बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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थोड़े से वैज्ञानिकों को छोड़कर आधुनिक संसार में अधिकांश दार्शनिक एव
वैज्ञानिकों की भौतिकवाद में कोई श्रद्धा नहीं है। रूस एवं अमेरिका में ईसाई
पुरोहितों के अवांछनीय किन्तु प्रबल प्रभाव के कारण उन देशों में उसकी प्रति-
क्रिया के रूप में ऐसे भौतिकवाद का उद्भव हुआ है। (देखिए History of
Materialism by Lang, English translation—Introduction by
Bertrand Russell---written in 1925.) अपने इस पक्ष को प्रमाणादि देकर
उचित प्रकार से सिद्ध करने के लिए एक सम्पूर्ण ग्रन्थ लिखने की आवश्यकता है।
परन्तु इस स्थान पर इतने गहरे रूप से इस विषय में विचार करने के लिए मैं
प्रवृत्त होना नहीं चाहता। अन्त में एक बात का और उल्लेख करके अपने वक्तव्य
को स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। एक तरफ आधुनिक पदार्थ-विज्ञान इस नतीजे
पर आ पहुँचा है कि विश्व में जितने भी पदार्थ हैं, असल में वे सभी वैद्युतिक
शक्ति के ही विभिन्न रूप है; दूसरी तरफ यह प्रमाणित हो रहा है कि मस्तिष्क-
शक्ति के परिचालन के परिणाम में वैद्युतिक प्रवाह उत्पन्न होता है। अभी इतना
प्रमाणित होना बाकी रह गया कि वैद्युतिक प्रवाह के कारण मस्तिष्क मे विचार-
धारा की उत्पत्ति हो। हमें याद रखना चाहिए कि कुछ दिन पहले यह अज्ञात था
कि भौतिक शक्तियाँ एक अवस्था से दूसरी अवस्था मे रूपान्तरित की जा
सकती हैं परन्तु आज अवश्य यह बात प्रमाणित हो गई है। इस प्रकार से हम
उस दिन की प्रतीक्षा में हैं जिस दिन यह प्रमाणित हो जायगा कि संसार के
समस्त पदार्थ एवं जीवजगत् के समस्त जीवों की प्राणशक्ति तथा चैतन्य एवं
बुद्धि ये सब के सब एक ही वस्तु के विभिन्न रूप या प्रकाश हैं। कलकत्ता
हाईकोर्ट के प्रसिद्ध जज सर जान वुडराफ साहब ने यह कहने का साहस किया
था कि आधुनिक विज्ञान की प्रगति वेदान्त के सिद्धान्त की तरफ अनिवार्य रूप
से झुक रही है। न कि वेदान्त को अपने सिद्धान्त से हटकर विज्ञान की तरफ
झुकना पड़ रहा है।
इस पहलू के अलावा समाजवाद के और भी बहुत-से सिद्धान्त हैं जिनसे मैं
सहमत नहीं हूँ, यथा मार्क्सवादियों का यह कहना है कि इतिहास की अभिव्यक्ति
आर्थिक कारणों से ही हुआ करती है तथा संसार मे अभिव्यक्त हरेक प्रकार की
सभ्यता के मूल में आर्थिक कारण ही प्रधान रूप में सक्रिय होते हैं। इस बात को
भी मैं स्वीकार नहीं कर पाया।
मार्क्स का यह भी कहना था कि पूंजीवादी व्यवस्था में उद्योग-धन्धों की
उन्नति के साथ-साथ संसार के मजदूरों में अशान्ति भी बढ़ेगी एवं उनकी
क्रोधाग्नि भी प्रज्ज्वलित होगी और क्रमशः इन दो श्रेणियों के संघर्ष के परिणाम
में पूंजीपतियों की हार एवं मजदूरों की विजय अवश्यम्भावी है। लेकिन वास्तविक
जगत् में हम देखते यह हैं कि संसार मे जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड, इटली, अमेरिका,
जापान इत्यादि देशों में पूंजीपतियों की उन्नति चरम सीमा को प्राप्त किए है।
फिर भी इन मजदूरों की क्रान्ति इन देशों में नहीं हुई है। प्रत्युत कम्यूनिस्ट चीक