बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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महायुद्ध के समय भारत में क्रान्ति की कैसी-क्या तैयारी की गई थी। रौलट-
रिपोर्ट में तो इसका यह पहलू बिलकुल ही छिपा दिया गया है परन्तु 'टाइम्स
हिस्ट्री ऑफ दी ग्रेट वार' (Time's History of the Great War, volume
dealing with India) नाम की पुस्तक में इसका थोड़ा-सा उल्लेख आ गया
है। माना कि क्रान्ति की इस तैयारी का उपयोग नहीं किया जा सका, फिर भी
सफलता या विफलता के दृष्टिकोण से इसकी महानता का फैसला करना ठीक
नहीं। पितामह भीष्म का महत् चरित्र क्या कुरुक्षेत्र के महासंग्राम में उनकी हार-
जीत पर अवलम्बित है ?
इस पुस्तक के दूसरे खण्ड मे यह बतलाने की इच्छा है कि युद्ध छिड़ने के पूर्व
भारतीय विप्लववादियो की क्या दशा थी और उनके मन की गति ने किस-किस
प्रकार आघात लगने से कैसा-क्या भाव धारण किया था। इसके पश्चात् मेरे
फरार हो जाने की दशा, फिर गिरफ्तार होने और मुकदमा चलने एवं 'बन्दी
जीवन' का वर्णन करने का विचार है। मेरी गिरफ्तारी हो जाने के बाद भी
भारत और बर्मा मे जिस प्रकार क्रान्ति की गुप्त योजना की जा रही थी उसका
भी वर्णन करने का मेरा इरादा है।
सुना है कि वारीन्द्रकुमार के साथी उल्लासकर दत्त अण्डमन टापू मे कहते
थे कि "बडे सख्त लोगो से काम पडा है, ये हाड और मांस तो खाएँगे ही इसके
सिवा चमडी से डुगडुगी मढकर बजाएँगे।" ऐसे सख्त लोगो के हाथ से मुझे कैसे
छुटकारा मिला था, इसका भी अन्त मे वर्णन करने की अभिलाषा है। जीवन में
तरह-तरह की चोटे लगने से अन्त मे मन की क्या दशा हुई, उसको एक बात मे
न कहकर क्रमश. स्पष्ट करने की चेष्टा की जायेगी। मेरी अभी तक यह धारणा
है कि यह पुस्तक तीन खण्डो मे समाप्त होगी, लेकिन कर्मक्षेत्र की विषम उल-
झनो मे पडकर मै नही कह सकता कि इस पुस्तक का कितना अश पूरा लिख
पाऊँगा। कारण, आज तक जितने काम मैंने अपने हाथ मे लिए, किसी को भी मैं
निर्विघ्न रूप से पूर्ण नही कर पाया।
25 अगस्त, 1922
कलकत्ता
—शचीन्द्रनाथ सान्याल