बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिवेदन
आज भूतकाल की बातें लिखने बैठा हूँ। वह समय आज बहुत ही महिमामय
जान पड़ता है। जान पडता है कि जिस प्रकार समय अनन्त है उसी प्रकार
उसकी महिमा भी अनन्त-अपार है। ऐसा लगता है कि समय मानो उसे भी
सुन्दर बना देता है जो कि सुन्दर नही है, वह असंगति मे भी संगति मिला देना
है, उसे बेढगी नही रहने देता। समय की महिमा विचित्र है, उसकी कृपा से
अप्रिय की स्मृति प्रिय हो जाती है।
वास्तव मे अतीत—गुजरे हुए—की स्मृति बड़ी मीठी होती है, वह वीणा के
तार मे सोई हुई झकार की तरह तार पर आघात करते ही मधुर भाव से झंकृत
हो उठती है।
कई बार पिछली बातो की याद दु.ख भी कम नही देती। किन्तु उस दुःख-
दर्द के बीच भी मानो सुख रहता है। उस समय चित्त का मर्मस्थल तक खुल
जाता है, मानो उस अवसर पर अपने आपके साथ बिलकुल निर्जन मे, बहुत ही
गुप्त रूप से, बातचीत होती है।
आशा और निराशा, सुख और दुःख, मानो ज़िन्दगी-भर हमारे साथ खिल-
वाड करते हैं, किन्तु बहुत दिनों तक इनमे से कोई भी नही टिक सकता। सभी
दो दिन दर्शन देकर—हँसाकर या रुलाकर—चले जाते हैं, सिर्फ उनकी याद रह
जाती है।
स्मृति-पट पर बहुतेरी बडी चीजें छोटी हो जाती हैं और छोटी चीजें बड़ा
रूप धारण कर लेती है—कुछ चींजे ऐसी भी है जो मन में ऐसी जा छिपती हैं
कि फिर उनको ढूँढ़ निकालना कठिन हो जाता है।
बनारस षड्यन्त्र में मुझे सजा हुई थी। सन् 1915 की 26वीं जून को मैं
गिरफ्तार हुआ और 14 फरवरी सन् 1916 को आजन्म कालेपानी का तथा सारी
सम्पत्ति जब्त होने का दण्ड मिला। इसके अनन्तर कुछ दिन तक तो काशी के
कारागार में ही रहा, फिर अगस्त महीने में अण्डमन द्वीप को रवाना कर दिया
गया। अगस्त की 18वी तारीख को मैं उस द्वीप के जेलखाने में दाखिल किया
गया। फिर इच्छामय की इच्छा के अनुसार फरवरी सन् 1920 में सम्राट् के
घोषणापत्र के कारण रिहा किया गया।
बस, सन् 15 से लेकर सन् 20 के आरम्भ तक मेरा प्रथम बार का बन्दी