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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 408 में से

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पृष्ठ 18

16 / बन्दी जीवन
लगे कि भारतीय प्राचीन आदर्श के साथ भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का
समन्वय नहीं हो सकता। मानो प्राचीन भारतीय आदर्श में श्रीकृष्ण का एवं कुरु-
क्षेत्र के महायुद्ध का कोई स्थान ही नहीं है। महात्मा गांधी की तरह संस्कृत पाठ-
शालाओं के छात्र एवं अध्यापकगण भी भारतीय प्राचीन आदर्श के नाम पर
भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन के विरुद्ध तीव्र प्रचार किया करते थे। इस प्रकार
से हिंसा एवं अहिंसा की नीति को लेकर मेरे मन में दूसरा संघर्ष उत्पन्न हुआ
था, लेकिन यह इतना तीव्र न था। महात्माजी ने बेलगांव कांग्रेस में क्रान्ति-
कारियों के विरुद्ध जो कुछ दोषारोपण किए थे, उसके प्रत्युत्तर में मैंने फरार
हालत में महात्मा जी के पास अपने नाम से एक चिट्ठी भेजी थी, वह चिट्ठी
ज्यों की त्यों 12 फरवरी सन् 1925 की 'यंग इंडिया' में प्रकाशित हुई थी। उसी
अंक में महात्माजी ने उसका उत्तर भी दिया था।
कालेपानी से लौटने के बाद संभवतः सन् 1923 में ही मैं पहले पहल कम्यू-
निस्ट सिद्धान्तों से परिचित हुआ। यह एक नवीन सिद्धान्त था जिसके साथ
क्रान्तिकारी दल के किसी व्यक्ति का भी उस समय यथार्थ परिचय न था।
तत्पश्चात् सन् 1925 में जेल जाने के पहले मैं कम्यूनिस्ट सिद्धान्त के साथ यथेष्ठ
रूप से परिचित हुआ। बहुत से प्रामाणिक ग्रन्थ पढ़े, कम्यूनिस्टों के साथ खूब
वाद-विवाद किया, विचार विनिमय किया। एक तरफ मैं क्रान्तिकारी आन्दोलन
में जुटा था दूसरी तरफ 'बन्दी जीवन' के दूसरे भाग का सम्पादन-कार्य भी कर
रहा था, एवं कम्यूनिस्ट सिद्धान्त को समझने के लिए जी-जान से प्रयत्न कर रहा
था। कम्यूनिस्ट सिद्धान्त का कुछ अंश तो मैने ग्रहण कर लिया, लेकिन कुछ
अंश को मैं आज भी ग्रहण नहीं कर पाया। कम्यूनिज्म के सिद्धान्त की आर्थिक-
योजना की बहुत-सी बातें मैंने स्वीकार की, लेकिन आर्थिक योजना के साथ कम्यू-
निज्म के सिद्धान्त मे भौतिकवाद के बहुत-से ऐसे सिद्धान्त हठपूर्वक जोड़ दिये गए
हैं, जिसे दार्शनिक दृष्टि से एवं मानव अभिज्ञता की दृष्टि से मैं सत्य नही सम-
झता। मैं अब भी ईश्वर में विश्वास रखता हूँ एवं यह समझता हूँ कि आधुनिक
विज्ञान की अभिव्यक्ति से क्रमशः भारतीय दर्शन-शास्त्र की पुष्टि होती जा रही
है। आजकल हमारे देश के कुछ व्यक्ति परानुकरण वृत्ति के वश होकर आत्म-
वाद को स्वीकार नही कर रहे हैं एवं जो लोग आत्मवाद में विश्वास रखते हैं
उनकी वे हँसी उड़ाते हैं।
यथार्थ में बात तो यह है कि अपनी-अपनी अभिरुचि, संस्कार एवं संगी-
साथियों के प्रभाव की वजह से ही अधिकांशतः हमारी विचारधारा बनती है;
गम्भीर रूप से चिन्तन करने के बाद किसी सिद्धान्त को ग्रहण करने का दृष्टान्त
मनुष्य में दुर्लभ है।
यह भी एक बात है कि आज जो लोग राष्ट्रीय क्षेत्र में त्याग एवं वीरत्व के
साथ आगे बढ रहे हैं, उनकी विचारधारा का प्रभाव स्वभावतः प्रबल होगा। रूसी
विप्लवी आन्दोलन की सफलता के मोह में आकर भी आज हमारे देश के बहुतेरे