बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का आत्म-चरित्र / 29
हमने जितने धोखेबाज और दगाबाज आदमी देखे हैं, वैसे जिन्दगी-भर में नहीं
देखे थे !"
यद्यपि साधारण पंजाबियों के चाल-चलन की उन्होंने कठोर आलोचना की
है, फिर भी उनके गुणों का भी विशद वर्णन किया है। एक जगह उन्होंने लिखा
है—"पंजाब में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ ही अधिक बदनाम हैं, किन्तु इसी पंजाब
में उस दिन सतीत्व की ऐसी गोरवोज्ज्वल स्निग्ध किरण प्रकट हुई थी, जिसकी
तुलना इस कलिकाल में मिलनी कठिन है। डी० ए० वी० कालेज लाहोर के
भूतपूर्व अध्यापक भाई परमानन्द के चचेरे भाई बालमुकुन्द दिल्ली षड्यन्त्र के
मुकदमे में गिरफ्तार किये गए। उनके भाई बालमुकुन्द के पूर्व पुरुष मोतीदास
को सिखों के अभ्युत्थान-समय में आरे से चीरकर मार डाला गया था। गिरफ्तार
होने से एक वर्ष पहले भाई बालमुकुन्द का विवाह हुआ था। उनकी स्त्री श्रीमती
रामराखी परम सुन्दरी ललना थी। उम्र उनकी नई थी ही। जिस दिन उनके
स्वामी गिरफ्तार हुए, उसी दिन से वह व्याकुल हो गई और अनेक प्रकार से देह
को सुखाने लगीं। फिर जब भाई बालमुकुन्द को फांसी का हुक्म हो गया तब वह
उनसे मिलने गई। किन्तु उनके मर्माश्रुओं ने जी भरकर स्वामी के दर्शन न करने
दिये। घर लौटकर वह एक प्रकार से अधमरी दशा में समय बिताने लगीं। एक
दिन वह अपने कमरे में थी कि बाहर से रोने का कोलाहल सुन पड़ा। कमरे से
बाहर आने पर श्रीमती रामराखी को असल बात मालूम हो गई। वह अब और
न सहन कर सकी। स्वामी का मृत्यु-समाचार पाकर सती-साध्वी, खासी नीरोग
दशा में, स्वामी का ध्यान लगाकर मानो स्वामी से जा मिलीं। मिट्टी से मिल
जाने के लिए ही मानो उनकी देह इस लोक में पड़ी रह गई ! ऐसे पतिप्रेम और
आत्मोत्सर्ग की तुलना है कही !"
'बन्दी जीवन' के प्रथम भाग में श्री रासबिहारी बोस के विषय में जो कुछ
लिखा गया है, उसे पढ़कर उनके अदम्य उत्साह, अद्भुत साहस तथा अनोखी सूझ-
बूझ की प्रशंसा करनी पड़ती है। निस्सन्देह वह उच्चकोटि के क्रान्तिकारी थे।
द्वितीय भाग में लेखक महोदय ने रासबिहारी बोस की दो चिट्ठियाँ उद्धृत
की हैं। प्रथम पत्र में, जो 12 अप्रैल, 1922 का है, उन्होंने लिखा था—"अवश्य
ही अब गुप्त-कार्य करने की कोई आवश्यकता नही, इस विषय में तुम्हारे साथ
मेरी पूरी सहमति है। अब तक हमे अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के विषय में कुछ
भी ज्ञान न था; हमने अब तक भारत की ओर ही ध्यान रखा था, किन्तु अब मैं
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति कुछ-कुछ समझने लगा हूँ। इससे मेरे पहले विचारों में
बहुत परिवर्तन हो गया है। एक बात याद रखो—हमें अन्त में सारे संसार का
प्रश्न हल करना होगा, हमारे भाग्य में यही लिखा है। संसार में नवीन युग की,
सत्य और शान्ति की, स्थापना का दायित्व भारत के ही सिर पर है। भारत की
स्वाधीनता इसी उद्देश्य का साधन है, यह स्वयं उद्देश्य नहीं है।"
श्री बोस महोदय ने द्वितीय पत्र में फिर लिखा था—"मेरी दृष्टि पहले से