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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 408 में से

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पृष्ठ 29

क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का आत्म-चरित्र / 27
इन लोगों का विशेष हेल-मेल था। इसके सिवा सिख जाति में परस्पर एक-दूसरे
के प्रति सहानुभूति और संवेदना-जनित एकता भारत की अन्यान्य जातियों की
अपेक्षा बहुत अधिक है।"
उदारता और आत्म-बलिदान
'बन्दी जीवन' को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि मानो हम कोई फिल्म
देख रहे हों। सिखों की उदारता तथा आत्म-बलिदान की शक्ति और बंगालियों
की संगठन शक्ति का संयोग सोने और सुहागे का मेल था। लेखक ने लिखा है—
"उत्तर भारत की प्रायः सभी छावनियों में हमारे दल के आदमी आने-जाने लगे।
उत्तर-पश्चिम अंचल के बन्नू से लेकर दानापुर तक कोई भी छावनी अछूती न
रखी गई। प्रायः सभी रेजिमेंटों ने वचन दिया था कि पहले वे लोग कुछ भी न
करेंगे, हां, गदर शुरू हो जाने पर वे अवश्य ही विप्लवकर्ताओं से मिल जाएंगे।
सिर्फ लाहौर और फीरोजपुर की रेजिमेंटों ने सबसे पहले काम शुरू कर देना
स्वीकार कर लिया था। आरम्भ में सरकार यह नही समझ सकी कि षड्यंत्रकारी
इतनी गहरी नींव देकर काम कर रहे हैं। ऐसा न होता तो इतना अधिक काम
हो ही न सकता। पंजाब के पुलिस विभाग के एक मुसलमान डिप्टी सुपरिटेण्डेण्ट
ने अपने एक मुखबिर को इस दल में शामिल कर दिया था। अन्त में उस कृपाल-
सिंह ने ही कृपा करके सारी बातें प्रकट कर दी।"
'बन्दी जीवन' में शहीद करतारसिंह के स्फूर्तिमय चरित्र की जो झांकी दिखाई
गई है, वह बड़ी दिव्य है। उन्होंने लिखा है—"मैंने तो करतारसिंह में जैसा आत्म-
विश्वास देखा, वैसा आत्म-विश्वास न रहने पर किसी के द्वारा कोई बड़ा काम
नही हो सकता। बहुतों में अहंकार का भाव रहने पर भी ऐसे आत्म-विश्वास का
भाव कम देखा जाता है। अहंकार और आत्म-विश्वास अलग-अलग दो चीजें हैं,
अहंकार दूसरे पर चोट करता है, किन्तु जो अहंकार दूसरे पर नोक-झोंक किए
बिना ही अपने प्राणों में शक्ति के अनुभव को जाग्रत करता है, वही आत्म-विश्वास
है।"
सान्याल बाबू ने पंजाबी लोगों को समझाया था—"हम लोगों से सलाह
लिए बिना अचानक कुछ कर न बैठना ! खूब सावधानी से काम करना होगा,
जिसमें कि यह शक्ति व्यर्थ न हो जाय। सिर्फ हू-हा करके फिजूल कामों में शक्ति
क्षीण न कर दी जाय।"
यह बात ध्यान देने योग्य है कि जिस समय सान्याल बाबू यह परामर्श दे रहे
थे, उनकी उम्र कुल जमा बाईस वर्ष की थी ! इस पुस्तक में कहीं-कहीं हास्य का
भी अच्छा पुट आ गया हैं। एक स्टेशन के जलपान-गृह में उन्होंने रोटी और तर-
कारी मांगी थी, पर वहां का आदमी रोटी और मांस ले आया। उस समय तक
सान्याल बाबू को यह पता न था कि पंजाबी लोभ गोश्त को तरकारी कहते हैं !
काशी की पुलिस को चकमा देने के उदाहरण भी बड़े मजेदार बन पड़े हैं।