बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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ऊँचा बौद्धिक स्तर
यदि कोई यह ख्याल करे कि ये क्रान्तिकारी लोग निरे हत्यारे थे, तो उसकी
यह बड़ी भारी भूल होगी। वे लोग प्रायः आपस में बड़े ऊँचे धरातल से विचार-
विमर्श करते थे। निम्नलिखित वाक्य हमारे इस कथन के प्रमाण हैं—
“अन्त में हम लोगों के बहुत पुराने—किन्तु फिर भी 'नित नये' 'आत्म-
समर्पण योग' की चर्चा निकली। जहाँ एक बार इसकी चर्चा निकल पड़ती वहाँ
फिर जल्द समाप्त न होती थी। मार्ग भले ही एक हो, और सब लोग एक ही
आदर्श से प्रोत्साहित हों, तो भी वही एक बात, एक ही भाव, भिन्न-भिन्न
व्यक्तियों में कितनी ही नवीन रीतियों से विकसित होने का प्रयत्न करता है।
इसलिए एक भाव के उपासक और उसी एक मार्ग के पथिक होने पर भी हम
लोगों के बीच परस्पर असंख्य स्थानों में मतभेद रहता था। मेल तो काफी रहता
था, किन्तु बेमेल ही क्या कम था ? जिस आदर्श से प्रेरित होकर हम लोग अपने
व्यक्तिगत या समष्टिगत जीवन को नियंत्रित कर रहे थे, उस भाव-स्रोत की
तरंग यद्यपि एक ही स्थान से आती थी, तथापि विभिन्न आधारों में उसने अपनी
विचित्रता की महिमा को स्थिर रखा था। हमारे आदर्श की छोटी-मोटी बातों के
झगड़ों में कितनी ही रातें बीत गई हैं, फिर भी उलझनें सुलझी नहीं हैं। एक
व्यक्ति दूसरे को कुछ-कुछ समझकर जब घर से बाहर निकल आता, तब उषा
की लालिमा अधखिले फूल की तरह, पूर्व क्षितिज में दीख पड़ती थी। रास्ता
चलते-चलते जब नींद में अलसाई हुई आँखों पर पलकें गिरने लगती, तब मालूम
होता कि कितनी थकान हो गई है ! रात बीतने से पहले ही इन केन्द्रों से हट
जाना पड़ता था और सबेरा होने पर अनेक काम करते हुए भी रात की आलो-
चना का प्रसंग दुबारा बातचीत करने के लिए मानो प्रतिक्षण अवसर ढूँढ़ता रहता
था और कभी-कभी दिन को काम-काज करते समय न जाने कब उस 'आत्म-
समर्पण-योग' की भावना आकर हम पर प्रभाव जमा लेती थी ।”
सच्चरित्रों के साथ बुरे भी
इस ग्रन्थ में सान्याल बाबू ने मि० पिंगले, निधानसिंह, गुरमुखसिंह तथा अन्य
क्रान्तिकारियों के जीवन पर प्रकाश डाला है। इसमें संदेह नहीं कि कितने ही
अवांछनीय व्यक्ति क्रान्तिकारियों के दल में शामिल हो गए। लेखक ने लिखा
है कि सभी बड़े-बड़े आन्दोलनों में सच्चरित्र पुरुषों के साथ-साथ नरपिशाच भी
घुस पड़ते हैं ! लेखक के शब्दों में, “यह आन्दोलनों का दोष नहीं है, यह तो
हमारे मनुष्य-चरित्र का ऐब है। शायद लेनिन ने भी कहा था कि प्रत्येक सच्चे
बोलशेविक के साथ कम से कम 39 बदमाश और 60 मूर्ख उनके दल में मिल
गए थे और मैंने श्रद्धेय शरच्चन्द्र चट्टोपाध्याय से सुना है कि देशबन्धुदास ने भी
कदाचित् कहा था कि वकालत करते-करते हम बुड्ढे हो गए और इस बीच में
हमको बड़े-बड़े धोखेबाजों से भी साबिका पड़ा, किन्तु असहयोग आन्दोलन में