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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 408 में से

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पृष्ठ 22

प्रथम संस्करण की भूमिका
किसी समाज को पहचानने के लिए उस समाज के साहित्य से परिचित होने
की परम आवश्यकता होती है, क्योंकि समाज के प्राणों की चेतना उस समाज के
साहित्य में भी प्रतिबिम्बित हुआ करती है। आज भारत ध्वंस और निर्माण के बीच
क्रमशः अपनी सार्थकता को खोजता फिरता है, अतः भारत का समाज यदि सजीव
होगा तो भारत के प्राणों की इस अशान्ति का चित्र उसके साहित्य में अवश्य ही
अपने प्रतिबिम्ब को अंकित कर देगा। हम भारतवासी आज यह नहीं जानते कि
इस अशान्त अटूट गति का वेग कितना प्रचण्ड है, किन्तु हमारे पश्चात् आनेवाली
पीढ़ी इस गति के वेग को बखूबी बतला सकेगी। भारत के इस ध्वंस और निर्माण
के उद्योग के बीच जितनी बड़ी शक्ति का स्फुरण हो रहा है उसके स्वरूप को
जानने का समय शायद अभी आया नहीं। इस बनाव-बिगाड़ का एक चित्र—भले
ही वह अस्पष्ट और मलिन हो—भारत की इस भाग्य-परीक्षा की एक धुँधली-सी
छाया आज भारत के साहित्य में भी धीरे-धीरे प्रकट हो रही है। इसी से 'निर्वा-
सन-काहिनी', 'कारा-काहिनी', 'द्वीपान्तरेर कथा', 'निर्वासितेर आत्म-कथा' और
'बांग्लाय विप्लव-वाद' आदि ग्रन्थ बंग भाषा के साहित्य में क्रमशः प्रकाशित हो
रहे हैं। भारत के प्राण आज जैसे कुछ छटपटा रहे हैं, उस छटपटाहट (अशान्ति) का
पूरा स्वरूप उसके साहित्य में प्रकाशित नहीं हो सका, अभी नहीं हुआ तो न सही,
क्रमशः आगे होगा। 'निर्वासितेर आत्म-कथा' इत्यादि पुस्तकें जिस श्रेणी की हैं
उस श्रेणी के अन्तर्गत मेरी यह पुस्तक 'बन्दी जीवन' भी है। इस श्रेणी की कई
पुस्तकें जब पहले से मौजूद थीं तब फिर यह 'बन्दी जीवन' मैंने क्यों लिखी?
इसके विशेष कारण सुन लीजिए।
मुझे यह कहना है कि सजीव जातियों में छानबीन करने की प्रवृत्ति बहुत
प्रबल होती है। इस जाँच-पड़ताल करने की प्रवृत्ति के कारण ही सजीव जातियाँ
अपने समाज के रत्ती-रत्ती समाचार के लिए चौकन्नी रहती हैं। शायद एक देहाती
के वंशावृक्ष-कुल का पेड़-पत्ता जानने में किसी ने अपनी सारी उम्र इस आशा से
बिता दी थी कि इस प्रकार तथ्य संग्रह कर देने से कदाचित् किसी दिन किसी को
वंशानुक्रम की धारा का पता लगाने में सुभीता हो जाय। भारत के वर्तमान
समाज की भीतरी वेदना का परिचय, उसका परिमाण और उसका कारण जानने
का समय क्या अभी तक उपस्थित नहीं हुआ? उस भीतरी वेदना—दर्दे दिल—