बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका / 15
में प्रवृत्त होना चाहिए। साधु-संगति के फलतः एवं प्राचीन साहित्य के अनुशीलन
के परिणामतः मैं इसी नतीजे पर पहुँचा हूँ। मेरे मित्र और मैंने अलग-अलग रास्ते
अख्तियार किये लेकिन छः महीने तक हम दोनों तीव्र द्वंद्व के भीतर से गुजरे। मैंने
बाद को यह भी देखा कि हमारे सैकड़ों भाई, भारतीय आदर्श की दुहाई देकर,
आध्यात्मिकता के बहाने, अपनी स्वार्थबुद्धि से प्रणोदित होकर, तामसिक वृत्ति के
आवेश में आकर भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में भाग लेने में पश्चात्पद रहे। ऐसे
अध्यात्मवादियों के लिए घर-गृहस्थी के काम करने में कोई बाधा नहीं है, ये मजे
से खाते-पीते हैं, बाज़ार करते हैं, अपने परिवार का प्रतिपालन करने के लिए
तरह-तरह के काम-धंधे भी करते हैं, शादी भी करते हैं, सन्तान-उत्पादन एवं
सन्तान-पालन भी करते हैं, अर्थात् गृहस्थ आश्रम के सभी काम करते हैं, केवल
राजनीति में भाग लेने के अवसर पर धार्मिक जीवन व्यतीत करने की दुहाई देकर
भारतीय अध्यात्मवाद की आड़ में अपनी कायरता को छिपाते हैं।
राजनीतिक जीवन मे मेरा प्रथम मानसिक द्वंद्व इस प्रकार का रहा। जीवन
में चाह तो यह थी कि हमारे भारतवर्ष में फिर ऐसे महापुरुष का जन्म हो, जिसमें
गुरु रामदास एवं शिवाजी की सद्गुणावली एक व्यक्तित्व में विकसित होकर
दिखलाई दे, अर्थात् कर्मजीवन ज्ञान के प्रकाश से उद्भासित हो। मेरे दिल में
यह धारणा बद्धमूल हो गई थी कि कर्महीन होने के कारण भारत का अधःपतन
हुआ है। एवं भारत की उन्नति यथार्थ रूप में तभी हो सकती है जब कर्मजीवन
भी प्रकृत ज्ञान के आलोक से विशुद्ध हुआ हो। लेकिन वास्तविक जगत् में मेरा
वांछित आदर्श-पुरुष मुझे नहीं मिला। यदि स्वामी विवेकानन्द या स्वामी राम-
तीर्थ के तुल्य महापुरुष भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन में अग्रणी होते, तभी मुझे
प्रकृत सन्तोष होता। श्री अरविंद घोष में मेरे कल्पित आदर्श पुरुष की छाया
मिली। मैं श्री अरविंद घोष से पाण्डिचेरी में सन् 1911 में मिलने के लिए भी
गया था, लेकिन दुर्भाग्यवश मिल नहीं पाया। इसके बारे में विशेष रूप से अन्य
स्थान पर कहूँगा। आखिर घूमते-घूमते ऐसे क्रान्तिकारी दल में मैं शामिल हो
गया जिस दल के नेतागण अरविंद घोष के दार्शनिक विचारों से अंतरंग रूप से
प्रभावित हो रहे थे। इससे बढ़कर सन्तोष अपने जीवन में मुझे बहुत कम मिला
है। मेरे मानसिक द्वंद्वों के इस अंश को बिना समझे 'बन्दी जीवन' के बहुत-से
स्थानों को पाठक ठीक से नहीं समझ पाएँगे। ऐसी मानसिक परिस्थिति में मैंने
क्रान्तिकारी दल में काम किया एवं इसी मनोवृत्ति को साथ लेकर मैं जेल गया,
कालेपानी गया और लौट भी आया।
सन् 1920 के बाद जब मैं कालेपानी से लौटकर आया तब महात्मा गांधी
भारत के राष्ट्रीय क्षेत्र में अपनी कार्यप्रणाली को लेकर अवतीर्ण हो चुके थे।
महात्मा गांधी की अहिंसा नीति के कारण, एवं महात्मा गांधी ऐसे महान् व्यक्ति
का भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के कारण भारतीय
क्रान्तिकारी आन्दोलन को काफ़ी बाधा पहुँची। महात्मा गांधी यह प्रचार करने