औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता ६९
एवमाह ? मुसली बलरामः कथयतीति शेषः, मिथ्याऽसत्यमेतत्, यदि
न विश्वसिहि र्तार्ह ममाननं पश्य विलोकय, यदि मया मृद् भक्षिता भवे-
र्तार्ह तच्चिह्नमप्यवश्यं मे मुखे भवेदित्याशयः, व्यादेहि मुखं व्यादाय
दर्शयेति मात्राभिहिते अथानन्तरं, (कृष्णेन) वदने मुखे, विकासिते
प्रसारिते सति, (तत्र मुखे) समस्तं सम्पूर्ण, जगत्संसारं, दृष्ट्वा विलोक्य,
यस्य कृष्णस्य माता, विस्मयपदमाश्चर्यपदवीं, जगाम गतवती, स केशवः
कृष्णः, वो युष्मान्, पायादव्यात् ।
अद्भुतरस के औचित्य का उदाहरण दिखलाने के लिए कहा गया है—
अद्भुते यथा चन्दकस्येति। कृष्णेनेति। बालकृष्ण की शिकायत करते हुए बलराम
ने माँ से कहा कि ऐ माँ ! आज खेलते समय कृष्ण ने इच्छापूर्वक बहुत-सी
मिट्टी खाली है। हाँ जी कृष्ण ? किसने तुमसे ऐसा कहा है माँ ?