सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 16

तरह वह प्रतिभा नहीं है, वह सम्यक् दृष्टि भी नहीं है, जिसके कारण एक दिन
भारतवर्ष सभ्यता के चरम शिखर पर आरूढ़ था। मुझे तसल्ली नहीं हुई। गीता
के कर्मयोग के आदर्श ने मुझे बहुत कुछ सहारा दिया; उपनिषद् से भी मुझे इस
बात का सहारा मिला। विवेकानन्द की वाणी में कर्मयोग एवं संन्यास दोनों तरह
की ही बातें मिलीं। लेकिन प्रामाणिक रूप से मुझे यह सबूत नहीं मिला कि कर्म
का मार्ग ही एकमात्र सत्य रास्ता है। तब मैंने यह निश्चय किया कि सम्भवतः
हम अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार योग, कर्मयोग या संन्यासयोग को ग्रहण कर
सकते हैं, कोई रास्ता किसी दूसरे रास्ते से न छोटा है, न बड़ा। अपनी-अपनी
प्रकृति के अनुसार जिस रास्ते को हम ग्रहण करेंगे वही रास्ता हमारे लिए सही
है, एवं और सब रास्ते गलत हैं। कम-से-कम दूसरे रास्ते में जाने से हमें अवश्य
कुछ-न-कुछ हानि होगी। अब यह निर्णय कैसे होगा कि मेरी प्रकृति कैसी है, एवं
कौन-सा रास्ता मेरी प्रकृति के अनुकूल है ? साधु-संगति करके एवं शास्त्र-वचनों
से मुझे यह पता चला कि ऐसा निर्णय करने के लिए तीन साधन मौजूद हैं। एक
तो अपनी विचारबुद्धि है, दूसरा सतगुरु की सहायता है और तीसरा शास्त्रवचन
है। इन तीनों में यथार्थ मेल होना चाहिए। केवल शास्त्रवचन से काम नहीं
चलेगा। कारण, एक तो शास्त्र बहुत हैं, इसलिए उनमें से अवश्य ही चुनाव
करना पड़ेगा। यह बात सच है कि शास्त्रवचन भी अभिज्ञता के आधार पर स्थित
हैं, तथापि विभिन्न महापुरुषों ने अलग-अलग रास्ते पर चलकर सत्यानुभूति की
है। इसलिए कौन-सा मार्ग मेरे लिए प्रशस्त है, इसका निर्णय शास्त्रवचन मात्र
से ही नही हो सकता इसके लिए शिक्षक की आवश्यकता है। जब संसार के
प्रत्येक काम में शिक्षक की आवश्यकता है तो क्या सत्यानुसंधान के काम में ही
शिक्षक की आवश्यकता नहीं होगी ? किन्तु केवल शिक्षक से ही काम नही चल
सकता। शिक्षा लेनेवाला यदि उपयुक्त न हो, तो शिक्षक क्या करेगा ?
एवं कौन मेरा शिक्षक होगा यह निर्णय भी तो मुझे ही करना पड़ेगा ? इस-
लिए अन्त में अपनी विचारबुद्धि पर ही निर्भर करना पड़ता है। लेकिन अपनी
प्रकृति को छोड़कर उसका उल्लंघन करके मैं कुछ नही कर सकता। इसलिए
भारतीय साधन-पद्धति में सर्वप्रथम बात यह है कि सत्य की खोज करने के पहले
अपने को निष्पक्षतापूर्ण बनाना पड़ता है। सम्पूर्णतया निष्पक्षपाती हुए बिना
सत्य की खोज सम्भव नहीं है। लेकिन यथार्थ रूप में निष्पक्षपाती होना आसान
बात नहीं है। इसके लिए हमें स्वार्थशून्य होना आवश्यक है। और स्वार्थशून्य
हम तभी हो सकते हैं, जब हम अपनी वासना के वशीभूत न हों। वासनातीत
होना और वैराग्यवान होना एक ही बात है। इसलिए भारतीय साधना-पद्धति में
वैराग्य होना सर्वप्रथम आवश्यक है। वासनातीत होने का अर्थ यह नहीं है कि
मुझमें किसी प्रकार की वासना न हो, बल्कि वासनातीत होने का अर्थ यह है कि मैं
किसी वासना के अधीन न होऊँ, प्रत्येक वासना मेरे अधीन रहे। इस प्रकार से
अपने को यथासम्भव हर एक प्रकार के संस्कारों से मुक्त रखकर तब सत्यानुसंधान