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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 256 में से

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पृष्ठ 67

संस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता ७
गुणाङ्कारयोरनौचित्येन गुणालङ्कारतेति दर्शनाय उदाहरणमुपस्था-
पयति—यदाहेति। कण्ठे इति। कण्ठे गले, मेखलया काञ्च्या, हारस्थाने
मेखलाधारणेनेति भावः, वा अथवा, नितम्बफलके कटिप्रदेशे, तारेण
निर्मलेन, हारेण मौक्तिकेन, मेखलास्थाने हारधारणेनेत्यर्थः, पाणौ करे,
नूपुरबन्धनेन, प्रणते शरणागते, शौर्येण वीरताप्रदर्शनेन, रिपौ शत्रौ,
करुणया दयाप्रदर्शनेन, के मनुष्याः, हास्यताम् उपहासयोग्यतां, न
आयान्ति = न प्राप्नुवन्ति ? सर्वेऽपि प्राप्नुवन्त्येवेति भावः (औचित्येन
विना अलङ्कृतिर्गुणा वा रुचिं शोभां न प्रतनुते न विस्तारयति। गुणपक्षे
प्रतन्वते इति वचनविपरिणामेनान्वयः ॥ ६ ॥
पूर्वोक्त अर्थ को ही उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करने के लिये कहा जा रहा है
अलङ्कृतिरिति । औचित्यरक्षण की मर्यादा ही अलंकार तथा गुणों को अलंकार
एवं गुण की संज्ञा देती है। उसके बिना न अलंकार अलंकार ( भूषण ) हो
सकता है और न गुण गुण ही । जैसे कर्णफूल ( जो कि एक सुन्दर कर्णाभरण है )
को कान के बदले नाक में पहन लेने पर वह नायिका के सौन्दर्य का पोषण न
कर शोषण ही करता है । अथवा शौर्य ( जो कि एक विलक्षण गुण है ) का
वर्णन किसी वीर के प्रसंग में न करके किसी कायर के प्रसंग में किया जाय तो
वहाँ रसादि पुष्ट न होकर दुष्ट ही हो जाता है । फिर वे अलंकार और गुण
कहलाने का दावा कैसे कर सकते हैं ? अर्थात् औचित्य ही वह तत्त्व है जो कि
अलंकार को अलंकार और वण को गुण कहलाने का अवसर प्रदान करता है ।
औचित्य-सुरक्षा के अभाव में अलंकार और गुण किस तरह अपनी महत्ता
खो देते हैं, इसी को दिखाने के लिये कहा जा रहा है—कण्ठे इति । यदि कोई
कामिनी, कंठ में कांची, कमर में हार, हाथ में पायजेब और पैर में केयूर पहनले
तो उसकी मूर्खता पर कौन उसकी हंसी नहीं उड़ायगा ? इसी तरह यदि कोई
पुरुष शरणागत पर वीरता का और शत्रु पर दया का भाव दिखाये तो वह भी
अवश्य उपहास का पात्र समझ जायगा । सत्य बात तो यह है कि औचित्य के
बिना न तो अलंकार शोभा प्रदान करते हैं और न गुण आकृष्ट ही कर
सकते हैं ॥ ६ ॥
किं तदौचित्यमित्याह—
उचितं प्राहुराचार्याः सदृशं किल यस्य यत् ।
उचितस्य च यो भावस्तदौचित्यं प्रचक्षते ॥ ७ ॥