथासम्भव हर एक प्रकार के संस्कारों से मुक्त रखकर तब सत्यानुसंधान

भूमिका / 15
में प्रवृत्त होना चाहिए। साधु-संगति के फलतः एवं प्राचीन साहित्य के अनुशीलन
के परिणामतः मैं इसी नतीजे पर पहुँचा हूँ। मेरे मित्र और मैंने अलग-अलग रास्ते
अख्तियार किये लेकिन छः महीने तक हम दोनों तीव्र द्वंद्व के भीतर से गुजरे। मैंने
बाद को यह भी देखा कि हमारे सैकड़ों भाई, भारतीय आदर्श की दुहाई देकर,
आध्यात्मिकता के बहाने, अपनी स्वार्थबुद्धि से प्रणोदित होकर, तामसिक वृत्ति के
आवेश में आकर भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में भाग लेने में पश्चात्पद रहे। ऐसे
अध्यात्मवादियों के लिए घर-गृहस्थी के काम करने में कोई बाधा नहीं है, ये मजे
से खाते-पीते हैं, बाज़ार करते हैं, अपने परिवार का प्रतिपालन करने के लिए
तरह-तरह के काम-धंधे भी करते हैं, शादी भी करते हैं, सन्तान-उत्पादन एवं
सन्तान-पालन भी करते हैं, अर्थात् गृहस्थ आश्रम के सभी काम करते हैं, केवल
राजनीति में भाग लेने के अवसर पर धार्मिक जीवन व्यतीत करने की दुहाई देकर
भारतीय अध्यात्मवाद की आड़ में अपनी कायरता को छिपाते हैं।
राजनीतिक जीवन मे मेरा प्रथम मानसिक द्वंद्व इस प्रकार का रहा। जीवन
में चाह तो यह थी कि हमारे भारतवर्ष में फिर ऐसे महापुरुष का जन्म हो, जिसमें
गुरु रामदास एवं शिवाजी की सद्गुणावली एक व्यक्तित्व में विकसित होकर
दिखलाई दे, अर्थात् कर्मजीवन ज्ञान के प्रकाश से उद्भासित हो। मेरे दिल में
यह धारणा बद्धमूल हो गई थी कि कर्महीन होने के कारण भारत का अधःपतन
हुआ है। एवं भारत की उन्नति यथार्थ रूप में तभी हो सकती है जब कर्मजीवन
भी प्रकृत ज्ञान के आलोक से विशुद्ध हुआ हो। लेकिन वास्तविक जगत् में मेरा
वांछित आदर्श-पुरुष मुझे नहीं मिला। यदि स्वामी विवेकानन्द या स्वामी राम-
तीर्थ के तुल्य महापुरुष भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन में अग्रणी होते, तभी मुझे
प्रकृत सन्तोष होता। श्री अरविंद घोष में मेरे कल्पित आदर्श पुरुष की छाया
मिली। मैं श्री अरविंद घोष से पाण्डिचेरी में सन् 1911 में मिलने के लिए भी
गया था, लेकिन दुर्भाग्यवश मिल नहीं पाया। इसके बारे में विशेष रूप से अन्य
स्थान पर कहूँगा। आखिर घूमते-घूमते ऐसे क्रान्तिकारी दल में मैं शामिल हो
गया जिस दल के नेतागण अरविंद घोष के दार्शनिक विचारों से अंतरंग रूप से
प्रभावित हो रहे थे। इससे बढ़कर सन्तोष अपने जीवन में मुझे बहुत कम मिला
है। मेरे मानसिक द्वंद्वों के इस अंश को बिना समझे 'बन्दी जीवन' के बहुत-से
स्थानों को पाठक ठीक से नहीं समझ पाएँगे। ऐसी मानसिक परिस्थिति में मैंने
क्रान्तिकारी दल में काम किया एवं इसी मनोवृत्ति को साथ लेकर मैं जेल गया,
कालेपानी गया और लौट भी आया।
सन् 1920 के बाद जब मैं कालेपानी से लौटकर आया तब महात्मा गांधी
भारत के राष्ट्रीय क्षेत्र में अपनी कार्यप्रणाली को लेकर अवतीर्ण हो चुके थे।
महात्मा गांधी की अहिंसा नीति के कारण, एवं महात्मा गांधी ऐसे महान् व्यक्ति
का भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के कारण भारतीय
क्रान्तिकारी आन्दोलन को काफ़ी बाधा पहुँची। महात्मा गांधी यह प्रचार करने

16 / बन्दी जीवन
लगे कि भारतीय प्राचीन आदर्श के साथ भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का
समन्वय नहीं हो सकता। मानो प्राचीन भारतीय आदर्श में श्रीकृष्ण का एवं कुरु-
क्षेत्र के महायुद्ध का कोई स्थान ही नहीं है। महात्मा गांधी की तरह संस्कृत पाठ-
शालाओं के छात्र एवं अध्यापकगण भी भारतीय प्राचीन आदर्श के नाम पर
भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन के विरुद्ध तीव्र प्रचार किया करते थे। इस प्रकार
से हिंसा एवं अहिंसा की नीति को लेकर मेरे मन में दूसरा संघर्ष उत्पन्न हुआ
था, लेकिन यह इतना तीव्र न था। महात्माजी ने बेलगांव कांग्रेस में क्रान्ति-
कारियों के विरुद्ध जो कुछ दोषारोपण किए थे, उसके प्रत्युत्तर में मैंने फरार
हालत में महात्मा जी के पास अपने नाम से एक चिट्ठी भेजी थी, वह चिट्ठी
ज्यों की त्यों 12 फरवरी सन् 1925 की 'यंग इंडिया' में प्रकाशित हुई थी। उसी
अंक में महात्माजी ने उसका उत्तर भी दिया था।
कालेपानी से लौटने के बाद संभवतः सन् 1923 में ही मैं पहले पहल कम्यू-
निस्ट सिद्धान्तों से परिचित हुआ। यह एक नवीन सिद्धान्त था जिसके साथ
क्रान्तिकारी दल के किसी व्यक्ति का भी उस समय यथार्थ परिचय न था।
तत्पश्चात् सन् 1925 में जेल जाने के पहले मैं कम्यूनिस्ट सिद्धान्त के साथ यथेष्ठ
रूप से परिचित हुआ। बहुत से प्रामाणिक ग्रन्थ पढ़े, कम्यूनिस्टों के साथ खूब
वाद-विवाद किया, विचार विनिमय किया। एक तरफ मैं क्रान्तिकारी आन्दोलन
में जुटा था दूसरी तरफ 'बन्दी जीवन' के दूसरे भाग का सम्पादन-कार्य भी कर
रहा था, एवं कम्यूनिस्ट सिद्धान्त को समझने के लिए जी-जान से प्रयत्न कर रहा
था। कम्यूनिस्ट सिद्धान्त का कुछ अंश तो मैने ग्रहण कर लिया, लेकिन कुछ
अंश को मैं आज भी ग्रहण नहीं कर पाया। कम्यूनिज्म के सिद्धान्त की आर्थिक-
योजना की बहुत-सी बातें मैंने स्वीकार की, लेकिन आर्थिक योजना के साथ कम्यू-
निज्म के सिद्धान्त मे भौतिकवाद के बहुत-से ऐसे सिद्धान्त हठपूर्वक जोड़ दिये गए
हैं, जिसे दार्शनिक दृष्टि से एवं मानव अभिज्ञता की दृष्टि से मैं सत्य नही सम-
झता। मैं अब भी ईश्वर में विश्वास रखता हूँ एवं यह समझता हूँ कि आधुनिक
विज्ञान की अभिव्यक्ति से क्रमशः भारतीय दर्शन-शास्त्र की पुष्टि होती जा रही
है। आजकल हमारे देश के कुछ व्यक्ति परानुकरण वृत्ति के वश होकर आत्म-
वाद को स्वीकार नही कर रहे हैं एवं जो लोग आत्मवाद में विश्वास रखते हैं
उनकी वे हँसी उड़ाते हैं।
यथार्थ में बात तो यह है कि अपनी-अपनी अभिरुचि, संस्कार एवं संगी-
साथियों के प्रभाव की वजह से ही अधिकांशतः हमारी विचारधारा बनती है;
गम्भीर रूप से चिन्तन करने के बाद किसी सिद्धान्त को ग्रहण करने का दृष्टान्त
मनुष्य में दुर्लभ है।
यह भी एक बात है कि आज जो लोग राष्ट्रीय क्षेत्र में त्याग एवं वीरत्व के
साथ आगे बढ रहे हैं, उनकी विचारधारा का प्रभाव स्वभावतः प्रबल होगा। रूसी
विप्लवी आन्दोलन की सफलता के मोह में आकर भी आज हमारे देश के बहुतेरे

भूमिका / 17
नौजवान उससे अभिभूत हो रहे हैं। भौतिकवादियों के मन में यह भी एक धारणा
है कि आधुनिक विज्ञान ने आत्मवाद के सिद्धान्त को जड़ से उखाड़कर फेंक दिया
है, लेकिन ये सब बातें बिलकुल निराधार हैं।
निष्पक्षपात रूप से यदि हम आधुनिक विज्ञान की आलोचना करें तो हमें यह
अवश्य ही स्वीकार करना पड़ेगा कि विज्ञान केवल इन्द्रियग्राह्य विषयों की ही
खोज करता है, इस कारण विज्ञान की सहायता से हम यह कैसे कह सकते हैं कि
इन्द्रियातीत वस्तुओं का अस्तित्व ही नहीं है ? यन्त्रों के आविष्कार से हम अपनी
इन्द्रियों की शक्ति को बढ़ाते हैं, और तब हम देख पाते हैं कि जो वस्तु इन्द्रिय-
गोचर नहीं थी वह यन्त्रों की सहायता से इन्द्रियग्राह्य हो गई । आज वैज्ञानिक
उन्नति के कारण हमें यह प्रतीत होने लगा है कि हमारे सुपरिचित ज्योति-पुंज के
अतिरिक्त, हमारी इन्द्रियग्राह्य आलोक-रश्मियों के अलावा भी, ऐसी बहुत-सी
किरणें हैं, जिनकी प्रकाश-शक्ति परिचित आलोक-रश्मि से कहीं अधिक एवं
आश्चर्यप्रद है । यन्त्रों की और भी उन्नति होने पर हमें पता चलेगा कि हमारे
परिचित जगत् से, हमारे इन्द्रियग्राह्य जगत् से, इन्द्रियातीत जगत् कहीं अधिक
व्यापक एवं चमत्कारपूर्ण है । हम मनुष्यों का स्थान उस अज्ञातलोक एवं ज्ञात
लोक के सन्धि-स्थल पर स्थित है । यन्त्रों की सहायता के बिना भी मनुष्य ऐसी
शक्ति अर्जन कर सकता है, जिसकी सहायता से, इन्द्रियातीत जगत् का उसे
परिचय मिल सकता है ।
जीवविज्ञान एवं मनोविज्ञान की आधुनिक उन्नति से वैज्ञानिकों को यह प्रतीत
होने लगा है कि भौतिक मतवाद एक अंधविश्वास मात्र है । इसका वैज्ञानिक
आधार कुछ भी नहीं है। प्रसिद्ध जीव वैज्ञानिक जे० एम० हालडेन साहब ने तो
यहाँ तक कह दिया है कि यदि व्यक्तिगत रूप से उन वैज्ञानिकों के प्रति लोगों की
असीम श्रद्धा नहीं होती तो भौतिकवाद के मानने के कारण उन्हें वे घृणा की दृष्टि
से देखते । देखिये [Materialism by J. S. Haldane C. H., M. D., F.
R. S. Hom. LL. D. (Birmingham and Edinburgh) Hon. D.
Sc. (Cambridge, Leeds, and Witwaterarsand) Fellow of New
College, Oxford, and Honorary Professor Birmingham Unive-
rsity—p. 39] नोबेल पुरस्कार प्राप्त किये हुए डाक्टर कॅरेल अमेरिका के
प्रसिद्ध रॉकफेलर इंस्टिट्यूट में अनुसन्धानकारी, जगत्प्रसिद्ध जीव-विज्ञानवेत्ता
हैं । इनकी भी राय में भौतिकवाद एक व्यक्तिगत विश्वासमात्र है । विज्ञान की
दृष्टि से इसकी पुष्टि नहीं हो सकती । बल्कि विज्ञान की आधुनिक गति भौतिक-
वाद के विरोध में जा रही है। (देखिए कैरेल के लिखित Man the Unkn-
own) इस प्रकार से आधुनिक जगत् के विख्यात एवं लब्धप्रतिष्ठ वैज्ञानिकों
के वचन उद्धृत करके यह दिखलाया जा सकता है कि भौतिकवाद एक मत मात्र
है। भौतिकवाद का सिद्धान्त वैज्ञानिक आधार पर प्रतिष्ठित नहीं है । बट्रेण्ड
रसेल साहब ने भी यह कहा है कि रूस के राजनीतिज्ञों एवं अमेरिका के कुछ

18 / बन्दी जीवन
थोड़े से वैज्ञानिकों को छोड़कर आधुनिक संसार में अधिकांश दार्शनिक एव
वैज्ञानिकों की भौतिकवाद में कोई श्रद्धा नहीं है। रूस एवं अमेरिका में ईसाई
पुरोहितों के अवांछनीय किन्तु प्रबल प्रभाव के कारण उन देशों में उसकी प्रति-
क्रिया के रूप में ऐसे भौतिकवाद का उद्भव हुआ है। (देखिए History of
Materialism by Lang, English translation—Introduction by
Bertrand Russell---written in 1925.) अपने इस पक्ष को प्रमाणादि देकर
उचित प्रकार से सिद्ध करने के लिए एक सम्पूर्ण ग्रन्थ लिखने की आवश्यकता है।
परन्तु इस स्थान पर इतने गहरे रूप से इस विषय में विचार करने के लिए मैं
प्रवृत्त होना नहीं चाहता। अन्त में एक बात का और उल्लेख करके अपने वक्तव्य
को स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। एक तरफ आधुनिक पदार्थ-विज्ञान इस नतीजे
पर आ पहुँचा है कि विश्व में जितने भी पदार्थ हैं, असल में वे सभी वैद्युतिक
शक्ति के ही विभिन्न रूप है; दूसरी तरफ यह प्रमाणित हो रहा है कि मस्तिष्क-
शक्ति के परिचालन के परिणाम में वैद्युतिक प्रवाह उत्पन्न होता है। अभी इतना
प्रमाणित होना बाकी रह गया कि वैद्युतिक प्रवाह के कारण मस्तिष्क मे विचार-
धारा की उत्पत्ति हो। हमें याद रखना चाहिए कि कुछ दिन पहले यह अज्ञात था
कि भौतिक शक्तियाँ एक अवस्था से दूसरी अवस्था मे रूपान्तरित की जा
सकती हैं परन्तु आज अवश्य यह बात प्रमाणित हो गई है। इस प्रकार से हम
उस दिन की प्रतीक्षा में हैं जिस दिन यह प्रमाणित हो जायगा कि संसार के
समस्त पदार्थ एवं जीवजगत् के समस्त जीवों की प्राणशक्ति तथा चैतन्य एवं
बुद्धि ये सब के सब एक ही वस्तु के विभिन्न रूप या प्रकाश हैं। कलकत्ता
हाईकोर्ट के प्रसिद्ध जज सर जान वुडराफ साहब ने यह कहने का साहस किया
था कि आधुनिक विज्ञान की प्रगति वेदान्त के सिद्धान्त की तरफ अनिवार्य रूप
से झुक रही है। न कि वेदान्त को अपने सिद्धान्त से हटकर विज्ञान की तरफ
झुकना पड़ रहा है।
इस पहलू के अलावा समाजवाद के और भी बहुत-से सिद्धान्त हैं जिनसे मैं
सहमत नहीं हूँ, यथा मार्क्सवादियों का यह कहना है कि इतिहास की अभिव्यक्ति
आर्थिक कारणों से ही हुआ करती है तथा संसार मे अभिव्यक्त हरेक प्रकार की
सभ्यता के मूल में आर्थिक कारण ही प्रधान रूप में सक्रिय होते हैं। इस बात को
भी मैं स्वीकार नहीं कर पाया।
मार्क्स का यह भी कहना था कि पूंजीवादी व्यवस्था में उद्योग-धन्धों की
उन्नति के साथ-साथ संसार के मजदूरों में अशान्ति भी बढ़ेगी एवं उनकी
क्रोधाग्नि भी प्रज्ज्वलित होगी और क्रमशः इन दो श्रेणियों के संघर्ष के परिणाम
में पूंजीपतियों की हार एवं मजदूरों की विजय अवश्यम्भावी है। लेकिन वास्तविक
जगत् में हम देखते यह हैं कि संसार मे जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड, इटली, अमेरिका,
जापान इत्यादि देशों में पूंजीपतियों की उन्नति चरम सीमा को प्राप्त किए है।
फिर भी इन मजदूरों की क्रान्ति इन देशों में नहीं हुई है। प्रत्युत कम्यूनिस्ट चीक

भूमिका / 19-
एवं रूस जैसे पिछड़े हुए देशों में अपना राज्य क़ायम करने में बहुत कुछ कृतकार्य
हुए हैं। इसके मूल में आर्थिक कारण उतने नहीं हैं जितने अन्य और अनेक
प्रकार के कारण हैं।
इन सब बातों की वैज्ञानिक प्रणाली से आलोचना करना आवश्यक है, लेकिन
इस भूमिका में यह सम्भव नही है। इन सब बातों की सम्यक् आलोचना कहीं
अन्यत्र करने की मेरी प्रबल इच्छा है।
आधुनिक विज्ञान एवं ऐतिहासिक खोज की प्रणाली की सहायता से भारतीय
विप्लव आन्दोलन का एक प्रामाणिक इतिहास अलग ही लिखने की प्रबल
आकांक्षा है, इसलिए प्रस्तुत पुस्तक 'बन्दी जीवन' में कोई विशेष परिवर्तन नहीं
किया गया। इस पुस्तक की हिन्दी भी मेरी नही है। इस बार जेल से छूटने
के बाद से हिन्दी में लिखना आरम्भ किया है। इच्छा है कि अगले सस्करण में
अनुवाद की सहायता न लेकर मैं हिन्दी में ही मूल ग्रन्थ को लिखूं। इस ग्रन्थ की
त्रुटियो के लिए पाठकवर्ग से क्षमा का भिखारी हूँ।
लखनऊ,
13 सितम्बर, 1938

  • शचीन्द्रनाथ सान्याल

प्रथम संस्करण की भूमिका
किसी समाज को पहचानने के लिए उस समाज के साहित्य से परिचित होने
की परम आवश्यकता होती है, क्योंकि समाज के प्राणों की चेतना उस समाज के
साहित्य में भी प्रतिबिम्बित हुआ करती है। आज भारत ध्वंस और निर्माण के बीच
क्रमशः अपनी सार्थकता को खोजता फिरता है, अतः भारत का समाज यदि सजीव
होगा तो भारत के प्राणों की इस अशान्ति का चित्र उसके साहित्य में अवश्य ही
अपने प्रतिबिम्ब को अंकित कर देगा। हम भारतवासी आज यह नहीं जानते कि
इस अशान्त अटूट गति का वेग कितना प्रचण्ड है, किन्तु हमारे पश्चात् आनेवाली
पीढ़ी इस गति के वेग को बखूबी बतला सकेगी। भारत के इस ध्वंस और निर्माण
के उद्योग के बीच जितनी बड़ी शक्ति का स्फुरण हो रहा है उसके स्वरूप को
जानने का समय शायद अभी आया नहीं। इस बनाव-बिगाड़ का एक चित्र—भले
ही वह अस्पष्ट और मलिन हो—भारत की इस भाग्य-परीक्षा की एक धुँधली-सी
छाया आज भारत के साहित्य में भी धीरे-धीरे प्रकट हो रही है। इसी से 'निर्वा-
सन-काहिनी', 'कारा-काहिनी', 'द्वीपान्तरेर कथा', 'निर्वासितेर आत्म-कथा' और
'बांग्लाय विप्लव-वाद' आदि ग्रन्थ बंग भाषा के साहित्य में क्रमशः प्रकाशित हो
रहे हैं। भारत के प्राण आज जैसे कुछ छटपटा रहे हैं, उस छटपटाहट (अशान्ति) का
पूरा स्वरूप उसके साहित्य में प्रकाशित नहीं हो सका, अभी नहीं हुआ तो न सही,
क्रमशः आगे होगा। 'निर्वासितेर आत्म-कथा' इत्यादि पुस्तकें जिस श्रेणी की हैं
उस श्रेणी के अन्तर्गत मेरी यह पुस्तक 'बन्दी जीवन' भी है। इस श्रेणी की कई
पुस्तकें जब पहले से मौजूद थीं तब फिर यह 'बन्दी जीवन' मैंने क्यों लिखी?
इसके विशेष कारण सुन लीजिए।
मुझे यह कहना है कि सजीव जातियों में छानबीन करने की प्रवृत्ति बहुत
प्रबल होती है। इस जाँच-पड़ताल करने की प्रवृत्ति के कारण ही सजीव जातियाँ
अपने समाज के रत्ती-रत्ती समाचार के लिए चौकन्नी रहती हैं। शायद एक देहाती
के वंशावृक्ष-कुल का पेड़-पत्ता जानने में किसी ने अपनी सारी उम्र इस आशा से
बिता दी थी कि इस प्रकार तथ्य संग्रह कर देने से कदाचित् किसी दिन किसी को
वंशानुक्रम की धारा का पता लगाने में सुभीता हो जाय। भारत के वर्तमान
समाज की भीतरी वेदना का परिचय, उसका परिमाण और उसका कारण जानने
का समय क्या अभी तक उपस्थित नहीं हुआ? उस भीतरी वेदना—दर्दे दिल—

भूमिका / 21'

को हटा देने की इच्छा से भारत में जो अभिनव आन्दोलन आरम्भ हुआ है वह
आन्दोलन कितना व्यापक और गम्भीर है, कहाँ-कहाँ पर उसमे कोर-कसर और
भूल-चूक रह गई है, वह आन्दोलन किस परिमाण मे सार्थक हुआ और कितना
अपूर्ण रह गया है तथा उसमें यह अधूरापन क्यों रह गया—इन सारी बातो का
जान लेना क्या प्रत्येक भारतवासी का कर्तव्य नही ? इन सारी बातो को जानने
के लिए इस ढंग की बहुतेरी पुस्तकों के प्रकाशित होने की आवश्यकता है जिस
ढंग की कि यह पुस्तक 'बन्दी जीवन' है । ऐसी-ऐसी जितनी पुस्तकें प्रकाशित
होगी मुख्य विषय को समझना उतना ही आसान हो जायगा ।
मेरा वक्तव्य यह है कि 'कारा-काहिनी' के ढंग की जितनी पुस्तकें प्रकाशित
हुई हैं उनमे अरविन्द बाबू की 'कारा-काहिनी' और बाबू नलिनी किशोर-लिखित
'बागलाय विप्लव-वाद' नामक पुस्तके मुझे सर्वश्रेष्ठ जंची । हाँ, अरविन्द बाबू
ने सिर्फ कलकत्ते के कारागार की ही कथा लिखी है, और मैं चाहता हूँ कि
लाहौर, बनारस, कलकत्ता और अण्डमन की बाते इसी ढंग से लिखूं तथा इस
सिलसिले मे पजाब, युक्त-प्रदेश, बगाल और अग्रेज-शासित भारत के अन्यान्य
प्रदेशो के मानव-चरित्र की भी थोडी-बहुत चर्चा करूँ । सच पूछो तो 'बागलाय
विप्लव-वाद' के लेखको ने वे बाते जो कि मुझे कहनी है, मेरी अपेक्षा कही अच्छे
ढग से प्रकट कर दी है । भाषा पर यद्यपि मेरा उनकी भाँति अधिकार नही है,
फिर भी अभी तक बहुतेरी बाते प्रकट करने को रह गई हैं, बगाल की बातो का
वर्णन करते समय ही मैं उनकी चर्चा करना चाहता हूँ। मै बखूबी जानता हूँ कि
भाषा की दृष्टि मे मैं सुन्दर नही लिख सका, और इस दृष्टि से तो उपेन्द्र बाबू की
पुस्तक के साथ किसी की भी पुस्तक टक्कर लेने योग्य नही । ताना देने और
मज़ाक करने की ऐसी कुशलता बगाल मे कदाचित् ही किसी और लेखक मे हो ।
उपेन्द्र बाबू निस्सन्देह बगाल के शक्तिशाली लेखक है । किन्तु उनकी 'आत्म-कथा'
मे बहुत ही गुरुतर विषयो की आलोचना भी बिलकुल साधारण रीति पर की
गई है, मानो उनका उसी मे कौतुक है। इसी कारण 'निर्वासितेर आत्म-कथा'
चित्ताकर्षक होने पर भी मर्मस्पर्शिनी नही हुई । और वारीन्द्र बाबू की 'द्वीपान्तरेर
कथा' मे जो भाग उपेन्द्र बाबू का लिखा हुआ है वही मुझे अच्छा लगा । उक्त
पुस्तक का आधे से भी अधिक अंश उपेन्द्र बाबू का ही लिखा हुआ है। बाबू वारीन्द्र
कुमार घोष ने यद्यपि लिखा यही है कि "यह दो मुखो की एक ही बात है' किन्तु
यह सभी की समझ मे आ जाता है कि यह दो मुखो की साफ-साफ अलग-अलग
बाते हैं। वारीन्द्र बाबू के लिखे हुए अश मे, बीच-बीच मे यद्यपि खासा कवित्व
है, तथापि, सच तो यह है कि उसमे भी विप्लववादियो की मर्म-कथा प्रकट
नही हुई । इसके सिवा इसमे इस द्वीपान्तर की कथा की बहुतेरी बातें आसानी
से दबा दी गई है। ऐसा क्यो हुआ है, इसका विचार यथास्थान करने की इच्छा
है ।
'बन्दी जीवन' के इस खण्ड मे यही लिखने की चेष्टा की गई है कि यूरोप के

22 / बन्दी जीवन
महायुद्ध के समय भारत में क्रान्ति की कैसी-क्या तैयारी की गई थी। रौलट-
रिपोर्ट में तो इसका यह पहलू बिलकुल ही छिपा दिया गया है परन्तु 'टाइम्स
हिस्ट्री ऑफ दी ग्रेट वार' (Time's History of the Great War, volume
dealing with India) नाम की पुस्तक में इसका थोड़ा-सा उल्लेख आ गया
है। माना कि क्रान्ति की इस तैयारी का उपयोग नहीं किया जा सका, फिर भी
सफलता या विफलता के दृष्टिकोण से इसकी महानता का फैसला करना ठीक
नहीं। पितामह भीष्म का महत् चरित्र क्या कुरुक्षेत्र के महासंग्राम में उनकी हार-
जीत पर अवलम्बित है ?
इस पुस्तक के दूसरे खण्ड मे यह बतलाने की इच्छा है कि युद्ध छिड़ने के पूर्व
भारतीय विप्लववादियो की क्या दशा थी और उनके मन की गति ने किस-किस
प्रकार आघात लगने से कैसा-क्या भाव धारण किया था। इसके पश्चात् मेरे
फरार हो जाने की दशा, फिर गिरफ्तार होने और मुकदमा चलने एवं 'बन्दी
जीवन' का वर्णन करने का विचार है। मेरी गिरफ्तारी हो जाने के बाद भी
भारत और बर्मा मे जिस प्रकार क्रान्ति की गुप्त योजना की जा रही थी उसका
भी वर्णन करने का मेरा इरादा है।
सुना है कि वारीन्द्रकुमार के साथी उल्लासकर दत्त अण्डमन टापू मे कहते
थे कि "बडे सख्त लोगो से काम पडा है, ये हाड और मांस तो खाएँगे ही इसके
सिवा चमडी से डुगडुगी मढकर बजाएँगे।" ऐसे सख्त लोगो के हाथ से मुझे कैसे
छुटकारा मिला था, इसका भी अन्त मे वर्णन करने की अभिलाषा है। जीवन में
तरह-तरह की चोटे लगने से अन्त मे मन की क्या दशा हुई, उसको एक बात मे
न कहकर क्रमश. स्पष्ट करने की चेष्टा की जायेगी। मेरी अभी तक यह धारणा
है कि यह पुस्तक तीन खण्डो मे समाप्त होगी, लेकिन कर्मक्षेत्र की विषम उल-
झनो मे पडकर मै नही कह सकता कि इस पुस्तक का कितना अश पूरा लिख
पाऊँगा। कारण, आज तक जितने काम मैंने अपने हाथ मे लिए, किसी को भी मैं
निर्विघ्न रूप से पूर्ण नही कर पाया।
25 अगस्त, 1922
कलकत्ता
—शचीन्द्रनाथ सान्याल

निवेदन

आज भूतकाल की बातें लिखने बैठा हूँ। वह समय आज बहुत ही महिमामय
जान पड़ता है। जान पडता है कि जिस प्रकार समय अनन्त है उसी प्रकार
उसकी महिमा भी अनन्त-अपार है। ऐसा लगता है कि समय मानो उसे भी
सुन्दर बना देता है जो कि सुन्दर नही है, वह असंगति मे भी संगति मिला देना
है, उसे बेढगी नही रहने देता। समय की महिमा विचित्र है, उसकी कृपा से
अप्रिय की स्मृति प्रिय हो जाती है।
वास्तव मे अतीत—गुजरे हुए—की स्मृति बड़ी मीठी होती है, वह वीणा के
तार मे सोई हुई झकार की तरह तार पर आघात करते ही मधुर भाव से झंकृत
हो उठती है।
कई बार पिछली बातो की याद दु.ख भी कम नही देती। किन्तु उस दुःख-
दर्द के बीच भी मानो सुख रहता है। उस समय चित्त का मर्मस्थल तक खुल
जाता है, मानो उस अवसर पर अपने आपके साथ बिलकुल निर्जन मे, बहुत ही
गुप्त रूप से, बातचीत होती है।
आशा और निराशा, सुख और दुःख, मानो ज़िन्दगी-भर हमारे साथ खिल-
वाड करते हैं, किन्तु बहुत दिनों तक इनमे से कोई भी नही टिक सकता। सभी
दो दिन दर्शन देकर—हँसाकर या रुलाकर—चले जाते हैं, सिर्फ उनकी याद रह
जाती है।
स्मृति-पट पर बहुतेरी बडी चीजें छोटी हो जाती हैं और छोटी चीजें बड़ा
रूप धारण कर लेती है—कुछ चींजे ऐसी भी है जो मन में ऐसी जा छिपती हैं
कि फिर उनको ढूँढ़ निकालना कठिन हो जाता है।
बनारस षड्यन्त्र में मुझे सजा हुई थी। सन् 1915 की 26वीं जून को मैं
गिरफ्तार हुआ और 14 फरवरी सन् 1916 को आजन्म कालेपानी का तथा सारी
सम्पत्ति जब्त होने का दण्ड मिला। इसके अनन्तर कुछ दिन तक तो काशी के
कारागार में ही रहा, फिर अगस्त महीने में अण्डमन द्वीप को रवाना कर दिया
गया। अगस्त की 18वी तारीख को मैं उस द्वीप के जेलखाने में दाखिल किया
गया। फिर इच्छामय की इच्छा के अनुसार फरवरी सन् 1920 में सम्राट् के
घोषणापत्र के कारण रिहा किया गया।
बस, सन् 15 से लेकर सन् 20 के आरम्भ तक मेरा प्रथम बार का बन्दी

24 / बन्दी जीवन
जीवन रहा। इस 'बन्दी जीवन' का अवलम्ब ग्रहण करके मैं बतलाना चाहता
हूँ कि आखिर मैं कैद क्यों किया गया था। यह पुस्तक आज मैं इसलिए लिख रहा
हूँ जिससे कि भारत के भविष्यत् इतिहास के कुछ अध्याय ठीक-ठीक लिखे जा
सकें।
भारत का भाग्य एक महान् युग-सन्धि के बीच होकर दौड़ता जा रहा है।
भारत के भीतर और बाहर क्रान्ति की भयंकर आग, भगवान् की गुप्त प्रेरणा
से अपने निर्दिष्ट मार्ग पर—और वह भी मानो अपने लिए अनुकूल बवंडर
बनाकर—फैलती जा रही है, ऐसे ही एक बवंडर में उसी विधाता की मर्जी से
मैं भी पड़ गया था।
मेरी ही तरह और भी कुछ युवा पुरुष, अपने मर्मस्थल की अव्यक्त वेदना
से अधीर होकर, जान-बूझकर या बे-समझे-बूझे विधाता का अभीष्ट सिद्ध करने
के लिए ही दलबद्ध हो गये थे। मुद्दत से मैं चाहता था कि उस दल के भीतरी
मर्म का, जो कि काम-काज के बाहरी आडम्बर में छिप गया था, एक संक्षिप्त
इतिहास लिखूँ। आज उसी मर्म व्यापी इच्छा को चरितार्थ करने की चेष्टा कर
रहा हूँ।
हम लोग अक्सर घटना को ही महत्त्व दे देते हैं—उसी को बड़े आकार में
देखते हैं; किन्तु यह नहीं समझते कि घटना की ओट में—फिर वह घटना कितनी
ही क्षुद्र क्यों न हो—महाशक्ति की लीला रहती है, और वही असल में घटना
की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान होती है। सफलता का मोह हम लोगों को प्रति
पग पर घेरता है। विचार के द्वारा उस मोह का छेदन हो जाने पर भी प्राण उस
मोहावेष्टन को काटकर अलग कर देने में समर्थ नहीं होते। किन्तु बड़ी-बड़ी
घटनाओं के मुकाबले में जीवन-यापन की मामूली बातें भी कुछ कम महत्त्व की
नहीं होती। घटनाओं का आरम्भ विचार-जगत् में ही हुआ करता है।
इस सन्दर्भ में व्यक्तिगत चरित्र की आलोचना होने पर भी वह व्यक्तिगत
रूप में न की जायेगी। व्यक्ति से परिचय हुए बिना समष्टि से परिचय नहीं हो
सकता। इसलिए तो व्यक्तिगत चरित्र की आलोचना आवश्यक हो जाती है।
यह परिचय देने में मेरे अपने और अपने दल के बहुतेरे छिद्र प्रकट हो
जाएँगे। तो इसलिए क्या मैं उन दुर्बलताओं और संकीर्णताओं को छिपाने की
व्यर्थ चेष्टा करूँ जिन्होंने कि हमें भीतर-ही-भीतर पंगु बना दिया है? ऐसी चेष्टा
व्यर्थ तो होगी ही क्योंकि एक-न-एक दिन सत्य प्रकट होगा और जरूर होगा,
और साथ ही छिपाने का उद्योग करने से न सिर्फ सत्य का अपलाप ही होगा
अपितु उससे हमारा पंगुत्व—निकम्मापन—भी और अधिक बढ़ जायेगा।
इतिहास के पृष्ठों में 'सत्यम् ब्रूयात् प्रियम् ब्रूयात् मा ब्रूयात् सत्यमप्रियम्' सार्थक
नहीं।

क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का
आत्म-चरित्र
भारत के सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल के 'बन्दी जीवन' का
प्रथम भाग अगस्त सन् 1922 में प्रकाशित हुआ था, द्वितीय भाग वगबाणी में
छपा था, जिसका अनुवाद श्री जयचन्द्र विद्यालंकार ने किया था, और तृतीय भाग
के कुछ लेख 'प्रताप' में छपे थे, पर वे पुस्तकाकार में प्रकाशित नहीं हो सके । इन
तीनों भागों को एक साथ पढ़ने का सौभाग्य हमें अभी प्राप्त हुआ है और इसके
लिए हम श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल के अनुज श्री भूपेन्द्रनाथ सान्याल के ऋणी
और कृतज्ञ हैं। हमें इस बात का पछतावा है कि हम ऐसे महत्त्वपूर्ण आत्म-चरित्र
को अब से पहले क्यों नहीं पढ़ सके ।
'बन्दी जीवन' को पढ़ते हुए कई बातें आश्चर्यजनक प्रतीत होती हैं। सबसे
पहली बात तो यह है कि ग्रन्थ-लेखक की विश्लेषण-शक्ति आश्चर्यजनक थी और
दूसरी यह कि वह धार्मिक वृत्ति के पुरुष थे और उनकी भावनाओं का मूल आधार
भारतीय धर्म ग्रन्थ तथा भारतीय संस्कृति में था । जयचन्द्रजी ने सान्याल बाबू की
गहरी अन्तर्दृष्टि की, जो एक सच्चे ऐतिहासिक की जन्मसिद्ध पूंजी होती है, दिल
खोलकर प्रशंसा की है । उनकी सफलता का कारण बतलाते हुए जयचन्द्रजी ने
लिखा है—"वह केवल इतिहास लेखक ही नही, बल्कि जिस इतिहास को वह
लिख रहे हैं, उसके बनानेवालों में से भी हैं; उस इतिहास के पात्रों के वह जीवन-
मरण के खेल में साथी थे। यदि वह उनके भावों को पहचानते नहीं, तो उनके
नेता ही कैसे बनते ? सच्चे विप्लव-नेता में भी तो ठीक वे ही गुण चाहिएँ, जो
एक सच्चे इतिहास-लेखक के लिए आवश्यक है।"
निस्संदेह यह ग्रन्थ कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है । स्वयं लेखक ने इसके प्रथम
खण्ड के विषय में लिखा था--“इस खण्ड में यही लिखने का प्रयत्न किया गया है
कि यूरोप के महायुद्ध के समय भारत में क्रान्ति की कैसी और क्या तैयारी की गई
थी। रौलट-रिपोर्ट में यद्यपि यह पहलू बिल्कुल ही छिपा दिया गया है, तथापि
'टाइम्स हिस्ट्री आव दी ग्रेट वार' नामक पुस्तक में इसका थोड़ा-सा उल्लेख आ
गया है। माना कि क्रान्ति की इस तैयारी का उपयोग नहीं किया जा सका, फिर
भी सफलता या विफलता के दृष्टिकोण से इसका फैसला करना ठीक नहीं।

26 / बन्दी जीवन
पितामह भीष्म का महत् चरित्र क्या कुरुक्षेत्र के महा संग्राम में उनकी हार-जीत
पर अवलम्बित है ?"
सान्याल साहब ने पुस्तक के प्रथम भाग को लीलामय भगवान् के चरण-
कमलों मे अर्पित किया था और द्वितीय भाग का समर्पण इस प्रकार था—"जिन
को जीवन मे नाना रूप से दुःख-कष्ट ही देता रहा, उत्कट इच्छा रहने पर भी
सांसारिक रीति से जिनको कुछ भी सुखी नही बना सका, दिन और रात सुख
और दुःख मे, सम्पद् और विपद मे, हर घड़ी जिनकी याद करके एकदम आनन्द
और दुःख से विह्वल-सा हो उठता हूँ, जो मेरे दुःखो मे साझी होकर केवल दुःख
ही दुःख पाती रही, अपनी उन्ही परम स्नेहमयी जननी के श्रीचरणो मे यह अपना
क्षुद्र ग्रन्थ श्रद्धा और भक्ति-सहित समर्पित करता हूँ।"
हृदय की कोमलता
पुस्तक के इन तीन भागो को पढ़कर यह विश्वास हो जाता है कि शचीन्द्र
बाबू बडी उच्च कोटि के क्रान्तिकारी थे, जिन्होने हिंसात्मक प्रवृत्तियो मे संलग्न
रहने पर भी अपने हृदय की कोमलता को नष्ट नही होने दिया। उनके इन ग्रन्थो
मे अनेक महापुरुषो और छोटे-से-छोटे कार्यकर्ताओ के जीवन की झाँकियाँ देखने
को मिलती है। सर्वश्री मालवीयजी, सी० आर० दास, जवाहरलाल नेहरू, सुरेन्द्र-
नाथ बनर्जी और रासबिहारी बोस से लगाकर साधारण से साधारण कार्यकर्ता
तक को उन्होने कृतज्ञतापूर्वक याद किया है। जिन दिनो श्री उग्रजी ने अपना साहि-
त्यिक जीवन प्रारम्भ ही किया था, उन दिनो सान्याल बाबू ने उन्हे अपने दल मे
मिलाने की कोशिश की थी। यद्यपि उसमे वह असफल हुए फिर भी उन्होने
उग्रजी की यथोचित प्रशंसा ही की है। उन्होने लिखा है—"इसमे तो कोई संदेह
नही कि उनकी लेखनी मे अत्यन्त शक्ति है, लेकिन उनकी रुचि मे परिवर्तन हो
जाने के कारण उनका सृष्ट साहित्य समाज को आशानुरूप कल्याणप्रद सिद्ध नही
हुआ, यह और बात है, परन्तु इसमे कोई संदेह नही है कि वह प्रतिभाशाली लेखक
है। उनकी सहायता से हमारे दल को एक ऐसा महत्त्वपूर्ण लाभ हुआ कि जिसके
लिए हम सब सदा उनके कृतज्ञ रहेगे।"
श्री सान्याल बाबू ने क्रान्तिकारी सिखो की उदारता की दिल खोलकर दाद
दी है। उन्होने लिखा है—"रुपए-पैसे की चर्चा निकलते ही उन्होने तुरन्त सोने
की गोल-गोल बडी-बडी चकतियाँ मेरे आगे रख दी, जो अमेरिका मे प्रचलित
सोने के सिक्के थे। हिसाब लगाने पर वे कई हजार रुपए के हुए। प्रत्येक दल ने ऐसा
बर्ताव किया था। गदर के कार्य मे इन लोगो को जिस प्रकार दिल खोलकर अपनी
गाढी कमाई का धन दान करते देखा है, वैसा दृश्य बंगाल मे देखने को नही मिला।
इसमे संदेह नही कि ऐसा उत्साह और आन्तरिकता उन्ही सिखो मे थी, जो कि
अमेरिका की यात्रा कर आए थे। इसके सिवा पंजाब के निवासियो ने प्रायः इन
लोगो के साथ सहानुभूति प्रकट नही की। हाँ, पठान और सिख सैनिको के साथ

क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का आत्म-चरित्र / 27
इन लोगों का विशेष हेल-मेल था। इसके सिवा सिख जाति में परस्पर एक-दूसरे
के प्रति सहानुभूति और संवेदना-जनित एकता भारत की अन्यान्य जातियों की
अपेक्षा बहुत अधिक है।"
उदारता और आत्म-बलिदान
'बन्दी जीवन' को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि मानो हम कोई फिल्म
देख रहे हों। सिखों की उदारता तथा आत्म-बलिदान की शक्ति और बंगालियों
की संगठन शक्ति का संयोग सोने और सुहागे का मेल था। लेखक ने लिखा है—
"उत्तर भारत की प्रायः सभी छावनियों में हमारे दल के आदमी आने-जाने लगे।
उत्तर-पश्चिम अंचल के बन्नू से लेकर दानापुर तक कोई भी छावनी अछूती न
रखी गई। प्रायः सभी रेजिमेंटों ने वचन दिया था कि पहले वे लोग कुछ भी न
करेंगे, हां, गदर शुरू हो जाने पर वे अवश्य ही विप्लवकर्ताओं से मिल जाएंगे।
सिर्फ लाहौर और फीरोजपुर की रेजिमेंटों ने सबसे पहले काम शुरू कर देना
स्वीकार कर लिया था। आरम्भ में सरकार यह नही समझ सकी कि षड्यंत्रकारी
इतनी गहरी नींव देकर काम कर रहे हैं। ऐसा न होता तो इतना अधिक काम
हो ही न सकता। पंजाब के पुलिस विभाग के एक मुसलमान डिप्टी सुपरिटेण्डेण्ट
ने अपने एक मुखबिर को इस दल में शामिल कर दिया था। अन्त में उस कृपाल-
सिंह ने ही कृपा करके सारी बातें प्रकट कर दी।"
'बन्दी जीवन' में शहीद करतारसिंह के स्फूर्तिमय चरित्र की जो झांकी दिखाई
गई है, वह बड़ी दिव्य है। उन्होंने लिखा है—"मैंने तो करतारसिंह में जैसा आत्म-
विश्वास देखा, वैसा आत्म-विश्वास न रहने पर किसी के द्वारा कोई बड़ा काम
नही हो सकता। बहुतों में अहंकार का भाव रहने पर भी ऐसे आत्म-विश्वास का
भाव कम देखा जाता है। अहंकार और आत्म-विश्वास अलग-अलग दो चीजें हैं,
अहंकार दूसरे पर चोट करता है, किन्तु जो अहंकार दूसरे पर नोक-झोंक किए
बिना ही अपने प्राणों में शक्ति के अनुभव को जाग्रत करता है, वही आत्म-विश्वास
है।"
सान्याल बाबू ने पंजाबी लोगों को समझाया था—"हम लोगों से सलाह
लिए बिना अचानक कुछ कर न बैठना ! खूब सावधानी से काम करना होगा,
जिसमें कि यह शक्ति व्यर्थ न हो जाय। सिर्फ हू-हा करके फिजूल कामों में शक्ति
क्षीण न कर दी जाय।"
यह बात ध्यान देने योग्य है कि जिस समय सान्याल बाबू यह परामर्श दे रहे
थे, उनकी उम्र कुल जमा बाईस वर्ष की थी ! इस पुस्तक में कहीं-कहीं हास्य का
भी अच्छा पुट आ गया हैं। एक स्टेशन के जलपान-गृह में उन्होंने रोटी और तर-
कारी मांगी थी, पर वहां का आदमी रोटी और मांस ले आया। उस समय तक
सान्याल बाबू को यह पता न था कि पंजाबी लोभ गोश्त को तरकारी कहते हैं !
काशी की पुलिस को चकमा देने के उदाहरण भी बड़े मजेदार बन पड़े हैं।

28 / बन्दी जीवन
ऊँचा बौद्धिक स्तर
यदि कोई यह ख्याल करे कि ये क्रान्तिकारी लोग निरे हत्यारे थे, तो उसकी
यह बड़ी भारी भूल होगी। वे लोग प्रायः आपस में बड़े ऊँचे धरातल से विचार-
विमर्श करते थे। निम्नलिखित वाक्य हमारे इस कथन के प्रमाण हैं—
“अन्त में हम लोगों के बहुत पुराने—किन्तु फिर भी 'नित नये' 'आत्म-
समर्पण योग' की चर्चा निकली। जहाँ एक बार इसकी चर्चा निकल पड़ती वहाँ
फिर जल्द समाप्त न होती थी। मार्ग भले ही एक हो, और सब लोग एक ही
आदर्श से प्रोत्साहित हों, तो भी वही एक बात, एक ही भाव, भिन्न-भिन्न
व्यक्तियों में कितनी ही नवीन रीतियों से विकसित होने का प्रयत्न करता है।
इसलिए एक भाव के उपासक और उसी एक मार्ग के पथिक होने पर भी हम
लोगों के बीच परस्पर असंख्य स्थानों में मतभेद रहता था। मेल तो काफी रहता
था, किन्तु बेमेल ही क्या कम था ? जिस आदर्श से प्रेरित होकर हम लोग अपने
व्यक्तिगत या समष्टिगत जीवन को नियंत्रित कर रहे थे, उस भाव-स्रोत की
तरंग यद्यपि एक ही स्थान से आती थी, तथापि विभिन्न आधारों में उसने अपनी
विचित्रता की महिमा को स्थिर रखा था। हमारे आदर्श की छोटी-मोटी बातों के
झगड़ों में कितनी ही रातें बीत गई हैं, फिर भी उलझनें सुलझी नहीं हैं। एक
व्यक्ति दूसरे को कुछ-कुछ समझकर जब घर से बाहर निकल आता, तब उषा
की लालिमा अधखिले फूल की तरह, पूर्व क्षितिज में दीख पड़ती थी। रास्ता
चलते-चलते जब नींद में अलसाई हुई आँखों पर पलकें गिरने लगती, तब मालूम
होता कि कितनी थकान हो गई है ! रात बीतने से पहले ही इन केन्द्रों से हट
जाना पड़ता था और सबेरा होने पर अनेक काम करते हुए भी रात की आलो-
चना का प्रसंग दुबारा बातचीत करने के लिए मानो प्रतिक्षण अवसर ढूँढ़ता रहता
था और कभी-कभी दिन को काम-काज करते समय न जाने कब उस 'आत्म-
समर्पण-योग' की भावना आकर हम पर प्रभाव जमा लेती थी ।”
सच्चरित्रों के साथ बुरे भी
इस ग्रन्थ में सान्याल बाबू ने मि० पिंगले, निधानसिंह, गुरमुखसिंह तथा अन्य
क्रान्तिकारियों के जीवन पर प्रकाश डाला है। इसमें संदेह नहीं कि कितने ही
अवांछनीय व्यक्ति क्रान्तिकारियों के दल में शामिल हो गए। लेखक ने लिखा
है कि सभी बड़े-बड़े आन्दोलनों में सच्चरित्र पुरुषों के साथ-साथ नरपिशाच भी
घुस पड़ते हैं ! लेखक के शब्दों में, “यह आन्दोलनों का दोष नहीं है, यह तो
हमारे मनुष्य-चरित्र का ऐब है। शायद लेनिन ने भी कहा था कि प्रत्येक सच्चे
बोलशेविक के साथ कम से कम 39 बदमाश और 60 मूर्ख उनके दल में मिल
गए थे और मैंने श्रद्धेय शरच्चन्द्र चट्टोपाध्याय से सुना है कि देशबन्धुदास ने भी
कदाचित् कहा था कि वकालत करते-करते हम बुड्ढे हो गए और इस बीच में
हमको बड़े-बड़े धोखेबाजों से भी साबिका पड़ा, किन्तु असहयोग आन्दोलन में

क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का आत्म-चरित्र / 29
हमने जितने धोखेबाज और दगाबाज आदमी देखे हैं, वैसे जिन्दगी-भर में नहीं
देखे थे !"
यद्यपि साधारण पंजाबियों के चाल-चलन की उन्होंने कठोर आलोचना की
है, फिर भी उनके गुणों का भी विशद वर्णन किया है। एक जगह उन्होंने लिखा
है—"पंजाब में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ ही अधिक बदनाम हैं, किन्तु इसी पंजाब
में उस दिन सतीत्व की ऐसी गोरवोज्ज्वल स्निग्ध किरण प्रकट हुई थी, जिसकी
तुलना इस कलिकाल में मिलनी कठिन है। डी० ए० वी० कालेज लाहोर के
भूतपूर्व अध्यापक भाई परमानन्द के चचेरे भाई बालमुकुन्द दिल्ली षड्यन्त्र के
मुकदमे में गिरफ्तार किये गए। उनके भाई बालमुकुन्द के पूर्व पुरुष मोतीदास
को सिखों के अभ्युत्थान-समय में आरे से चीरकर मार डाला गया था। गिरफ्तार
होने से एक वर्ष पहले भाई बालमुकुन्द का विवाह हुआ था। उनकी स्त्री श्रीमती
रामराखी परम सुन्दरी ललना थी। उम्र उनकी नई थी ही। जिस दिन उनके
स्वामी गिरफ्तार हुए, उसी दिन से वह व्याकुल हो गई और अनेक प्रकार से देह
को सुखाने लगीं। फिर जब भाई बालमुकुन्द को फांसी का हुक्म हो गया तब वह
उनसे मिलने गई। किन्तु उनके मर्माश्रुओं ने जी भरकर स्वामी के दर्शन न करने
दिये। घर लौटकर वह एक प्रकार से अधमरी दशा में समय बिताने लगीं। एक
दिन वह अपने कमरे में थी कि बाहर से रोने का कोलाहल सुन पड़ा। कमरे से
बाहर आने पर श्रीमती रामराखी को असल बात मालूम हो गई। वह अब और
न सहन कर सकी। स्वामी का मृत्यु-समाचार पाकर सती-साध्वी, खासी नीरोग
दशा में, स्वामी का ध्यान लगाकर मानो स्वामी से जा मिलीं। मिट्टी से मिल
जाने के लिए ही मानो उनकी देह इस लोक में पड़ी रह गई ! ऐसे पतिप्रेम और
आत्मोत्सर्ग की तुलना है कही !"
'बन्दी जीवन' के प्रथम भाग में श्री रासबिहारी बोस के विषय में जो कुछ
लिखा गया है, उसे पढ़कर उनके अदम्य उत्साह, अद्भुत साहस तथा अनोखी सूझ-
बूझ की प्रशंसा करनी पड़ती है। निस्सन्देह वह उच्चकोटि के क्रान्तिकारी थे।
द्वितीय भाग में लेखक महोदय ने रासबिहारी बोस की दो चिट्ठियाँ उद्धृत
की हैं। प्रथम पत्र में, जो 12 अप्रैल, 1922 का है, उन्होंने लिखा था—"अवश्य
ही अब गुप्त-कार्य करने की कोई आवश्यकता नही, इस विषय में तुम्हारे साथ
मेरी पूरी सहमति है। अब तक हमे अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के विषय में कुछ
भी ज्ञान न था; हमने अब तक भारत की ओर ही ध्यान रखा था, किन्तु अब मैं
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति कुछ-कुछ समझने लगा हूँ। इससे मेरे पहले विचारों में
बहुत परिवर्तन हो गया है। एक बात याद रखो—हमें अन्त में सारे संसार का
प्रश्न हल करना होगा, हमारे भाग्य में यही लिखा है। संसार में नवीन युग की,
सत्य और शान्ति की, स्थापना का दायित्व भारत के ही सिर पर है। भारत की
स्वाधीनता इसी उद्देश्य का साधन है, यह स्वयं उद्देश्य नहीं है।"
श्री बोस महोदय ने द्वितीय पत्र में फिर लिखा था—"मेरी दृष्टि पहले से