बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का
आत्म-चरित्र
भारत के सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल के 'बन्दी जीवन' का
प्रथम भाग अगस्त सन् 1922 में प्रकाशित हुआ था, द्वितीय भाग वगबाणी में
छपा था, जिसका अनुवाद श्री जयचन्द्र विद्यालंकार ने किया था, और तृतीय भाग
के कुछ लेख 'प्रताप' में छपे थे, पर वे पुस्तकाकार में प्रकाशित नहीं हो सके । इन
तीनों भागों को एक साथ पढ़ने का सौभाग्य हमें अभी प्राप्त हुआ है और इसके
लिए हम श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल के अनुज श्री भूपेन्द्रनाथ सान्याल के ऋणी
और कृतज्ञ हैं। हमें इस बात का पछतावा है कि हम ऐसे महत्त्वपूर्ण आत्म-चरित्र
को अब से पहले क्यों नहीं पढ़ सके ।
'बन्दी जीवन' को पढ़ते हुए कई बातें आश्चर्यजनक प्रतीत होती हैं। सबसे
पहली बात तो यह है कि ग्रन्थ-लेखक की विश्लेषण-शक्ति आश्चर्यजनक थी और
दूसरी यह कि वह धार्मिक वृत्ति के पुरुष थे और उनकी भावनाओं का मूल आधार
भारतीय धर्म ग्रन्थ तथा भारतीय संस्कृति में था । जयचन्द्रजी ने सान्याल बाबू की
गहरी अन्तर्दृष्टि की, जो एक सच्चे ऐतिहासिक की जन्मसिद्ध पूंजी होती है, दिल
खोलकर प्रशंसा की है । उनकी सफलता का कारण बतलाते हुए जयचन्द्रजी ने
लिखा है—"वह केवल इतिहास लेखक ही नही, बल्कि जिस इतिहास को वह
लिख रहे हैं, उसके बनानेवालों में से भी हैं; उस इतिहास के पात्रों के वह जीवन-
मरण के खेल में साथी थे। यदि वह उनके भावों को पहचानते नहीं, तो उनके
नेता ही कैसे बनते ? सच्चे विप्लव-नेता में भी तो ठीक वे ही गुण चाहिएँ, जो
एक सच्चे इतिहास-लेखक के लिए आवश्यक है।"
निस्संदेह यह ग्रन्थ कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है । स्वयं लेखक ने इसके प्रथम
खण्ड के विषय में लिखा था--“इस खण्ड में यही लिखने का प्रयत्न किया गया है
कि यूरोप के महायुद्ध के समय भारत में क्रान्ति की कैसी और क्या तैयारी की गई
थी। रौलट-रिपोर्ट में यद्यपि यह पहलू बिल्कुल ही छिपा दिया गया है, तथापि
'टाइम्स हिस्ट्री आव दी ग्रेट वार' नामक पुस्तक में इसका थोड़ा-सा उल्लेख आ
गया है। माना कि क्रान्ति की इस तैयारी का उपयोग नहीं किया जा सका, फिर
भी सफलता या विफलता के दृष्टिकोण से इसका फैसला करना ठीक नहीं।