बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका / 21'
को हटा देने की इच्छा से भारत में जो अभिनव आन्दोलन आरम्भ हुआ है वह
आन्दोलन कितना व्यापक और गम्भीर है, कहाँ-कहाँ पर उसमे कोर-कसर और
भूल-चूक रह गई है, वह आन्दोलन किस परिमाण मे सार्थक हुआ और कितना
अपूर्ण रह गया है तथा उसमें यह अधूरापन क्यों रह गया—इन सारी बातो का
जान लेना क्या प्रत्येक भारतवासी का कर्तव्य नही ? इन सारी बातो को जानने
के लिए इस ढंग की बहुतेरी पुस्तकों के प्रकाशित होने की आवश्यकता है जिस
ढंग की कि यह पुस्तक 'बन्दी जीवन' है । ऐसी-ऐसी जितनी पुस्तकें प्रकाशित
होगी मुख्य विषय को समझना उतना ही आसान हो जायगा ।
मेरा वक्तव्य यह है कि 'कारा-काहिनी' के ढंग की जितनी पुस्तकें प्रकाशित
हुई हैं उनमे अरविन्द बाबू की 'कारा-काहिनी' और बाबू नलिनी किशोर-लिखित
'बागलाय विप्लव-वाद' नामक पुस्तके मुझे सर्वश्रेष्ठ जंची । हाँ, अरविन्द बाबू
ने सिर्फ कलकत्ते के कारागार की ही कथा लिखी है, और मैं चाहता हूँ कि
लाहौर, बनारस, कलकत्ता और अण्डमन की बाते इसी ढंग से लिखूं तथा इस
सिलसिले मे पजाब, युक्त-प्रदेश, बगाल और अग्रेज-शासित भारत के अन्यान्य
प्रदेशो के मानव-चरित्र की भी थोडी-बहुत चर्चा करूँ । सच पूछो तो 'बागलाय
विप्लव-वाद' के लेखको ने वे बाते जो कि मुझे कहनी है, मेरी अपेक्षा कही अच्छे
ढग से प्रकट कर दी है । भाषा पर यद्यपि मेरा उनकी भाँति अधिकार नही है,
फिर भी अभी तक बहुतेरी बाते प्रकट करने को रह गई हैं, बगाल की बातो का
वर्णन करते समय ही मैं उनकी चर्चा करना चाहता हूँ। मै बखूबी जानता हूँ कि
भाषा की दृष्टि मे मैं सुन्दर नही लिख सका, और इस दृष्टि से तो उपेन्द्र बाबू की
पुस्तक के साथ किसी की भी पुस्तक टक्कर लेने योग्य नही । ताना देने और
मज़ाक करने की ऐसी कुशलता बगाल मे कदाचित् ही किसी और लेखक मे हो ।
उपेन्द्र बाबू निस्सन्देह बगाल के शक्तिशाली लेखक है । किन्तु उनकी 'आत्म-कथा'
मे बहुत ही गुरुतर विषयो की आलोचना भी बिलकुल साधारण रीति पर की
गई है, मानो उनका उसी मे कौतुक है। इसी कारण 'निर्वासितेर आत्म-कथा'
चित्ताकर्षक होने पर भी मर्मस्पर्शिनी नही हुई । और वारीन्द्र बाबू की 'द्वीपान्तरेर
कथा' मे जो भाग उपेन्द्र बाबू का लिखा हुआ है वही मुझे अच्छा लगा । उक्त
पुस्तक का आधे से भी अधिक अंश उपेन्द्र बाबू का ही लिखा हुआ है। बाबू वारीन्द्र
कुमार घोष ने यद्यपि लिखा यही है कि "यह दो मुखो की एक ही बात है' किन्तु
यह सभी की समझ मे आ जाता है कि यह दो मुखो की साफ-साफ अलग-अलग
बाते हैं। वारीन्द्र बाबू के लिखे हुए अश मे, बीच-बीच मे यद्यपि खासा कवित्व
है, तथापि, सच तो यह है कि उसमे भी विप्लववादियो की मर्म-कथा प्रकट
नही हुई । इसके सिवा इसमे इस द्वीपान्तर की कथा की बहुतेरी बातें आसानी
से दबा दी गई है। ऐसा क्यो हुआ है, इसका विचार यथास्थान करने की इच्छा
है ।
'बन्दी जीवन' के इस खण्ड मे यही लिखने की चेष्टा की गई है कि यूरोप के