औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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टायाः स्त्रिया भयं, स्त्रीणां कदाचारेण कुलगरिमा विनश्यतीति भावः।
माने सम्माने, ग्लानिभयं भङ्गभीतिर्जये विजये रिपुभयं शत्रुभीतिः, काये
शरीरे, कृतान्ताद्यमाद् भयं, मृत्युभीतिरित्यर्थः । अहो इति खेदेन भवे
संसारे, सर्वं नाम निखिलसांसारिकसामग्रीजातं, भयं भयान्वितमिति
तात्पर्यं भवेत् स्यात् । केवलं वैराग्यमेवानासक्ततैवाभयं भयरहित-
मस्तीति शेषः ।
शान्तरस के औचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—शान्ते
यथा ममेति । भोगे-इति । इस असार संसार में कोई भी वस्तु भयरहित नहीं
है, क्योंकि भोग में रोग का, सुख में क्षय का, धन में अग्नि और राजा का,
नौकरी में मालिक का, गुण में निन्दकों का, कुल ( खान्दान में कुलटा स्त्रियों
का, सम्मान में उसके भंग का, विजय में शत्रु का, शरीर में मृत्यु का भय
बराबर लगा ही रहता है। केवल वैराग्य ही एक ऐसा है जो इस भय की परिधि
से बाहर है, इसलिये इसी का आश्रयण करना चाहिए यह अर्थ फलित होता है।
अत्र सकलजनाभिमतभोगसुखवित्तादीनां भयमयतया हेयतां प्रति-
पाद्य वैराग्यमेव सकलभयायासशमनमुपादेयतया यदुपन्यस्तं तेन शान्त-
रसस्य निरर्गलमार्गवितरणमुचिततरमुपदिष्टं भवति ।
अत्रोक्तपद्ये सकलजनाभिमतभोगसुखवित्तादीनां सम्पूर्णमानवानु-
मोदितभोगमोदधनप्रभृतीनां भयमयतया भीतिस्वरूपतया, हेयतां
त्याज्यतां, प्रतिपाद्य वर्णयित्वा, सकलभयायासशमनं निःशेषभीति-
विनाशकं, वैराग्यमेवोपादेयतया ग्राह्यतया, यदुपन्यस्तं यदभिहितं, तेन
तदभिधानेन, शान्तरसस्य, निरर्गलमार्गवितरणमनवरुद्धपथोप्लब्धि-
रुचिततरं समुचितरूपेणोपदिष्टं प्रतिपादितं भवति ।
इस पद्य में सभी मानवों से अभिनन्दित भोग, सुख, धन, आदि की भयप्रद
होने के कारण त्याज्यता दिखाकर, सभी भयों के संहारक के रूप में वैराग्य की
जो ग्राह्यता प्रतिपादित की गयी है उससे शान्तरस का मार्ग अधिक प्रशस्त
होता हुआ-सा प्रतीत होता है, वस्तुतः शान्तरस के औचित्य का यहाँ बहुत ही
सुन्दर समावेश किया गया है ।
यथा वा मम मुनिमतमीमांसायाम्—
कुसुमशयनं पाषाणो वा प्रियं भवनं वनं,
प्रतनु, मसृणस्पर्शं वासस्त्वगप्यथ तारवी ।