औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 63, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ३
अलंकारों का निरूपण किया, अतएव कविकर्णिका का विशेषण काव्यालङ्काराम्
कहा। इस विशेषणबोधक पद में काव्य के अलङ्कार—उपमा-रूपक आदि हैं
जिसमें, इस तरह से बहुव्रीहि समास समझना चाहिए। अन्यथा काव्य को
अलंकृत करने वाली—इस अर्थ में "काव्यालङ्काराम्" ऐसा स्त्रीलिंग शब्द नहीं
संगत होगा। कारण अलंकार शब्द नित्य पुंल्लिङ्ग है। इसके बाद "काव्य-
कलंक अथवा कविकलं क" नाम का दूसरा निबन्ध भी उन्होंने लिखा, जिसमें
काव्यदोषों का विवेचन किया गया। फिर तीसरा ग्रंथ "काव्यविवेक" नाम का
रचा, जिसमें काव्यलक्षण, काव्यभेद आदि का वर्णन किया गया। तदुत्तर आज
इस "औचित्यविचारचर्चा" नामक पुस्तक का प्रणयन कर रहे हैं, ऐसा ग्रंथकार
का कथन है। यह पुस्तक उस औचित्य तत्त्व का विद्वन्मनोग्राही विचार है जो
काव्य में चमत्कार को उत्पन्न करता है और जो रमणीय आस्वादावस्था में
जाकर रस का भी जीवातुभूत सिद्ध होता है अर्थात् रस में भी रसनीयता लाने
का श्रेय जिसे प्राप्त है। तात्पर्य यह कि औचित्य के बिना आस्वाद्यता के अभाव
में रस रस कहलाने योग्य हो ही नहीं सकता।
यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य यह है कि "औचित्यविचारचर्चा" के
अतिरिक्त जिन तीन ग्रन्थों का निर्देश ऊपर किया गया है वे आज प्राप्त नहीं
होते। इतिहासलेखकों ने भी केवल "कविकर्णिका" का ही उल्लेख किया है,
"काव्यकलंक" और "काव्यविवेक" का नहीं। पर मुझे मूल पंक्ति का स्वा-
भाविक स्वारस्य ऐसा ही प्रतीत होता है जिसके अनुसार "तत्कलङ्क विवेकञ्च"
को भी ग्रन्थनिर्देशपरक ही समझना संगत है। यदि क्षेमेन्द्र द्वारा "काव्यकलंक"
और "काव्यविवेक" की रचना वाली बात नहीं ही मानी जाय तब उक्त पंक्ति
की व्याख्या किसी तरह यों की जा सकती है—क्षेमेन्द्र ने पहले कविकर्णिका
लिखी, फिर उसके कलंक-दोष ( त्रुटियों ) का मार्जन करने के लिये विवेक-समु-
चित विचार-करके औचित्य का विचार किया। तात्पर्य यह कि अलंकार तत्त्व
का गंभीर मनन करते-करते उन्हें उस तत्त्व में त्रुटि दीख पड़ने लगी—फिर चिर-
चिंतन से उन्हें औचित्य तत्त्व का उद्भास हुआ और उन्होंने झट से "औचित्य-
विचारचर्चा" रच डाला जिससे "कविकर्णिका" में जो कुछ त्रुटि रह गयी थी
उसका मार्जन हो गया ॥ २-३ ॥
काव्यस्यालमलङ्कारैः किं मिथ्यागणितैर्गुणैः ।
यस्य जीवितमौचित्यं विचिन्त्यापि न दृश्यते ॥ ४ ॥