औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 65, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ५
हारादिवल्लोकप्रसिद्धविविधभूषणवत्, अलंकारा एव भूषणान्येव, बाह्य-
शोभाकरत्वात् शब्दार्थरूपशरीरशोभातिशायितया अलंकारकत्वेनालंका-
र्य्यत्वाभावादित्यर्थः । येऽपि काव्यगुणाः ओजःप्रसादमाधुर्यादयः, केचन
कतिपये, आन्तरिकधर्मा गुणास्तल्लक्षणविचक्षणैर्गुणलक्षणाविष्कारकै-
र्विद्वद्भिः, समाम्नाता आख्यातास्तेऽपि श्रुतसत्यशीलादिवद् गुणा एव,
अर्थात् गुणगुणिनोर्भेदस्य सर्वविदातत्वेन तेषामप्यात्मस्थानीयत्वाभाव
इत्यर्थः । तत्र हेतुमाह—आहार्यत्वात् = आरोपविषयत्वात्-इति भावः ।
औचित्यन्तु वक्ष्यमाणलक्षणमनुरूपविधानरूपं, काव्यस्य स्थिरमविनश्वरं
जीवितं जीवनम् । तेन औचित्येन विना अस्य काव्यस्य गुणालङ्कार-
युक्तस्यापि निर्जीवत्वात् काव्योद्देश्यीभूतविच्छित्तिविशेषसम्पादकत्वा-
भावात् । धातुपदव्यवहार्यैः रसैः सिद्धस्य प्रसिद्धस्य रूपवत्तयाख्यातस्येति
यावत् । शरीरस्य नश्वरत्वेऽपि तदितर आत्मा यथा स्थिरस्तथैव रसेन
शृङ्गारादिना प्रसिद्धस्य काव्यस्य औचित्यमेव निश्चितं जीवनमिति
सारांशः ।
जिस तरह यथास्थान विन्यस्त कटक, कुंडल, केयूर, हार आदि लौकिक
आभूषण शरीर की शोभा को बढ़ाते हुए परंपरया आत्मा में भी विशेष गुणा-
धान करते रहते हैं उसी तरह उपमा, उत्प्रेक्षा आदि शास्त्रीय अलंकार रसादि
का उपकारक होते हुये भी काव्य के अलंकार ( भूषण ) ही हो सकते हैं, आत्मा
( अलंकार्य ) नहीं । कारण, अलंकार बाह्य धर्म हैं और आत्मा आन्तर पदार्थ
है । इसी तरह ओजः, प्रसाद आदि गुण आत्मधर्मिक होने पर भी गुण ही हैं,गुणी
अर्थात् काव्यात्मा नहीं, क्योंकि ये गुण भी आहार्य हैं — पीछे आरोपित होते हैं—
अर्थात् उनको छोड़कर भी अपनी सत्ता कायम रख सकते हैं फिर उन्हें आत्मा
कैसे कहा जा सकता है । कारण, आत्मा तो वह पदार्थ है जिसके बिना सत्ता ही
नहीं रह सके । अतः जैसे धातु शब्द से व्यवहृत रसों से प्राणी का शरीर नश्वर
होकर भी संसार में प्रसिद्धि तो पाता है, पर आत्मा उससे भिन्न अविनश्वर
पदार्थ ही माना जाता है, वैसे ही काव्य रस से जगत् में प्रसिद्धि लाभ करता है,
आत्मा तो उसका स्थिरतत्त्व औचित्य ही है । तात्पर्य यह है कि जैसे प्राणि-शरीर
में पंच महाभूत सबसे स्थूल और धातु उससे सूक्ष्म हैं, पर आत्मा उससे भी सूक्ष्म
तत्त्व है । उसी तरह काव्य में शब्द, अर्थ और उसके धर्म अलंकार सबसे स्थूल
तत्त्व हैं, रस तथा रसधर्म गुण उनसे सूक्ष्म तत्त्व अवश्य हैं, पर आत्मा का स्थान
उनसे भी सूक्ष्म तत्त्व औचित्य को ही दिया जा सकता है ।