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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 256 में से

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पृष्ठ 134

७४ औचित्यविचारचर्चा
प्रतिपत्तिज्ञानमिति, जीवन्मुक्तिसमुचितं जीवन्मुक्तावस्थानुरूपम्, अभिहितं
प्रतिपादितम्।
इस पद्य में विकल्परहित समता के ज्ञान से परिपूर्ण आत्मतत्त्व में विचरण-
करने से उत्पन्न शान्ति-सुधा के आस्वादन से मदमत्त महात्माओं का जा अनु-
रक्तिविरक्तिकारणीभूत सुख-दुःख आदि के विषय में तुल्यता-ज्ञान का प्रतिपादन
किया गया है, वह पूर्णतया जीवन्मुक्तावस्था के अनुकूल है। अर्थात् महात्माओं
को लक्ष्य कर जो इस तरह समदृष्टि की सर्जना की गयी है इस औचित्य से
शान्तरस पूर्ण परिपुष्ट होता हुआ सा प्रतीत होता है।
नतु यथा श्रीमदुत्पलराजस्य—
अहौ वा हारे वा बलवति रिपौ वा सुहृदि वा,
मणौ वा लोष्टे वा कुसुमशयने वा दृषदि वा।
तृणे वा स्त्रैणे वा मम समदृशो यान्ति दिवसाः,
क्वचित्पुण्यारण्ये शिवशिवशिवेति प्रलपतः॥
शान्तरसानौचित्योदाहरणमुपस्थापयितुमाह-नतु यथेति। अहाविति।
अहौ सर्पे, वाऽथवा, हारे माल्ये, बलवति बलशालिनि, रिपौ शत्रौ, वा,
सुहृदि मित्रे, मणौ पद्मरागादौ, वाऽथवा, लोष्टे लौहे, कुसुमशयने पुण्य-
शय्यायां, वा दृषदि कर्कशशिलाखण्डे, तृणे निःसारघासादौ, वा, स्त्रैणे
जगदाकर्षणैककेन्द्रे स्त्रीणां समूहे, समदृशस्तुल्यदृष्टेः, “शिवशिवशिव"
इति प्रलपत उन्मत्तवदुच्चारयतो मम दिवसा दिनानि, क्वचित्कस्मिंश्चित्पु-
ण्यारण्ये पवित्रकानने, यान्तु व्यतिगच्छन्तु।
शान्त रस के अनौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—नतु
यथेति। अहाविति। चाहे विषात्मक सर्प हो या शीतल पुष्पमाला बलवान् शत्रु
हो या परमप्रिय मित्र, बहुमूल्य मणि हो या नगण्य लोह, सुखद पुष्पशय्या हो
या रूखड़ा प्रस्तरखंड, तुच्छ तृण हो या विश्व का एकमात्र आकर्षण केन्द्र स्त्रियों
का समूह, सब में मेरी समान दृष्टि हो, साथ ही किसी एकान्त और पवित्र
कानन में रहकर शिव शिव जपते हुए ही मेरे दिन बीते।
अत्र जीवन्मुक्तोचितं प्रियाप्रियरागद्वेषोपशमलक्षणमोक्षक्षमं सर्व-
साम्यमहिहारसुहृदरिसमदृष्टिरूपमभिदधता क्वचित्पुण्यारण्ये यदभिहितं
तद्विकल्पप्रतिपादकमभेदवासना विरुद्धमनुचितमवभासते। धाराधिरूढ-
सर्वसाम्यविगलितभेदाभिमानग्रन्थेर्हि सर्वत्र सर्वं शिवमयं पश्यतस्तपोवने