औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंवाष्पाम्बुभिरश्रुजलैः स्नातस्याभिषिक्तस्य, खाण्डवपावकादपि खाण्डव-
वनदाहकवह्नेरपि, परमत्यन्तं चण्डं भीमं, शोकानलं पुत्रवियोगशोकवह्निं,
बिभ्रतो धारयतः, नूतनयौवनोदयदिने नवयौवनोद्गमसमकाल एव, छिन्ना-
भिमन्योर्मारिताभिमन्युनामकपुत्रस्य, जिष्णोर्विजयिनोऽर्जुनस्य, "हा
वत्स !" इति विलापः, सैन्धवस्य सिन्धुराजस्य जयद्रथस्य, वध एवाऽऽ-
रब्धः प्रारब्धोऽभिचारो मारणात्मकानुष्ठानविशेषस्तत्र, जपो बभूव ।
वीर और करुण के संकर का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है—
यथा मम मुनिमतेति । गाण्डीवेति । अग्निसेवन, स्रुवसम्मार्जन, तथा जप आदि
किसी भी अनुष्ठान के आवश्यक अंग हुआ करते हैं, आज अर्जुन ने भी जयद्रथ-
वध रूप अभिचार ( एक मारणात्मक अनुष्ठानविशेष ) का आरम्भ कर दिया
है, अतः वे ( अर्जुन ) अपने गांडीवरूप स्रुव का सम्मार्जन कर रहे हैं, अश्रु-
जल से अभिषिक्त होकर खाण्डववन को जलाने वाली अग्नि से भी भयानक पुत्र-
शोकजन्य-वह्नि को धारण करते हुए, हा पुत्र ! हा पुत्र ! इस तरह के विलाप-
वचनरूप मंत्र का जाप कर रहे हैं । तात्पर्य यह है कि जिस जयद्रथ ने चढ़ती
जवानी में ही अभिमन्यु जैसे प्रिय पुत्र की हत्या कर दी है, उस ( जयद्रथ ) का
वध करने की दीक्षा अर्जुन ले चुके हैं ।
अत्र त्रिगर्तसंग्रामगतस्य गाण्डीवधन्वनः शत्रुभिर्नवयौवनोदयसमय-
निहततनयस्य कार्मुकस्रुवमुन्मार्जयतः प्रसरदश्रुस्नातस्य शोकाग्निमुद्वह-
तश्चिरं हा पुत्रेति जयद्रथवधारब्धाभिचारे जपो बभूवेति यदुपन्यस्तं,
तेनारिक्षये दीक्षासमुचितव्रतवर्णनया शोकाग्नेश्चण्डत्वेन खाण्डवपदोदी-
रणेन वीररसस्याङ्गिनः सहसैवागन्तुके करुणरसे प्रज्वलिते सैन्धववधा-
रब्धाभिचाराभिधानेन पर्यन्ते शौर्यनिर्वाहेण परममौचित्यमुज्जृम्भते ।
अत्रोक्तपद्ये, त्रिगर्त्तसंग्रामगतस्य त्रिगर्त्तयुद्धनिरतस्य, गाण्डीवधन्वनो
गण्डीवनामकधनुर्धारिणः, शत्रुभिर्नवयौवनोदयसमयनिहततनयस्य शत्रु-
द्वारा नवयौवनारम्भसमकालमेव हतपुत्रस्य, कार्मुकस्रुवं धनुःस्वरूपस्रुव-
मुन्मार्जयतः, प्रसरदश्रुस्नातस्य निपतद्वाष्पवारिसिक्तस्य, शोकाग्निं दुःखा-
नलमुद्वहतो धारयतोऽर्जुनस्येति यावत्, चिरं बहुकालपर्यन्तं, “हा पुत्र !”
इति जयद्रथवधारब्धाभिचारे सिन्धुराजविघातात्मकप्रारब्धमारण-
कर्मणि, जपो बभूवेति यदुपन्यस्तं, तेनोपन्यासेनारिक्षये, दीक्षासमुचित-
व्रतवर्णनया शत्रुविनाशविषयिणी या दीक्षा तदुचितं यद्व्रतं तद्वर्णनेन,