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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

६४ औचित्यविचारचर्चा
भागा हुआ वानर महाराज के अंतःपुर में प्रवेश कर रहा है, वह अपने कंठ की
टूटी हुई भूलुंठित स्वर्णमय डोरी को खींचता हुआ द्वार पर द्वार टपता जा रहा
है, पैर की क्षुद्रघंटिकायें (घुंघरू) रनरना रही हैं, और पशुशाला के रक्षक उसे
पकड़ने के लिये वेग से उसके पीछे-पीछे दौड़े जा रहे हैं, फिर भी वह पकड़ में
नहीं आ पाता, भीतर घुसता ही जा रहा है, जिससे अन्त:पुर की स्त्रियां
आतंकित हो रही हैं।
और भी—
उस बंदर के भय से राजा के अंतःपुर में एक भगदड़ सी मच गयी है,
नपुंसक सब भागे जा रहे हैं, क्योंकि उनकी गणना पुरुषों में तो होती नहीं, फिर
उन्हें पीठ दिखाने में कैसी लज्जा ? बोने वृद्ध कंचुकियों के कंचुक में छिप रहे हैं,
किरात नगर के किनारे की ओर भागते हुए अपने नाम की (किर = नगर का
भाग विशेष, अतति = जाता है इस व्युत्पत्ति से) सार्थकता सिद्ध करने लग गये
हैं, कुबड़े एक तो वैसे ही नवे हुए हैं, अभी डर के कारण और भी नव कर
धीरे-धीरे निकले जा रहे हैं, क्योंकि उनके मन में शंका बनी हुयी है कि कहीं
देख न लिए जांय ।
अत्राङ्गनानां निशितदशननखशिखोल्लेखातङ्कदानेन प्रचुरतरवानरा-
भिसरणभयसंभ्रान्तान्तःपुरिकवृद्धवामनकिरातकुब्जादीनां पुरुषगणना-
विहीनतया धैर्यविरहकातराणामुचितचेष्टानुभाववर्णनया भयानकरस-
संवादिरुचिरौचित्यमाचकास्ति ।
अत्र श्लोकद्वयेऽङ्गनानामन्तःपुरस्त्रीणां, निशितदशननखशिखोल्ले-
खातङ्कदानेन तीक्ष्णदन्तनखाग्रोल्लेखजन्यभयप्रदानेन, पुरुषेषु गणनायाः
संख्यानस्याभावेन, धैर्यविरहकातराणां धृतिविरहिततया कातरात्मनां,
प्रचुरतरवानराभिसरणभयसंभ्रान्तःपुरिकवृद्धवामनकिरातकुब्जादीनां वान-
रागमनबहुतरभयभीतान्तःपुरस्थकञ्चुकिवामनकिरातकुब्जप्रभृतीनाम्, उ-
चितचेष्टानुभाववर्णनया समुचिताचरणरूपानुभाव (कार्य) वर्णनेन,
भयानकरससंवादिरुचिरौचित्यं भयानकरसपोषकसुन्दरौचित्यम्, आच-
कास्ति सुशोभते ।
इन पद्यों में स्त्रियों को डराने के लिये वानर के तेज नख और दांत के
आघात के आतंक का जो उल्लेख किया गया है उससे अपने को पुरुषों की श्रेणी
में नहीं गिनने वाले वृद्ध, वामन, कुबड़े और किरातों के चेष्टास्वरूप (भागना,

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ६५
छिपना और नव कर चलना आदि ) अनुभावों का जो वर्णन किया गया है वह
भयानक रस के परिपोष में चार चांद लगा रहा है । इसलिये यहाँ भयानक
रसौचित्य का अच्छा समावेश हो जाता है ।
नतु यथा राजपुत्रमुक्तापीडस्य—
नीवारप्रसराग्रमुष्टिकवलैर्यो वर्धितः शैशवे,
पीतं येन सरोजपत्रपुट के होमावशेषं पयः ।
तं दृष्ट्वा मदमन्थरालिबलयव्यालोलगण्डं गजं,
सानन्दं सभयञ्च पश्यति मुहुर्दूरे स्थितस्तापसः ॥
भयानकरसानौचित्यं प्रदर्शयितुमाह-नतु यथेति । नीवारेति । यो गजः,
शैशवे बाल्यावस्थायां, नीवाराणां मुनिधान्यविशेषाणां, प्रसरस्य समूहस्य
योऽग्रोऽग्रभागस्तस्य, या मुष्टिस्तस्याः, कवलैर्ग्रासैः, वर्धितो वृद्धिं नीतस्तथा
येन हस्तिना सरोजपत्रपुत्रके नलिनीदलद्रोणे, होमावशिष्टं हवनार्थनीता-
वशिष्टं, पयो जलं, पीतं, तमेव गजं, मदेन दानवारिणा, मन्थरेण मन्दगति-
ना मदप्रभावादिति भावः, अलिवलयेन भ्रमरसमूहेन, व्यालोलञ्चञ्चलं;
गण्डं गण्डं, यस्य तादृशं, दृष्ट्वा ज्ञात्वेत्यभिप्रायः, दूरे स्थितः सुदूरवर्ती,
तापसस्तपस्वी, मुहुर्वारंवारं, सानन्दं निजपोषितजन्तुविवृद्धयाऽऽनन्दपूर्वकं
सभयं-तस्य भयङ्करवन्यजन्तुत्वेन भयपूर्वकञ्च पश्यति विलोकयति ।
भयानक रस के अनौचित्य के उदाहरण-स्वरूप यह पद्य उद्धृत किया गया
है—नीवारेति । नीवार ( मुनिधान्यविशेष ) के कोमल अग्रभाग की एक-एक मुट्ठी
का ग्रास खिलाकर जिस ( गज ) को बच्चे से बड़ा किया था तथा हवन के लिए
लाये हुए अवशिष्ट जल में से बचे हुए जल को कमल-पत्र के दोने में भर-भर
कर पिलाया था, आज मदमत्त भ्रमरों के चक्रमण से चंचल गंडस्थल वाले उसी
गज को तपस्वीवृन्द दूर से आनन्द और भयपूर्वक देख रहे हैं ।
अत्र गजस्याघातकविकृतचेष्टानुवर्णनाविरहिततया स्थायिभावस्य
भयानुभाववर्जितस्य केवलं नाममात्रोदीरणेन च भयानकरसोचितसंभ्रमा-
भावादुपचितमौचित्यं न किंचिदुपलभ्यते ।
अत्र पद्ये, गजस्य हस्तिनः, आघातकविकृतचेष्टानुवर्णनाविरहिततया
व्याघातकारिविकारग्रस्तव्यापारविशेषवर्णनराहित्येन, भयानुभाववर्जि-
तस्य भयजन्यकार्यकलापरहितस्य, स्थायिभावस्य भयरूपस्य, केवलं नाम-
मात्रोदीरणेन नाममात्रकथनेन च, भयानकरसोचितसम्भ्रमाभावाद्
५ औ०

६६ औचित्यविचारचर्चा
भयानकरसानुरूपसंवेगाभावात् न किंचिदौचित्यमुपचितं विवृद्ध-
मुपलभ्यते प्राप्यते ।
इस पद्य के द्वारा गज का जो वर्णन किया गया है उससे उसकी किसी ऐसी
चेष्टा का उल्लेख तो हुआ नहीं जो कि भयप्रयुक्त और विकारयुक्त समझा जाय ।
इसलिए भय के केवल नामतः कथन रहने पर भी उपयुक्त अनुभावादि से अपुष्ट
होने के कारण वह रसरूपता को प्राप्त ही नहीं कर सकता । अतः यह भयानक
रसानौचित्य का उदाहरण कहलाने के योग्य है ।
बीभत्से यथा मम मुनिमतमीमांसायाम्—
सर्वापायचयाश्रयस्य नियतं कुत्सानिकायस्य किं,
कायस्यास्य विभूषणैः सुवसनैरानन्दनैश्चन्दनैः ।
अन्तर्यस्य शकृद्यकृत्कृमिकुलक्लोमान्त्रमालाकुले,
क्लेदिन्यन्तदिने प्रयान्ति विमुखाः कौलेयकाका अपि ।
बीभत्सरसौचित्यमुदाहर्तुमाह—बीभत्से यथा ममेति । सर्वैति । सर्वा-
पायचयाश्रयस्य सर्वविधविनाशस्तोमाधारस्य, नियतं निश्चितं, कुत्सा-
निकायस्य निन्दैकसंस्थानस्यास्य घृणास्पदस्य, कायस्य शरीरस्य, विभूषणै-
रलङ्कारैः, सुवसनैर्विशिष्टाच्छादनैः, आनन्दनैर्मोदप्रदैश्चन्दनैः श्रीखण्डलेप-
नैश्च किं ? व्यर्थमिति भावः । शकृतो मलस्य, यकृतः पाचनयन्त्रस्य, कृमि-
कुलस्य श्वेतरक्तकीटाणुप्रभृतेः, क्लोम्न उदकवाहिस्रोतोमूलस्यान्त्रयोः क्षुद्रा-
न्त्रबृहदन्त्रयोर्माल्या समूहेनाकुले व्यापृतेऽत एव क्लेदिनि पङ्किले, यस्य
कायस्यान्तरभ्यन्तरे विषये, विमुखा उदासीनाः, अन्तदिने मृत्युकाले,
कौलेयकाकाः कुक्कुरकाकप्रभृतयो निर्घृण्यभोजिनोऽपि विमुखाः, प्रयान्ति
परावर्तन्ते ।
बीभत्सरस के औचित्य को प्रदर्शित करने के लिए कहा गया है—बीभत्से
यथा ममेति । सर्वैति । यह शरीर क्या है ? पुंजीभूत समस्त दोषों का एकमात्र
आश्रय और निन्दा का निश्चित स्थान ही तो है, फिर निरर्थक इसको सजाने के
लिए अलंकार, सुन्दर वस्त्र और सुगंधित चन्दनों के व्यवहार का क्या प्रयोजन ?
मृत्यु के पश्चात् मल, मूत्र, यकृत्, क्लोम, कीट और अंतड़ियों के समूह से क्लिन्न
हुए मानव शरीर को निर्घृण्यभोजी कुत्ते और कौवे भी तो नहीं पूछते ।
अत्र वैराग्यवासनाच्छुरितबीभत्सरसस्य जुगुप्सास्थायिभावोचित-

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ६७
कायगतकुत्सिततरान्त्रतन्त्रादिसमुदीरणेन परा परिपुष्टिर्निःसारशरीराभि-
मानवैरस्यजननी प्रतिपादिता ।
अत्र पूर्वोक्तपद्ये, वैराग्यवासनाच्छुरितबीभत्सरसस्य वैराग्यसंस्कार-
सहकृतबीभत्साख्यरसस्य, जुगुप्साख्यस्थायिभावोचितकायगतकुत्सितत-
रान्त्रतन्त्रादिसमुदीरणेन जुगुप्सानामकस्थायिभावानुरूपशरीरगताति-
निन्दितमलमूत्रान्त्रादिवर्णने, निःसारशरीराभिमानवैरस्य जननी निस्त-
त्वकायिकगर्वखर्वकारिणी, परोत्कृष्टा, परिपुष्टिः परिपोषः, उत्पादितो
जनितः ।
उक्त पद्य में जुगुप्सारूप स्थायीभाव के अनुरूप शरीरगत घृणित आंत आदि
के वर्णन से, वैराग्य-भावना से सहकृत बीभत्सरस के शारीरिक गर्व को चूर्ण
करने वाला बहुत ही अच्छा परिपोष दृष्टिगोचर हो रहा है, जिससे बीभत्सर-
सौचित्य का एक जीता-जागता चित्र उपस्थित हो जाता है ।
नतु यथा चन्दकस्य—
कृशः काणः खञ्जः श्रवणरहितः पुच्छविकलः,
क्षुधाक्षामो रूक्षः पिठरककपालादितगलः ।
व्रणैः पूतिक्लिन्नैः कृमिपरिवृतैरावृततनुः,
शुनीमन्वेति श्वा तमपि मदयत्येष मदनः ॥
बीभत्सरसानौचित्यं प्रदर्शयितुमाह—नतु यथा चन्दकस्येति । कृश
इति । कृशो दुर्बलः, खञ्जः सञ्चारशक्तिविकलः, श्रवणरहितः श्रुतिहीनः,
पुच्छविकलः खण्डितलाङ्गूलः, क्षुधाक्षामो बुभुक्षामलिनः, रूक्षः शुष्कः,
स्निग्धतारहित इत्यर्थः, पिठरककपालादितगलः पीडितकपालगलादिः,
पूतिंक्लिन्नैर्दुर्गन्धियुक्तैः, कृमिपरिवृतैरुत्पन्नकृमिभिः, व्रणैरावृततनुः संयुक्त-
शरीरोऽपि, श्वा कुक्कुरः शुनीं कुक्कुरीमन्वेति संभोगार्थमनुधावत्येष जग-
दुन्मादको मदनः कामस्तमप्येतादृशं संयोगयोग्यतारहितमपि श्वानं
मदयति वासनाधीनं करोति ।
बीभत्सरस के अनौचित्य को प्रदर्शित करने के लिये कहा गया है—नतु
यथेति । कृश इति । संसार को मदमत्त करने वाले इस कामदेव की महिमा
विचित्र है, योग्य की तो बात ही अलग है । अयोग्य से अयोग्य जन्तुओं में भी
कामवासना का संचार कर देता है । ऐसे भी कुत्ते कामान्ध होकर कुतियों के पीछे
लगे रहते हैं जो कि बहुत ही दुर्बल, काने, लंगड़े, बहरे, और पुछकट्‌टे हैं । इतना

६८ औचित्यविचारचर्चा
ही नहीं, भूख से व्याकुल, बड़े ही रूखे, मस्तक और गले की व्याधि से पीड़ित
और ऐसे ऐसे घावों से युक्त हैं जिनसे कि बड़ी ही सड़ांध-सी दुर्गंध निकलती
रहती है और कीड़े भी पड़ गये होते हैं ।
अत्राशुचिचर्वणरुचेरुपचितविचिकित्सकुत्सानिकायस्य स्वभावजुगुप्सि-
तयोनेः शुनकस्य किमेतैर्बीभत्सविशेषणैरतिशयनिर्बन्धानुबद्धैरधिकमुद्भा-
सितम् । एतैरेव पुरुषगतैर्जुगुप्सापरं गौरवमावहति ।
अत्र पद्ये, अशुचिचर्वणरुचेरपवित्रभक्षणरुचियुक्तस्योपचिता विवृद्धा,
विचिकित्साऽऽश्चर्यं यस्यां तादृशी या कुत्सा निन्दा, तस्या निकायस्य
स्थानस्य, स्वभावजुगुप्सितयोनेः स्वभावत एव घृणितयोनिसम्भूतस्य,
शुनकस्य कुक्कुरस्यैतैः पूर्वोक्तैः ( श्लोकप्रतिपादितैरिति भावः ) अतिशय-
निर्बन्धानुबद्धैराग्रहबहुल योजितैः, बीभत्सविशेषणैर्बीभत्सव्याञ्जकविशेषणैः,
किं विशिष्टम्, उद्भासितमुद्योतितम् ?, न किमपीत्यर्थः । स्वतो घृणितस्य
घृणास्पदतावर्णनं न चेतश्चमत्कारीति भावः । पुरुषगतैर्मानवसञ्चारिभिरे-
तैरेव विशेषणैर्जुगुप्सा, परमत्यन्तं, गौरवं महत्त्वमावहति धत्ते ।
इस पद्य में अभक्ष्यभक्षी, अतिशयनिन्दनीय, गर्हितयोनिसमुद्भव कुत्ते में
घृणाद्योतक इन विशेषणों की आग्रहपूर्वक योजना से क्या विशेष उद्भासित हो
गया ? कुछ भी तो नहीं, क्योंकि घृणितों की घृणा-योग्यता स्वाभाविक ही है ।
ऐसा ही यदि किसी मनुष्य का वर्णन किया गया होता तो वह बीभत्सरस का
पोषक होने के कारण उचित कहा जा सकता था, परन्तु कवि ने ऐसा किया नहीं ।
इसलिए उनकी कृति यहाँ पर बीभत्सरस के अनौचित्य को ही प्रदर्शित कर रही है ।
अद्भुते यथा चन्दकस्य—
कृष्णेनाम्ब ? गतेन रन्तुमधुना मृद् भक्षिता स्वेच्छया,
सत्यं कृष्ण ? क एवमाह मुसली, मिथ्याम्ब ? पश्याननम् ।
व्यादेहीति विकासितेऽथ वदने दृष्ट्वा समस्तं जग-
न्माता यस्य जगाम विस्मयपदं पायात्स वः केशवः ॥
अद्भुतरसौचित्यमुदाहर्तुमाह—अद्भुते यथेति । कृष्णशैशवावस्था-
वर्णनमिदं—कृष्णेनेति । अम्ब हे मातः ! रन्तुं क्रीडितुं गतेन कृष्णेनाधुना
सम्प्रति, स्वेच्छया यथेच्छं विरोधकारिणोऽभावादिति भावः मृन्मृत्तिका,
भक्षिता खादितेति बलरामकथनानन्तरं माता कृष्णं पृच्छति हे कृष्ण !
सत्यं ? वस्तुतोऽद्य त्वया मृद् भक्षिता किं ? कृष्ण उत्तरयत्यम्ब ! क

संस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता ६९
एवमाह ? मुसली बलरामः कथयतीति शेषः, मिथ्याऽसत्यमेतत्, यदि
न विश्वसिहि र्तार्ह ममाननं पश्य विलोकय, यदि मया मृद् भक्षिता भवे-
र्तार्ह तच्चिह्नमप्यवश्यं मे मुखे भवेदित्याशयः, व्यादेहि मुखं व्यादाय
दर्शयेति मात्राभिहिते अथानन्तरं, (कृष्णेन) वदने मुखे, विकासिते
प्रसारिते सति, (तत्र मुखे) समस्तं सम्पूर्ण, जगत्संसारं, दृष्ट्वा विलोक्य,
यस्य कृष्णस्य माता, विस्मयपदमाश्चर्यपदवीं, जगाम गतवती, स केशवः
कृष्णः, वो युष्मान्, पायादव्यात् ।
अद्भुतरस के औचित्य का उदाहरण दिखलाने के लिए कहा गया है—
अद्भुते यथा चन्दकस्येति। कृष्णेनेति। बालकृष्ण की शिकायत करते हुए बलराम
ने माँ से कहा कि ऐ माँ ! आज खेलते समय कृष्ण ने इच्छापूर्वक बहुत-सी
मिट्टी खाली है। हाँ जी कृष्ण ? किसने तुमसे ऐसा कहा है माँ ?

७० औचित्यविचारचर्चा
अपना मुख दिखलाने लगते हैं। उस मुख में सम्पूर्ण ब्रह्मांड का दर्शन कर उसके
प्रभाव से अनभिज्ञ अतएव वात्सल्य-विह्वल माता भी विस्मयविमूढ हो उठती है।
इस वर्णन के औचित्य से सहृदयों के हृदय में अद्भुतरस का साम्राज्य सा
स्थापित हो जाता है।
नतु यथा मम मुनिमतमीमांसायाम्—
समस्ताश्चर्याणां जलनिधिरपारः सवसति-
स्ततोऽप्याश्चर्यं यत्पिबति सकलं तं किल मुनिः ।
इदं त्वत्याश्चर्यं लघुकलशजन्मापि यदसौ,
परिच्छेतुं को वा प्रभवति तवाश्चर्यसरणिम् ॥
अद्भुतरसानौचित्यं प्रदर्शयितुमाह--नतु यथा ममेति । समस्तेति ।
प्रथमतः स जगत्प्रसिद्धोऽपारोऽनन्तो जलनिधिः समुद्रः समस्ताश्चर्याणां
ज्ञाताज्ञातानन्ताश्चर्यजनकवस्तुजाताश्रयतया निखिलविस्मयानां, वसतिः
स्थानं, मुनिरगस्त्यस्तं समुद्रं, सकलं निःशेषं यथा स्यात्तथा, किलेति
निश्चयेन, यत्पिबति चुलकीकरोति, तत्, ततोऽपि समुद्रतोप्याश्चर्यं विचित्रं,
यत् यस्माद्धेतोरसौ मुनिरपि, लघुकलशजन्मा स्वल्पकायघटसमुद्भवः,
इदं त्वेतत्पुनरत्याश्चर्यं महच्चित्रं तवेश्वरस्येश्वररचितसंसारस्य वाऽऽश्चर्य-
सरणिं विस्मयपद्धतिं, परिच्छेतुं परिमातुं को वा प्रभवति = कः शक्नोति ?
न कोऽपीति भावः ।
अद्भुतरसानौचित्य का प्रदर्शन करने के लिये कहा गया है—नतु यथेति ।
समस्तेति। एक तो वह अपार समुद्र ही सभी आश्चर्यों का स्थान है, परन्तु
उससे भी आश्चर्य की बात तो यह है कि महामुनि अगस्त्य ने उसे भी चुलकीकृत
कर लिया और यह तो और भी आश्चर्यजनक है कि वह मुनि ( अगस्त्य ) एक
मामूली घड़े से पैदा हुए। हे प्रभो ! तुम्हारे आश्चर्य-परम्परा की पद्धति को कौन
माप सकता है ?
अत्रापारसरित्पतिप्रभावेण मुनिना तस्यैकचुलकाचमनेन मुनेश्च
लघुकलशजन्मना क्रमाक्रान्तिसमारूढोऽप्यसमविस्मयमयोऽयमद्भुतप्रसरः
संसारस्यैवंविधैवाश्चर्यसरणिरपरिच्छिन्ना न किंचिदेतत्कौतुकमित्यर्थान्त-
रन्याससामर्थ्येन सहसैवावरोपित इव तिरोभूततामुपगतः ।
अत्रोक्तपद्येऽपारोऽनन्तो यः सरित्पतेः समुद्रस्य प्रभावस्तेन, मुनिना-
ऽगस्त्येन, तस्य समुद्रस्यैकचुलकाचमनेन चुलकीकृत्य पानेन, तथा मुनेर-

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ७१
गस्त्यस्य च, लघुकलशजन्मना स्वल्पकायघटयोनित्वेन ( एभिस्त्रिभिर्नि-
मित्तैरित्यर्थः ), क्रमाक्रान्तसमारूढोऽपि क्रमिकाक्रमणपरिपाट्याऽङ्कुरितो-
ऽप्यसमविस्मयमयोऽद्वितीयाश्चर्यस्वरूपोऽद्भुतप्रसरोऽद्भुतोदयः, संसारस्य
विश्वस्याश्चर्यसरणिर्विस्मयपद्धतिरेवंविधैवैदृइयेवापरिच्छिन्नाऽपरिमेया ।
( अत्र ) न किंचित्कौतुकं न मनागप्युत्कण्ठा हेतुरित्याकारकस्यार्थान्तरन्या-
सस्य समर्थकर्थस्य, सामर्थ्येन महिम्ना, सहसैव हठादेवावरोपित उत्पाटित
इव तिरोभूततामन्तर्हितत्वमुपगतः संप्राप्तः ।
इस पद्य में पहले तो समुद्र की विचित्रता दिखायी गयी है, फिर मुनि के
द्वारा उसका चुलकीकृत किये जाने का उल्लेख किया गया है तथा मुनि की
विचित्रता दिखाने के लिए उनके घटवंशजन्मता की भी चर्चा की गयी है । इस
तरह क्रमशः एक के बाद एक की महत्ता में व्याघात पहुँचा कर जो आश्चर्य-
मूलक अद्भुतरस का अङ्कुर उत्पादित किया गया है वह—संसार की आश्चर्य-
परम्परा इसी तरह अपरिमित होती ही है, इसमें कौतुक की कोई बात नहीं—
इत्याकारक अर्थान्तरन्यास ( पूर्ववर्णित अर्थ के समर्थनार्थ वर्णित अर्थ ) से हठात्
तिरोहित हो जाता है अर्थात् संसार को इस विचित्रता से कौन माप सकता है ?
इस अर्थ के व्यक्त हो जाने से उसकी महत्ता नष्ट हो जाती है । इस प्रकार
अनौचित्य के कारण अद्भुतरस का समुचित परिपाक यहाँ नहीं हो सका है ।
शान्ते यथा मम चतुर्वर्गसंग्रहे—
भोगे रोगभयं सुखे क्षयभयं वित्तेऽग्निभूभृद्भयं.
दास्ये स्वामिभयं गुणे खलभयं वंशे कुयोषिद्भयम् ।
माने म्लानिभयं जये रिपुभय काये कृतान्ताद्भयं,
सर्वं नाम भवे भवेद्भयमहो वैराग्यमेवाभयम् ॥
शान्तरसौचित्यमुदाहर्तुमाह—शान्ते यथा ममेति । भोगे इति । भोगे,
रोगस्यामयस्य, भयं भीतिरसंयतभोगस्य रागकारणत्वेन सुतरां रोगसंभव
इति भावः । सुखे मोदानुभव, क्षयभयं विनाशभीतिः, सांसारिकसुखस्य
क्षणभङ्गुरत्वेनाहर्निशं तद्विनाशभीतिरस्त्येवेति भावः । वित्ते सम्पत्तावग्नि-
भूभृद्भयमग्नेः भूभृतो राज्ञश्च भयम्, अग्निदाहेन राज्ञः कोपेन च संपत्ति-
विनाशंशंकेति भावः । दास्ये भृत्यतायां स्वामिनः पत्युर्भयमातङ्कः, गुणे
दयादाक्षिण्यादौ खलस्य दुष्टस्य भयं, खलाः परनिन्दने स्वभावपटवो
भवन्तीति गुणवतोऽपि निन्दन्त्येवेति भावः । वंशे कुले, कुयोषितः कुल-

७२ औचित्यविचारचर्चा
टायाः स्त्रिया भयं, स्त्रीणां कदाचारेण कुलगरिमा विनश्यतीति भावः।
माने सम्माने, ग्लानिभयं भङ्गभीतिर्जये विजये रिपुभयं शत्रुभीतिः, काये
शरीरे, कृतान्ताद्यमाद् भयं, मृत्युभीतिरित्यर्थः । अहो इति खेदेन भवे
संसारे, सर्वं नाम निखिलसांसारिकसामग्रीजातं, भयं भयान्वितमिति
तात्पर्यं भवेत् स्यात् । केवलं वैराग्यमेवानासक्ततैवाभयं भयरहित-
मस्तीति शेषः ।
शान्तरस के औचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—शान्ते
यथा ममेति । भोगे-इति । इस असार संसार में कोई भी वस्तु भयरहित नहीं
है, क्योंकि भोग में रोग का, सुख में क्षय का, धन में अग्नि और राजा का,
नौकरी में मालिक का, गुण में निन्दकों का, कुल ( खान्दान में कुलटा स्त्रियों
का, सम्मान में उसके भंग का, विजय में शत्रु का, शरीर में मृत्यु का भय
बराबर लगा ही रहता है। केवल वैराग्य ही एक ऐसा है जो इस भय की परिधि
से बाहर है, इसलिये इसी का आश्रयण करना चाहिए यह अर्थ फलित होता है।
अत्र सकलजनाभिमतभोगसुखवित्तादीनां भयमयतया हेयतां प्रति-
पाद्य वैराग्यमेव सकलभयायासशमनमुपादेयतया यदुपन्यस्तं तेन शान्त-
रसस्य निरर्गलमार्गवितरणमुचिततरमुपदिष्टं भवति ।
अत्रोक्तपद्ये सकलजनाभिमतभोगसुखवित्तादीनां सम्पूर्णमानवानु-
मोदितभोगमोदधनप्रभृतीनां भयमयतया भीतिस्वरूपतया, हेयतां
त्याज्यतां, प्रतिपाद्य वर्णयित्वा, सकलभयायासशमनं निःशेषभीति-
विनाशकं, वैराग्यमेवोपादेयतया ग्राह्यतया, यदुपन्यस्तं यदभिहितं, तेन
तदभिधानेन, शान्तरसस्य, निरर्गलमार्गवितरणमनवरुद्धपथोप्लब्धि-
रुचिततरं समुचितरूपेणोपदिष्टं प्रतिपादितं भवति ।
इस पद्य में सभी मानवों से अभिनन्दित भोग, सुख, धन, आदि की भयप्रद
होने के कारण त्याज्यता दिखाकर, सभी भयों के संहारक के रूप में वैराग्य की
जो ग्राह्यता प्रतिपादित की गयी है उससे शान्तरस का मार्ग अधिक प्रशस्त
होता हुआ-सा प्रतीत होता है, वस्तुतः शान्तरस के औचित्य का यहाँ बहुत ही
सुन्दर समावेश किया गया है ।
यथा वा मम मुनिमतमीमांसायाम्—
कुसुमशयनं पाषाणो वा प्रियं भवनं वनं,
प्रतनु, मसृणस्पर्शं वासस्त्वगप्यथ तारवी ।

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ७३
सरसमशनं कुल्माषो वा धनानि तृणानि वा,
शमसुखसुधापानक्षब्ये समं हि महात्मनाम् ॥
शान्तरसौचित्यस्य द्वितीयमुदाहरणमुपस्थापयितुमाह—यथा वा
ममेति । कुसुमेति । कुसुमशयनं पुष्पशय्या, वा अथवा, पाषाणः कर्कशशिला,
प्रियं स्पृहणीयं, भवनमट्टालिकाऽथवाऽरक्षितं वनं, प्रतनु सूक्ष्मसूत्रमयं,
मसृणस्पर्शं कोमलं, वासो वस्त्रम्, अथाथवा, तरोरियं तारवी तरुसम्बन्धि-
नीति यावत्, त्वक् वल्कलं, सरसं स्निग्धं घृतादिसमन्वितमशनं भोजनं,
वा, कुल्माषो नीरसं यवपिष्टं, धनानि सम्पत्तयो वाऽथवा, तृणानि निः-
सारघासादीनि, महात्मनां जीवन्मुक्तानां, शमस्य शान्तेर्यत्सुखं तदेव
सुधाऽमृतं तस्याः पानेन क्षैब्ये सति उन्मत्ततायां सत्यां, समं तुल्यं, सर्वं
पूर्वोक्तमिति भावः ।
शान्तरसौचित्य का दूसरा उदाहरण दिखलाने के लिये कहा गया है—यथा
वा ममेति । कुसुमेति । उन महात्माओं के लिये (जो कि घृणा और आकर्षण
भी परिधि से बाहर हैं तथा शान्तिसुखरूप अमृत के पान से उन्मत्त से हो रहे
हैं) कोई भी वस्तु विशिष्ट या निकृष्ट नहीं होती, उनके लिये तो सुखद अट्टा-
लिका हो या दुःखप्रद सघन कानन कोमल और महीन पट्टवस्त्र हो या रुखड़े
वल्कल, स्निग्ध भोजन हो या शुष्क कदन्न, धन हो या तृण, सभी बराबर ही
मूल्य रखते हैं ।
अत्र सकलविकल्पतल्परहिताभेदावभाससमानात्मतत्त्वविश्रान्तिजनित-
सर्वसाम्यसमुल्लसितशमसुखपीयूषपानोदितनित्यानन्दघूर्णमानमानसानां
प्रियाप्रियसुखदुःखादिषु महतां सदृशी प्रतिपत्तिरिति जीवन्मुक्तिसमु-
चितमभिहितम् ।
अत्रोक्तपद्ये, सकलेन सर्वविधेन, विकल्पतल्पेन विकल्पास्पदेन, द्वैत-
भावमिश्रितकल्पनयेति यावत्, रहितमत एवाभेदेन सकलपदार्थाभिन्न-
तया योऽवभासः प्रतीतिः, तत्समानं तत्तुल्यं, यदात्मतत्त्वं, तत्र या
विश्रान्तिः स्थितिस्तज्जनितं तदुत्पन्नं, यत्सर्वसाम्यं सर्वसाधारण्यं, तेन
समुल्लसितमुद्भासितं, यच्छमसुखं शान्तिजन्यानन्दस्तदेवामृतं, तत्पानेन
तदास्वादनेनोदितः समुत्पन्नः, यो नित्यानन्दः शाश्वतिकानन्दस्तेन घूर्ण-
मानं मत्ततामाश्रयमाणं, मानसं चित्तं, येषान्तेषां महतां महापुरुषाणां,
प्रियाप्रियसुखदुःखादिष्वनुरक्तिविरक्तिकारणेध्विति भावः, सदृशी समानेव,

७४ औचित्यविचारचर्चा
प्रतिपत्तिज्ञानमिति, जीवन्मुक्तिसमुचितं जीवन्मुक्तावस्थानुरूपम्, अभिहितं
प्रतिपादितम्।
इस पद्य में विकल्परहित समता के ज्ञान से परिपूर्ण आत्मतत्त्व में विचरण-
करने से उत्पन्न शान्ति-सुधा के आस्वादन से मदमत्त महात्माओं का जा अनु-
रक्तिविरक्तिकारणीभूत सुख-दुःख आदि के विषय में तुल्यता-ज्ञान का प्रतिपादन
किया गया है, वह पूर्णतया जीवन्मुक्तावस्था के अनुकूल है। अर्थात् महात्माओं
को लक्ष्य कर जो इस तरह समदृष्टि की सर्जना की गयी है इस औचित्य से
शान्तरस पूर्ण परिपुष्ट होता हुआ सा प्रतीत होता है।
नतु यथा श्रीमदुत्पलराजस्य—
अहौ वा हारे वा बलवति रिपौ वा सुहृदि वा,
मणौ वा लोष्टे वा कुसुमशयने वा दृषदि वा।
तृणे वा स्त्रैणे वा मम समदृशो यान्ति दिवसाः,
क्वचित्पुण्यारण्ये शिवशिवशिवेति प्रलपतः॥
शान्तरसानौचित्योदाहरणमुपस्थापयितुमाह-नतु यथेति। अहाविति।
अहौ सर्पे, वाऽथवा, हारे माल्ये, बलवति बलशालिनि, रिपौ शत्रौ, वा,
सुहृदि मित्रे, मणौ पद्मरागादौ, वाऽथवा, लोष्टे लौहे, कुसुमशयने पुण्य-
शय्यायां, वा दृषदि कर्कशशिलाखण्डे, तृणे निःसारघासादौ, वा, स्त्रैणे
जगदाकर्षणैककेन्द्रे स्त्रीणां समूहे, समदृशस्तुल्यदृष्टेः, “शिवशिवशिव"
इति प्रलपत उन्मत्तवदुच्चारयतो मम दिवसा दिनानि, क्वचित्कस्मिंश्चित्पु-
ण्यारण्ये पवित्रकानने, यान्तु व्यतिगच्छन्तु।
शान्त रस के अनौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—नतु
यथेति। अहाविति। चाहे विषात्मक सर्प हो या शीतल पुष्पमाला बलवान् शत्रु
हो या परमप्रिय मित्र, बहुमूल्य मणि हो या नगण्य लोह, सुखद पुष्पशय्या हो
या रूखड़ा प्रस्तरखंड, तुच्छ तृण हो या विश्व का एकमात्र आकर्षण केन्द्र स्त्रियों
का समूह, सब में मेरी समान दृष्टि हो, साथ ही किसी एकान्त और पवित्र
कानन में रहकर शिव शिव जपते हुए ही मेरे दिन बीते।
अत्र जीवन्मुक्तोचितं प्रियाप्रियरागद्वेषोपशमलक्षणमोक्षक्षमं सर्व-
साम्यमहिहारसुहृदरिसमदृष्टिरूपमभिदधता क्वचित्पुण्यारण्ये यदभिहितं
तद्विकल्पप्रतिपादकमभेदवासना विरुद्धमनुचितमवभासते। धाराधिरूढ-
सर्वसाम्यविगलितभेदाभिमानग्रन्थेर्हि सर्वत्र सर्वं शिवमयं पश्यतस्तपोवने

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ७५
नगरावस्करकूटे च विमलात्मलाभतृप्ततया समानदृशः क्वचित्पुण्या-
रण्यादिवचनमनुचितोच्चारणमेव ॥ १६ ॥
अत्र पद्ये, जीवन्मुक्तोचितं जीवनकालेऽपि ब्रह्मज्ञानसम्पदा यो
भवबन्धरहितः स जीवन्मुक्तस्तदनुरूपं, प्रियाप्रिययोः रागद्वेषयोश्च य
उपशमो निवृत्तिस्तत्क्षणो यो मोक्षस्तत्क्षमम्, अहिहारसुहृदरिसमदृष्टि-
रूपं सर्पमाल्यमित्रामित्रादिषु तुल्यदृष्टिस्वरूपं, सर्वसाम्यं सरलाभेदाव-
भासम्, अभिदधता प्रतिपादयता क्वचित्पुण्यारण्ये इति यदभिहितं
यत्प्रतिपादितं, विकल्पप्रतिपादकं द्वैताबोधकमत एवाभेदवासनाविरुद्धमे-
कत्वसंस्कारप्रतिकूलं, तत्कथनमनुचितमवभासते प्रतीयते । तत्र हेतुमाह-
धारेति । धाराधिरूढसर्वसाम्यविगलितभेदाभिमानग्रन्थेः प्रवाहाश्रितसम-
भावविनष्टभेदाहङ्कारस्य, हीति निश्चयेन, सर्वत्र सर्वं निखिलं, शिवमयं
कल्याणमयं, पश्यतोऽवलोकयतः, तपोवने पावनकानने, नगरावस्करकूटे
पुरविष्ठासमुदाये, च, विमलात्मलाभतृप्ततया निर्मलात्मतत्त्वज्ञानसन्तुष्ट-
तया, समानदृशः समदृष्टेः, क्वचित्पुण्यारण्यादिवचनं "क्वचित्पुण्यारण्ये"-
इत्याकारकोक्तिरनुचितोच्चारणमेव विरुद्धकथनमेव ॥ १६ ॥
इस पद्य में जीवन्मुक्त महापुरुष के अनुरूप, प्रिय-अप्रिय, और राग-द्वेष के
प्रशमरूप मोक्ष के योग्य, सर्प और माल्य, मित्र और शत्रु में समदृष्टतारूप
सर्वसाम्य का प्रतिपादन करके "क्वचित्पुण्यारण्ये" इस अंश का जो उपाख्यान
किया गया है वह द्वैतभावप्रतिपादक है, अतएव अभेदभावना के विरोधी होने के
कारण अनुचित प्रतीत होता है क्योंकि अविच्छिन्न समभाव के प्रभाव से
जिनके मिथ्या ज्ञान की गुत्थी सुलझ चुकी है । अतएव जो समूचे जगत् को कल्याण-
मय देख रहे हैं ऐसे महात्माओं के लिये "तपोवन या नागरिक अपावन भूभाग"
दोनों के मूल्य बराबर होने चाहिये । फिर "क्वचित्पुण्यारण्ये" इस वचन के
द्वारा उनमें जो पावन-अपावन का भेदभाव उत्पन्न किया गया है वह है अयुक्त
ही नहीं अपि तु नितान्त अनुचित भी है । वस्तुतः इस कथन से शान्तरस का
पोषण न होकर शोषण हो जाता है । इसलिये यह पूर्णतया शान्तरसानौचित्य का
द्योतक है ॥ १६ ॥
यथा मधुरतिक्ताद्या रसाः कुशलयोजिताः ।
विचित्रास्वादतां यान्ति शृङ्गाराद्यास्तथा मिथः ॥ १७ ॥

७६ औचित्यविचारचर्चा
तेषां परस्पराश्लेषात्कुर्यादौचित्यरक्षणम्।
अनौचित्येन संस्पृष्टः कस्येष्टो रससङ्करः॥ १८ ॥
रससङ्करौचित्यं परिभाषितुमाह—यथा मधुरेति। यथा कुशल-
योजिताः पाकविधिज्ञजनप्रयुक्ताः मधुरतिक्ताद्या मधुराम्ललवणादिषट्-
प्रकारका रसा विचित्रास्वादतामपूर्वास्वाद्यतां, यान्ति प्राप्नुवन्ति, तथैव
शृङ्गाराद्याः शृङ्गारवीरादयोऽपि रसाः, मिथः परस्परं सम्मिलिताः,
विशिष्टानुरञ्जनप्रदा भवन्तीति भावः। (परन्तु) तेषां शृङ्गारवीरादीनां
रसानां, परस्पराश्लेषात्पारस्परिकसम्मिश्रणादौचित्यरक्षणमुक्तलक्षणौ-
चित्यस्य रक्षणं, कुर्यात्कुर्वीत। (यतो हि) अनौचित्येन संस्पृष्टः अनौ-
चित्यलेशमात्रवासितोऽपि, रससङ्करो रससम्मिश्रणं, कस्येष्टोऽभिलषितोऽपि
तु न कस्यापीति भावः।
रससंकरौचित्य की परिभाषा की जा रही है यथा मधुरेति। पाकविधि के
विशेष जानकार पाचकों के द्वारा मीठे-कड़वे रसों के सम्मिश्रण से जैसे अपूर्व
स्वाद प्राप्त होता है, वैसे ही शृङ्गार-वीर आदि रसों का संकर (मिश्रण) भी
अपूर्व आनन्द की सृष्टि कर देता है। परन्तु दो-तीन रसों का मिश्रण करते
समय औचित्यरक्षण के ऊपर बराबर ध्यान केन्द्रित रखना चाहिये, क्योंकि
औचित्य से रहित रससंकर कभी भी आनन्दप्रद नहीं हो सकता है।
रसाः कटुकमधुराम्ललवणाद्याः कुशलसूदेन वेसवारपानादिषु योजिता
विचित्रास्वादतामुपयान्ति तथैव परस्परमविरुद्धाः शृङ्गारादय इति
तेषामन्योन्यमङ्गभावयोजनायामौचित्यस्य जीवितसर्वस्वभूतस्य रक्षां
कुर्यात्। अनौचित्यरजसा रससंयोगः स्पृष्टो न कस्यचिदभिमत इत्यर्थः।
उक्तार्थमेव विवृण्वन्नाह--रसा इति। कटुकमधुराम्ललवणाद्या जिह्वा-
माध्यमेनानुभवनीया रसाः, कुशलसूदेन पाचनक्रियाभिज्ञपाचकद्वारा, वेस-
वारपानादिषु शुण्ठ्यादिचूर्णघटितपेयविशेषेषु, योजिताः सम्मेलिताः, यथा
विचित्रास्वादतामपूर्वास्वादनीयतामुपयान्ति गच्छन्ति, तथैव परस्परम-
न्योन्यमविरुद्धा विरोधभावरहिताः शृङ्गारादयः शृङ्गार-वीर-हासादयो
हृदयमाध्यमेनानुभवनीया रसाः, इति तेषां रसानामन्योऽन्यं परस्परमङ्ग-
भावयोजनायामङ्गाङ्गिभावरूपेण सम्मेलनकाले, जीवितसर्वस्वस्य प्राणाधा-
यकस्यौचित्यस्यानुरूपभावस्य रक्षां कुर्याद्रक्षणं विदध्यात्। (यतो हि)

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ७७
अनौचित्यरजसाऽनौचित्यकणमात्रेणापि, स्पृष्टः संपृक्तो रससंयोगो रस-
सङ्करो, न कस्यचित्कस्याप्यभिगतोऽभीष्ट इत्यर्थः ।
पूर्वोक्त कारिका की ही व्याख्या की जा रही है - रसा इति। मीठा, खट्टा,
कड़वा आदि रस ( जिनके प्रत्यक्षीकरण का माध्यम जिह्वा है ) भी कुशल-पाचक
के द्वारा वेसवार ( शुंठीमिश्रित पानकविशेष ) के पान में मिश्रित होकर अपूर्व
स्वाद प्रदान करता है वैसे ही परस्पर अविरुद्ध शृङ्गारादिरस ( जिनके प्रत्यक्षी-
करण का माध्यम हृदय है ) के अङ्गाङ्गिभाव की योजना में प्राणस्वरूप औचित्य
की रक्षा करनी ही चाहिये, क्योंकि अनौचित्य की छाया भी पड़ जाने पर रस-
सङ्कर अपनी महिमा खो बैठता है ।
रससङ्करौचित्ये शान्तशृङ्गारयोरङ्गाङ्गिभावो यथा भगवतो
महर्षेर्व्यासस्य-
सत्यं मनोरमा रामाः सत्यं रम्या विभूतयः ।
किन्तु मत्ताङ्गनापाङ्ग-भङ्गिलो लं हि जीवितम् ॥
रससङ्करौचित्ये प्रस्तुते प्रथमं शान्तशृङ्गारयोः सङ्करस्योदाहरणं
प्रदर्शयितुमाह-यथा भगवतो महर्षेर्व्यासस्येति । सत्यमिति । रामा नार्यः,
सत्यं वस्तुतो, मनोरमा मनोमोदहेतवः, विभूतयः सांसारिकैश्वर्याणि, रम्या
मनोरमा इत्यपि सत्यमेव, किन्तु, जीवितं जीवनं, हि निश्चयेन, मत्ताया
मदव्याघूर्णितलोचनायाः, अङ्गनाया रमण्याः, अपाङ्गस्य नेत्रकोणभागस्य,
भङ्गिवत्कटाक्षवदिति यावल्लोलं चञ्चलमचिरव्यापीति भावो वर्तते
इति शेषः ।
शान्त शृङ्गार के अङ्गाङ्गिभाव से सम्पन्न रससंकर का उदाहरण दिखाने
के लिए कहा गया है यथा भगवतो व्यासस्येति । सत्यमिति । यह सत्य है कि
सुन्दरियाँ पुरुषों के चित्त को आनन्द प्रदान करती हैं और यह भी सत्य है कि
सांसारिक ऐश्वर्य उपभोग करने के योग्य है, परन्तु मनुष्य का जीवन ही मदमत्त-
कामिनी की अपाङ्गवीक्षणशैली के समान अत्यन्त अञ्चल ( अचिरस्थायी ) है ।
इससे यह व्यक्त होता है कि सांसारिक सुख का चिन्तन छोड़कर आध्यात्मिक
चिंतन ही उचित है ।
अत्र भगवता जन्तुहिताभिनिविष्टेन मोक्षक्षमोपदेशोऽङ्गिनः शान्त-
रसस्य रागिजनानिष्टत्वात्सकलजनमनः प्रह्लादने बालगुडजिह्विकया

७८ औचित्यविचारचर्चा
शृङ्गारेऽङ्गभावमुपनीते पर्यन्ते शान्तस्यैव लोलं जीवितमित्यनित्यता-
प्रतिपादनपरिनिर्वाहेण परमौचित्यमुच्चैः कृतम् ।
अत्रोक्तपद्ये, जन्तुहिताभिनिविष्टेन प्राणिकल्याणकामिना, भगवता
व्यासेन, मोक्षक्षमोपदेशे सायुज्यसारूप्यादिरूपमोक्षप्रदोपदेशेऽङ्गिनः
प्रधानभूतस्य शान्तरसस्य, रागिजनानिष्टत्वादनुरक्तनरानभिप्रेतत्वात्सकल-
जनमनःप्रह्लादने निखिलमानवचित्तानुरञ्जने, बालगुडजिह्विकया गुडं
भक्षयित्वा कर्णौ छेदयतोति लौकिकाचारेण, शृङ्गारेऽङ्गभावमुप-
नीतेऽङ्गतां प्रापिते, शान्ताङ्गतया शृङ्गाररसे वर्णित इति भावः,
पर्यन्ते समाप्तौ, जीवितं, लोलमचिरस्थायीति रीत्याऽनित्यताया जीवना-
स्थैर्यस्य, प्रतिपादनस्य कथनस्य, परिनिर्वाहेण पूर्णतः सिद्ध्या, शान्तस्यैव,
परमौचित्यमतिसमीचीनत्वमुच्चैः कृतं साधु निर्दिष्टम् । एतेन शान्त-
शृङ्गारयोरङ्गाङ्गिभावः समर्थितः क्षेमेन्द्रेणेति बोध्यम् । प्राय एवमेव
ध्वनिकारोऽपि मन्यते, ध्वन्यालोकस्य तृतीयोद्द्योते "विनेयानुन्मुखीकर्तुं
काव्यशोभार्थमेव वा । तद्विरुद्धरसस्पर्शस्तदङ्गानां न दुष्यति" इत्युक्तेः ।
वाग्देवतावतारो मम्मटस्तु "सञ्चार्यादेर्विरुद्धस्य बाध्यस्योक्तिर्गुणावहा"
इति कारिकार्थोदाहरणतयेदं पद्यमुद्धृत्य "इत्यत्राद्यमर्थं बाध्यत्वेनैवोक्तम् ।
जीवितादप्यधिकमपाङ्गभङ्गस्यास्थिरत्वमिति प्रसिद्धभङ्गुरोपमान-
तयोपात्तं शान्तमेव पुष्णाति न पुनः शृङ्गारस्यात्र प्रतीतिस्तदङ्गाप्रति-
पत्तेः । नतु विनेयोन्मुखीकरणमत्र परिहारः, शान्तशृङ्गारयोर्नैरन्तर्य-
स्याभावात् । नापि काव्यशोभाकरणं, रसान्तरादनुप्रासमात्राद्वा तथा-
भावात् । इत्युक्त्या शान्तशृङ्गारयोरङ्गाङ्गिभावं निषेधत्येवेति सुधी-
भिर्विभावनीयम् ।
इस पद्य में मानवकल्याणकामी भगवान् व्यास ने अपने मोक्षप्रद उपदेश
में विषयी जनों के लिये अङ्गिभूतशान्त रस के अनभिप्रेत होने के कारण निखिल-
मानवान्तःकरण के अनुरंजनार्थ 'गुड़ खिलाकर जैसे बच्चे के कान छेद दिये
जाते हैं" उसी तरह अर्थात् आकर्षक वस्तु का प्रलोभन देकर अभिप्रेत विषय
पर ले आने वाली नीति से शृंगार को शान्त अंग बनाकर अंत में "जीवन
चंचल है" इस रूप में जीवन की अनित्यता के प्रतिपादन से शान्त रस की ही
पुष्टि की है। अतः यह शान्त और शृंगार का संकर समुचित है। यहाँ आचार्य

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ७९
मम्मट का मत कुछ भिन्न है जिसका परिचय इस स्थल की संस्कृत व्याख्या से
करना चाहिये ।
बीभत्सशृङ्गारयोरङ्गाङ्गिभावो यथा मम बौद्धावदानकल्पलतायाम्-
क्षीबस्येवाचलस्य द्रुतहृतहृदया जम्बुकी कण्ठसक्ता,
रक्ताभिव्यक्तकामा कमति नखमुखोल्लेखमासूत्रयन्ती ।
आस्वाद्यास्वाद्य यूनः क्षणमधरदलं दत्तदन्तव्रणाङ्कं,
लग्नानङ्गक्रियायामियमतिरभसोत्कर्षमाविष्करोति ॥
बीभत्सशृङ्गारसङ्करौचित्यस्योदाहरणमुपस्थापयितुमाह-यथा ममेति ।
क्षीबस्येति । क्षीबस्य मत्तस्येवाचलस्य निश्चलस्य, वस्तुतस्तु मृतस्येति
भावः, यूनस्तरुणस्य, द्रुतं शीघ्रं, हृतं भक्षयितुं निःसारितं हृदयं यया सा,
शृङ्गारपक्षे-कामोद्भावनया शीघ्राकृष्टचित्ता, कण्ठसक्ता कण्ठे लग्ना,
बीभत्से भक्षयितुं, पक्षान्तरे कामभावनामुत्तेजयितुमिति विशेषः, रक्ते
शोणितेऽभिव्यक्तः प्रकटितः, कामः पातुमिच्छा यया सा, पक्षान्तरे रक्ता-
ऽनुरक्ताऽत एवाभिव्यक्तकामा प्रकटितमनसिजा ( सा जम्बुकी ), नख-
मुखयोरुल्लेखं क्षतमासूत्रयन्ती रचयन्ती भोक्तुं नखदन्तप्रहारेण मांसं
निःसारयन्तीत्यर्थः । पक्षान्तरे-रतिक्रियाविशेषानुसारं नखदन्तप्रहारं
कुर्वतीत्यर्थः, एवंभूता सती, कमति चकास्ति, ( तथा तस्यैव यूनः ) दत्तं
कृतं, व्रणस्य क्षतस्याङ्कः चिह्नं यत्रैवंभूतं, पक्षद्वयेऽपि तुल्यमेतत्, अधरदलं,
क्षणं निमेषमात्रम्, आस्वाद्यास्वाद्य वारंवारं भुक्त्वा, पक्षान्तरे--परि-
चुम्ब्य, अनङ्गक्रियायां क्रमशोडङ्गभक्षणेनाङ्गाभावकरणकार्ये, पक्षान्तरे-
कामव्यञ्जकचेष्टायां लग्ना प्रयत्नशीला, इयमेषा, जम्बुकी शृगाली,
अतिरभसोत्कर्षं गात्राणामूर्ध्वगतं कर्षणं, पक्षान्तरे रतिकौशलोत्कर्षमावि-
ष्करोति प्रकटयति ।
बीभत्स-शृंगार के संमिश्रण के औचित्य को प्रदर्शित करने के लिये कहा
गया है-यथा ममेति । क्षीबस्येति । जम्बुकी मृत युवा के हृदय को निकाल कर,
खून पीने की लालसा से कंठ पकड़ कर नख और दाँत का प्रहार कर रही है तथा
दन्तक्षत से चिह्नित ओठों को नोंच नोंच कर बारबार स्वाद स्वाद से खा रही है,
इस प्रकार उस (मृत युवक) को अंगरहित बनाने में अत्यन्त हर्ष प्रगट करती हुई
ठीक उसी तरह लग रही है जैसे कोई कामिनी मदमत्त पड़े हुए युवक के प्रति
आकृष्टचित्त होकर अपनी अनुरक्तता प्रगट करने के लिये कंठ पकड़ कर चुम्बन

८० | औचित्यविचारचर्चा

और नखच्छेद अंकित कर रही हो, साथ ही दन्तक्षत से चिह्नित उस ( युवा )
के अधर का बारबार आस्वादन करके अपनी कामकलाव्यञ्जक चेष्टा करने में
अपनी खुशो प्रकट कर रही हो ।
अत्र श्लेषोपमया तुल्यकक्षाधिरूढयोरपि परस्वरविरुद्धयोरर्थयोर्बी-
भत्सशृङ्गारयोराङ्गाङ्गिभावयोजनायां जम्बुकी तरुणशवस्य क्षीबस्येव
निश्चलस्थितेः सहसैव हृतहृदयपद्माकृष्टचित्ता वा, कण्ठे लग्ना शोणिते
भृशमभिव्यक्तस्पृहा रक्ताभिव्यक्तकामा वा, नखोल्लेखमासूत्रयन्ती दत्त-
दन्तव्रणमधरमास्वाद्यास्वाद्याङ्गच्छेदक्रियायामनङ्गभोगक्रियायां वा,
लग्ना गात्राणामूर्ध्वगतं कर्षशं रतकौशलोत्कर्षं वा, प्रकाशयतीति समा-
नयोर्बीभत्सशृङ्गारयोः कामिनीपदपरित्यागेन केवलं जम्बुक्याः कर्तृत्वेन
बीभत्सस्यैव प्राधान्ये शृङ्गारेऽङ्गतामुपगते वक्तुर्बोधिसत्त्वस्यान्तर्गतगाढ-
वैराग्यवासनाधिवासितचेतसः कुत्साइर्हजुगुप्सया नितम्बिनीरतिविडम्ब-
नमौचित्यरुचिरतामादधाति । यद्यप्यत्र महावाक्ये शान्तस्यैव प्राधान्यं
तथाप्युदाहरणश्लोकवाक्ये बीभत्सस्यैव ।
अत्रोक्तपद्ये, श्लेषोपमया श्लेषमूलकेनोपमालङ्कारेण, तुल्यकक्षाधि-
रूढयोरपि समानस्तरयोरपि, परस्परविरुद्धयोरर्थयोर्मृततरुणजम्बुकी-
वृत्तान्तकामाकुलतरुणतरुणीवृत्तान्तरूपयोरित्यर्थः, बीभत्सशृङ्गारयो-
रङ्गाङ्गिभावरूपेण वर्णनायां, जम्बुकी, क्षीबस्य मत्तस्येव, निश्चल-
स्थितेस्तरुणशवस्य मृतयुवकशरीरस्य, सहसैव हठादेव, हृतहृदयपद्मा
निःसारितहृदया, कृष्टचित्ताऽऽकृष्टमानसा वा, कण्ठे लग्ना सक्ता, शोणिते
भृशमत्यन्तमभिव्यक्तस्पृहा प्रकटितवाञ्छा, रक्ताभिव्यक्तकामाऽनुरक्त-
तया प्रकटितमनसिजविकारा वा, नखोल्लेखं नखाघातमासूत्रयन्ती विद-
धती, दत्तदन्तव्रणं कृतदन्ताघातम्, अधरमास्वाद्यास्वाद्याङ्गच्छेदक्रियायाम-
वयवविनाशकार्येऽनङ्गभोगक्रियायां कामोपभोगकार्ये वा, लग्ना, गात्राणा-
मूर्ध्वगतमूर्ध्वदेशावच्छिन्नं कर्षशं, रतकौशलोत्कर्षं रतिकलावैशिष्ट्यं वा,
प्रकाशयतीति समानयोस्तुल्ययोर्बीभत्सशृङ्गारयोः, कामिनीपदपरित्या-
गेन कान्तापदपरिवर्जनेन, केवलं, जम्बुक्याः शृगाल्याः कर्तृत्वेन बीभत्स-
स्यैव प्राधान्ये मुख्यत्वे, शृङ्गारेऽङ्गतामुपगतेऽङ्गभावमासादिते, वक्तुः
प्रतिपादकस्य, बोधिसत्त्वस्य भगवतो बुद्धस्यान्तर्गतगाढवैराग्यभावनाधि-

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ८१

वासितचेतसः, हृद्गतोग्रवैराग्यभावनासंवलितचित्तस्य, कुत्सार्हजुगुप्सया
निन्दनीयघृणया, औचित्यरुचिरतामौचित्यचारुतामावहति धारयति ।
यद्यप्यत्र महावाक्ये पूर्णकाव्ये, शान्तस्यैव ( रसस्य ) प्राधान्यं मुख्यत्वं
प्रधानतया वर्णनमिति यावत्, अस्तीति शेषः, तथापि उदाहरणश्लोक-
वाक्ये प्रस्तुतश्लोके बीभत्सस्यैव प्राधान्यमस्तीति भावः ।
इस श्लोक में श्लेषगर्भ उपमालंकार के द्वारा दोनों अर्थ समान स्तर पर
आधारित हैं और परस्पर विरुद्ध भी हैं, फिर भी उन दोनों ( बीभत्स तथा
शृंगार ) के अङ्गाङ्गिभाव की योजना करने पर यद्यपि ( शृगाली मत्त के समान
निश्चल पड़े हुए मृत युवक का हृदय निकाल कर, पक्षान्तर में स्वयं आकृष्ट
होकर कण्ठ पकड़ कर खून चूसने की कामना से, अथवा अनुरक्त होने के कारण
कामवासना प्रगट करने की भावना से, नख-प्रहार करती हुई, दन्तक्षत से चिह्नित
अधर का बार-बार आस्वादन करके अंगच्छेद क्रिया में अथवा कामोपभोग क्रिया
में लगी हुई, शरीर के ऊपरी भाग के कर्षण को, अथवा रति-कला के उत्कर्ष
को प्रकाशित कर रही है )। ये दोनों अर्थ समान रूप से व्यक्त होते हैं । लेकिन
कामिनी पद का परित्याग कर जम्बुकी को कर्ता बनाने के कारण यहाँ पर
बीभत्सरस की ही प्रधानता हो जाती है, शृंगार उसका अंग हो जाता है । ऐसी
स्थिति में हार्दिक गहन वैराग्यभावना से युक्त चित्तवाले वक्ता बोधिसत्त्व
( भगवान् बुद्ध ) की निन्दनीय घृणास्पदताजन्य अभिव्यक्ति के द्वारा "कामिनी-
कल्लोल एक व्यर्थ की चीज है" ऐसा अभिप्राय अत्यन्त समीचीनता को धारण
कर लेता है । यद्यपि इस काव्य ( बौद्धावदान-कल्पलता ) में शान्तरस की ही
प्रधानता प्रतिपादित की गयी है, परन्तु प्रस्तुत श्लोक में बीभत्स-रस की ही प्रधा-
नता है । अतएव उपर्युक्त विवेचना संगत हुई ।
वीरकरुणयोर्यथा मम मुनिमतमींसायाम्—
गाण्डीवस्स्रुवमार्जनप्रणयिनः स्नातस्य बाष्पाम्बुभि-
श्चण्डं खाण्डवपावकादपि परं शोकानलं बिभ्रतः ।
जिष्णोर्नूतनयौवनोदयदिनच्छिन्नाभिमन्योश्चिरं,
हा वत्सेति बभूव सैन्धववधारब्धाभिचारे जपः ॥
वीरकरुणयोः सङ्करस्योदाहरणमुपस्थापयितुमाह—यथा ममेति ।
गाण्डेवेति । गाण्डीवो नाम धनुर्विशेषः स एव स्रुवस्तस्य तत्कर्मकस्येति
भावः, मार्जनस्य परिशुद्धेः प्रणयिनः प्रियस्य गाण्डीवधन्वन इति भावः,
६ औ०

वाष्पाम्बुभिरश्रुजलैः स्नातस्याभिषिक्तस्य, खाण्डवपावकादपि खाण्डव-
वनदाहकवह्नेरपि, परमत्यन्तं चण्डं भीमं, शोकानलं पुत्रवियोगशोकवह्निं,
बिभ्रतो धारयतः, नूतनयौवनोदयदिने नवयौवनोद्गमसमकाल एव, छिन्ना-
भिमन्योर्मारिताभिमन्युनामकपुत्रस्य, जिष्णोर्विजयिनोऽर्जुनस्य, "हा
वत्स !" इति विलापः, सैन्धवस्य सिन्धुराजस्य जयद्रथस्य, वध एवाऽऽ-
रब्धः प्रारब्धोऽभिचारो मारणात्मकानुष्ठानविशेषस्तत्र, जपो बभूव ।
वीर और करुण के संकर का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है—
यथा मम मुनिमतेति । गाण्डीवेति । अग्निसेवन, स्रुवसम्मार्जन, तथा जप आदि
किसी भी अनुष्ठान के आवश्यक अंग हुआ करते हैं, आज अर्जुन ने भी जयद्रथ-
वध रूप अभिचार ( एक मारणात्मक अनुष्ठानविशेष ) का आरम्भ कर दिया
है, अतः वे ( अर्जुन ) अपने गांडीवरूप स्रुव का सम्मार्जन कर रहे हैं, अश्रु-
जल से अभिषिक्त होकर खाण्डववन को जलाने वाली अग्नि से भी भयानक पुत्र-
शोकजन्य-वह्नि को धारण करते हुए, हा पुत्र ! हा पुत्र ! इस तरह के विलाप-
वचनरूप मंत्र का जाप कर रहे हैं । तात्पर्य यह है कि जिस जयद्रथ ने चढ़ती
जवानी में ही अभिमन्यु जैसे प्रिय पुत्र की हत्या कर दी है, उस ( जयद्रथ ) का
वध करने की दीक्षा अर्जुन ले चुके हैं ।
अत्र त्रिगर्तसंग्रामगतस्य गाण्डीवधन्वनः शत्रुभिर्नवयौवनोदयसमय-
निहततनयस्य कार्मुकस्रुवमुन्मार्जयतः प्रसरदश्रुस्नातस्य शोकाग्निमुद्वह-
तश्चिरं हा पुत्रेति जयद्रथवधारब्धाभिचारे जपो बभूवेति यदुपन्यस्तं,
तेनारिक्षये दीक्षासमुचितव्रतवर्णनया शोकाग्नेश्चण्डत्वेन खाण्डवपदोदी-
रणेन वीररसस्याङ्गिनः सहसैवागन्तुके करुणरसे प्रज्वलिते सैन्धववधा-
रब्धाभिचाराभिधानेन पर्यन्ते शौर्यनिर्वाहेण परममौचित्यमुज्जृम्भते ।
अत्रोक्तपद्ये, त्रिगर्त्तसंग्रामगतस्य त्रिगर्त्तयुद्धनिरतस्य, गाण्डीवधन्वनो
गण्डीवनामकधनुर्धारिणः, शत्रुभिर्नवयौवनोदयसमयनिहततनयस्य शत्रु-
द्वारा नवयौवनारम्भसमकालमेव हतपुत्रस्य, कार्मुकस्रुवं धनुःस्वरूपस्रुव-
मुन्मार्जयतः, प्रसरदश्रुस्नातस्य निपतद्वाष्पवारिसिक्तस्य, शोकाग्निं दुःखा-
नलमुद्वहतो धारयतोऽर्जुनस्येति यावत्, चिरं बहुकालपर्यन्तं, “हा पुत्र !”
इति जयद्रथवधारब्धाभिचारे सिन्धुराजविघातात्मकप्रारब्धमारण-
कर्मणि, जपो बभूवेति यदुपन्यस्तं, तेनोपन्यासेनारिक्षये, दीक्षासमुचित-
व्रतवर्णनया शत्रुविनाशविषयिणी या दीक्षा तदुचितं यद्व्रतं तद्वर्णनेन,

colon?
Look between 'ध' and 'द्रि':
Wait! Look at:
क्रोध : द्रिक्तो...? No, look at the glyph:
Wait, is it "क्रोधोद्रिक्तोरुरोग..."?
Let's look at the syllables:
तीक्ष्णा-न्त-स्त्री-क-टा-क्ष-क्ष-त-हृ-द-य-त-या व्य-क्त-सं-स-क्त-र-क्ताः (Sragdharā metre: 21 syllables: 7 + 7 + 7)
Let's count:
तीक्ष्णा-न्त-स्त्री-क-टा-क्ष (6)
क्ष-त-हृ-द-य-त-या (7) -> तीक्ष्णान्तस्त्री (4) कटाक्ष (3) = 7
क्षतहृदयतया (7)
व्यक्तसंसक्तरक्ताः (7) -> 7+7+7 = 21! Sragdharā metre!
Now let's check line 2 for Sragdharā metre:
It must have 21 syllables:
क्रोधोद्रिक्तोरुरोग (7) :
क्रो (1) धो (2) द्रि (3) क्तो (4) रु (5) रो (6) ग (7) = 7!
व्रणगणगणना (7) :
व्र (1) ण (2) ग (3) ण (