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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 408 में से

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पृष्ठ 26

24 / बन्दी जीवन
जीवन रहा। इस 'बन्दी जीवन' का अवलम्ब ग्रहण करके मैं बतलाना चाहता
हूँ कि आखिर मैं कैद क्यों किया गया था। यह पुस्तक आज मैं इसलिए लिख रहा
हूँ जिससे कि भारत के भविष्यत् इतिहास के कुछ अध्याय ठीक-ठीक लिखे जा
सकें।
भारत का भाग्य एक महान् युग-सन्धि के बीच होकर दौड़ता जा रहा है।
भारत के भीतर और बाहर क्रान्ति की भयंकर आग, भगवान् की गुप्त प्रेरणा
से अपने निर्दिष्ट मार्ग पर—और वह भी मानो अपने लिए अनुकूल बवंडर
बनाकर—फैलती जा रही है, ऐसे ही एक बवंडर में उसी विधाता की मर्जी से
मैं भी पड़ गया था।
मेरी ही तरह और भी कुछ युवा पुरुष, अपने मर्मस्थल की अव्यक्त वेदना
से अधीर होकर, जान-बूझकर या बे-समझे-बूझे विधाता का अभीष्ट सिद्ध करने
के लिए ही दलबद्ध हो गये थे। मुद्दत से मैं चाहता था कि उस दल के भीतरी
मर्म का, जो कि काम-काज के बाहरी आडम्बर में छिप गया था, एक संक्षिप्त
इतिहास लिखूँ। आज उसी मर्म व्यापी इच्छा को चरितार्थ करने की चेष्टा कर
रहा हूँ।
हम लोग अक्सर घटना को ही महत्त्व दे देते हैं—उसी को बड़े आकार में
देखते हैं; किन्तु यह नहीं समझते कि घटना की ओट में—फिर वह घटना कितनी
ही क्षुद्र क्यों न हो—महाशक्ति की लीला रहती है, और वही असल में घटना
की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान होती है। सफलता का मोह हम लोगों को प्रति
पग पर घेरता है। विचार के द्वारा उस मोह का छेदन हो जाने पर भी प्राण उस
मोहावेष्टन को काटकर अलग कर देने में समर्थ नहीं होते। किन्तु बड़ी-बड़ी
घटनाओं के मुकाबले में जीवन-यापन की मामूली बातें भी कुछ कम महत्त्व की
नहीं होती। घटनाओं का आरम्भ विचार-जगत् में ही हुआ करता है।
इस सन्दर्भ में व्यक्तिगत चरित्र की आलोचना होने पर भी वह व्यक्तिगत
रूप में न की जायेगी। व्यक्ति से परिचय हुए बिना समष्टि से परिचय नहीं हो
सकता। इसलिए तो व्यक्तिगत चरित्र की आलोचना आवश्यक हो जाती है।
यह परिचय देने में मेरे अपने और अपने दल के बहुतेरे छिद्र प्रकट हो
जाएँगे। तो इसलिए क्या मैं उन दुर्बलताओं और संकीर्णताओं को छिपाने की
व्यर्थ चेष्टा करूँ जिन्होंने कि हमें भीतर-ही-भीतर पंगु बना दिया है? ऐसी चेष्टा
व्यर्थ तो होगी ही क्योंकि एक-न-एक दिन सत्य प्रकट होगा और जरूर होगा,
और साथ ही छिपाने का उद्योग करने से न सिर्फ सत्य का अपलाप ही होगा
अपितु उससे हमारा पंगुत्व—निकम्मापन—भी और अधिक बढ़ जायेगा।
इतिहास के पृष्ठों में 'सत्यम् ब्रूयात् प्रियम् ब्रूयात् मा ब्रूयात् सत्यमप्रियम्' सार्थक
नहीं।