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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 408 में से

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पृष्ठ 14

12 / बन्दी जीवन
बातें मेरे मन में आ-आकर अपनी अभिव्यक्ति के लिए उमड़ी पड़ रही हैं। बात
यह है कि काल के प्रवाह से भारत में आज नई-नई बातें पैदा हो रही हैं, नये
आदर्शों के द्वन्द्व के कारण भारत के राष्ट्रक्षेत्र में आज तरह-तरह की उलझनें
पैदा हो रही हैं। जिस समय मैंने सर्वप्रथम राजनीति में कार्य करना प्रारम्भ
किया था उस समय भी कम उलझने न थीं, लेकिन आज उन उलझनों को पार
करके अब मुझे दूसरी उलझनों का सामना करना पड़ रहा है। इन दोनो युगों
की उलझनों मे जो अन्तर है उसे समझे बिना मेरी वर्तमान परिस्थिति को कोई
समझ नही सकता, एवं आधुनिक युग के आदर्श-गत द्वन्द्वों का स्पष्टीकरण किए
बिना आज मैं इस पुस्तक की भूमिका ठीक तरह से नहीं लिख सकता।
यहाँ पर जीवन की कुछ गूढ़ बातें कहना आवश्यक हो गया है। यद्यपि मैं
यहाँ अपनी आपबीती नही लिखना चाहता, तो भी मुझे अपनी मानसिक स्थिति
का कुछ अंश यहाँ पर खोलना ही पड़ेगा।
जब मैं बालक ही था, तभी से नाना कारणो से मैने सकल्प कर लिया था
कि भारतवर्ष को स्वाधीन किया जाना है और इसके लिए मुझे सामरिक जीवन
व्यतीत करना है। सर्वप्रथम यह भावना मेरे मन मे कैसे आई इसका भी एक
छोटा-सा इतिहास है, अन्य स्थान पर इसकी चर्चा मुझे करनी पड़ेगी। जिस समय
क्रान्तिकारी भावना को लेकर मैने सर्वप्रथम बनारस मे सगठन प्रारम्भ किया
था, सयोगवश उसी समय करीब-करीब मेरी ही उम्र के एक नवीन युवक के साथ
मेरी गहरी मित्रता हो गई थी। यह नवीन युवक अभी कलकत्ता से आये हुए थे।
ऐसी मित्रता कैसे उत्पन्न होती है यह एक रहस्य की बात है। नवीन भावनाओ
की तरह सहसा किसी एक दिन ऐसे मित्र जीवन-पथ मे आकर खडे हो जाते है।
पहले ही दर्शन मे यह प्रतीत हो जाता है कि यह मेरे बड़े प्रियजन है। मोल-भाव
करके दुनिया की चीजे खरीदी जाती है, लेकिन जीवन की जो श्रेष्ठ सम्पदा है वह
यो ही मिला करती है। इस प्रकार से जीवन के एक महान् अवसर पर मैने इस
तरह से यो ही अपने मित्र को पाया था—लेकिन थोडे ही दिनो मे जीवन के
आदर्श को लेकर उनके साथ मेरा मतभेद उत्पन्न हुआ। मै तो पहले ही सकल्प
कर चुका था कि भारत को विदेशियो के हाथ से मुक्त करूँगा और इस महान्
कार्य को सम्पन्न करने के लिए गोपनीय रूप से जनबल एव अस्त्रबल सग्रह करना
पडेगा। उस समय शिवाजी को मै आदर्श पुरुष समझने लगा था। पिताजी जब
पूछते थे कि तुम आगे चलकर क्या करोगे, तो मैं कहता था कि मैं शिवाजी बनूँगा,
नेपोलियन की तरह में जीवन बिताना चाहता हूँ। लेकिन अब मेरे मित्र ने मेरे
मन मे एक भीषण उलझन पैदा कर दी। हम लोगो की अवस्था उस समय
पन्द्रह-सोलह साल की थी। इसी उम्र मे मेरे मित्र ने सन्यास का आदर्श पसन्द
कर लिया था, जिसका अर्थ होता है समाज-सेवा के काम से अलग होकर व्यक्ति-
गत साधना मे जीवन व्यतीत करना। मेरे लिए सामाजिक कर्म को छोडना एक
प्रकार से असम्भव-सा था। लेकिन मेरे मित्र ने मुझे यह समझाना चाहा कि