बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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पितामह भीष्म का महत् चरित्र क्या कुरुक्षेत्र के महा संग्राम में उनकी हार-जीत
पर अवलम्बित है ?"
सान्याल साहब ने पुस्तक के प्रथम भाग को लीलामय भगवान् के चरण-
कमलों मे अर्पित किया था और द्वितीय भाग का समर्पण इस प्रकार था—"जिन
को जीवन मे नाना रूप से दुःख-कष्ट ही देता रहा, उत्कट इच्छा रहने पर भी
सांसारिक रीति से जिनको कुछ भी सुखी नही बना सका, दिन और रात सुख
और दुःख मे, सम्पद् और विपद मे, हर घड़ी जिनकी याद करके एकदम आनन्द
और दुःख से विह्वल-सा हो उठता हूँ, जो मेरे दुःखो मे साझी होकर केवल दुःख
ही दुःख पाती रही, अपनी उन्ही परम स्नेहमयी जननी के श्रीचरणो मे यह अपना
क्षुद्र ग्रन्थ श्रद्धा और भक्ति-सहित समर्पित करता हूँ।"
हृदय की कोमलता
पुस्तक के इन तीन भागो को पढ़कर यह विश्वास हो जाता है कि शचीन्द्र
बाबू बडी उच्च कोटि के क्रान्तिकारी थे, जिन्होने हिंसात्मक प्रवृत्तियो मे संलग्न
रहने पर भी अपने हृदय की कोमलता को नष्ट नही होने दिया। उनके इन ग्रन्थो
मे अनेक महापुरुषो और छोटे-से-छोटे कार्यकर्ताओ के जीवन की झाँकियाँ देखने
को मिलती है। सर्वश्री मालवीयजी, सी० आर० दास, जवाहरलाल नेहरू, सुरेन्द्र-
नाथ बनर्जी और रासबिहारी बोस से लगाकर साधारण से साधारण कार्यकर्ता
तक को उन्होने कृतज्ञतापूर्वक याद किया है। जिन दिनो श्री उग्रजी ने अपना साहि-
त्यिक जीवन प्रारम्भ ही किया था, उन दिनो सान्याल बाबू ने उन्हे अपने दल मे
मिलाने की कोशिश की थी। यद्यपि उसमे वह असफल हुए फिर भी उन्होने
उग्रजी की यथोचित प्रशंसा ही की है। उन्होने लिखा है—"इसमे तो कोई संदेह
नही कि उनकी लेखनी मे अत्यन्त शक्ति है, लेकिन उनकी रुचि मे परिवर्तन हो
जाने के कारण उनका सृष्ट साहित्य समाज को आशानुरूप कल्याणप्रद सिद्ध नही
हुआ, यह और बात है, परन्तु इसमे कोई संदेह नही है कि वह प्रतिभाशाली लेखक
है। उनकी सहायता से हमारे दल को एक ऐसा महत्त्वपूर्ण लाभ हुआ कि जिसके
लिए हम सब सदा उनके कृतज्ञ रहेगे।"
श्री सान्याल बाबू ने क्रान्तिकारी सिखो की उदारता की दिल खोलकर दाद
दी है। उन्होने लिखा है—"रुपए-पैसे की चर्चा निकलते ही उन्होने तुरन्त सोने
की गोल-गोल बडी-बडी चकतियाँ मेरे आगे रख दी, जो अमेरिका मे प्रचलित
सोने के सिक्के थे। हिसाब लगाने पर वे कई हजार रुपए के हुए। प्रत्येक दल ने ऐसा
बर्ताव किया था। गदर के कार्य मे इन लोगो को जिस प्रकार दिल खोलकर अपनी
गाढी कमाई का धन दान करते देखा है, वैसा दृश्य बंगाल मे देखने को नही मिला।
इसमे संदेह नही कि ऐसा उत्साह और आन्तरिकता उन्ही सिखो मे थी, जो कि
अमेरिका की यात्रा कर आए थे। इसके सिवा पंजाब के निवासियो ने प्रायः इन
लोगो के साथ सहानुभूति प्रकट नही की। हाँ, पठान और सिख सैनिको के साथ