बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका / 13
मनुष्य का श्रेष्ठ आदर्श है जीवन में ईश्वर की उपलब्धि करना । ईश्वर का
साक्षात्कार हुए बिना हम जो कुछ भी करेंगे उससे समाज का यथार्थ कल्याण
होगा या नहीं यह कहना कठिन है । सत्य की अनुभूति हुए बिना हम कैसे ठीक
रास्ते को अख्तियार कर सकते हैं ? ईश्वर का साक्षात्कार होने के पश्चात् ही
हम यथार्थ रूप में समझ सकते हैं कि क्या सत्य है और क्या असत्य, क्या कल्याण-
कारी है और क्या अमंगलप्रद । ईश्वर का साक्षात् किए बिना समाज का
कल्याण करने जाना मानो अन्धे होकर, अन्धे को रास्ता दिखलाना है। ईश्वर
का साक्षात्कार करने के पश्चात् ईश्वर की आज्ञा से, ईश्वर की इच्छानुसार जब
हम समाज की सेवा मे लगेगे तभी हमारी समाज-सेवा सार्थक हो सकती है।
अपने पक्ष की पुष्टि के लिए मेरे मित्र ने स्वामी विवेकानन्द एवं परमहंस राम-
कृष्ण देव की जीवनी का उल्लेख किया ।
इस प्रकार जीवन मे सर्वप्रथम आदर्शगत द्वन्द्व उपस्थित हुआ। एक तरफ मैं
समाज को छोड़ नही सकता था; दूसरी तरफ अपने जीवन के परम मित्र से भी
मैं दूर नही रह सकता था, लेकिन मेरे मित्र मेरे साथ चलने के लिए तैयार न थे।
मैं भी अपने मित्र के रास्ते पर चलने को तैयार न था । छः महीने तक दिन और
रात इस उलझन मे फँगे रहे । उस किशोरावस्था की मित्रता मे एक अजीब
मोहिनी शक्ति थी। हम एक-दूसरे को छोड़ भी नही पाते थे, ग्रहण भी नही
कर पाते थे । आज भी मेरे मित्र संन्यास मार्ग में अवस्थित हैं और मैं गृहस्थ
आश्रम मे जकडा हुआ गोता खा रहा हूँ ।
अपने मित्र के बताने पर मैने स्वामी विवेकानन्द एवं श्रीरामकृष्ण परमहंस-
देव की जीवनी पढी, उनकी तमाम उक्तियो को लेकर एकाग्र मन से एकान्त में
गम्भीर रूप से मनन किया । उपनिषद् एवं गीता अनुवाद की सहायता से बार-
बार पढी, साधु-संगति भी करने लग गया । इस प्रकार से हिन्दू-समाज की मर्म-
कथा को भली प्रकार से समझने की मैंने अपने अन्तरतम मे चेष्टा की । साधु-सन्तों
की संगति मे जीवन में प्रभूत लाभ हुआ इसमें कोई सन्देह नही; लेकिन जी को
तसल्ली नही हुई । मेरी समझ मे यह बात नही आई कि हमारे समाज के श्रेष्ठ
महापुरुष क्यो समाज में नही आते, क्यों सामाजिक काम मे अग्रणी नहीं होते ?
साधु-सन्तो के ससर्ग मे आकर मैने यह देखा कि साधन-भजन करना छोड़कर ये
लोग एक कदम भी इधर-उधर नही जाते । यहाँ तक कि साधन-भजन के बारे में
भी इनके जो कुछ अनुभव हैं उन्हे भी ये पुस्तक के आकार में समाज को देना
नही चाहते । इनमें त्याग है, अध्ययनशीलता है, दत्तचित्त होकर एक काम में
लग जाने की शक्ति है, लेकिन ये समाज-सेवा के किसी काम में आना नहीं चाहते ।
मैंने अपने मन में यह सोचा कि यदि हमारे पूर्वज भी ऐसे ही होते तो आज हमें न
पाणिनि जैसा व्याकरण ही मिलता, न वेद-वेदान्त, उपनिषद्, ज्योतिष, गणित या
आयुर्वेद शास्त्र ही प्राप्त होते । मेरे मन में यह सन्देह पैदा हुआ कि सम्भव है
आजकल के साधु-सन्त चाहे जितने भी भले हों, लेकिन इनमें प्राचीनकाल की