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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 131

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ७१
गस्त्यस्य च, लघुकलशजन्मना स्वल्पकायघटयोनित्वेन ( एभिस्त्रिभिर्नि-
मित्तैरित्यर्थः ), क्रमाक्रान्तसमारूढोऽपि क्रमिकाक्रमणपरिपाट्याऽङ्कुरितो-
ऽप्यसमविस्मयमयोऽद्वितीयाश्चर्यस्वरूपोऽद्भुतप्रसरोऽद्भुतोदयः, संसारस्य
विश्वस्याश्चर्यसरणिर्विस्मयपद्धतिरेवंविधैवैदृइयेवापरिच्छिन्नाऽपरिमेया ।
( अत्र ) न किंचित्कौतुकं न मनागप्युत्कण्ठा हेतुरित्याकारकस्यार्थान्तरन्या-
सस्य समर्थकर्थस्य, सामर्थ्येन महिम्ना, सहसैव हठादेवावरोपित उत्पाटित
इव तिरोभूततामन्तर्हितत्वमुपगतः संप्राप्तः ।
इस पद्य में पहले तो समुद्र की विचित्रता दिखायी गयी है, फिर मुनि के
द्वारा उसका चुलकीकृत किये जाने का उल्लेख किया गया है तथा मुनि की
विचित्रता दिखाने के लिए उनके घटवंशजन्मता की भी चर्चा की गयी है । इस
तरह क्रमशः एक के बाद एक की महत्ता में व्याघात पहुँचा कर जो आश्चर्य-
मूलक अद्भुतरस का अङ्कुर उत्पादित किया गया है वह—संसार की आश्चर्य-
परम्परा इसी तरह अपरिमित होती ही है, इसमें कौतुक की कोई बात नहीं—
इत्याकारक अर्थान्तरन्यास ( पूर्ववर्णित अर्थ के समर्थनार्थ वर्णित अर्थ ) से हठात्
तिरोहित हो जाता है अर्थात् संसार को इस विचित्रता से कौन माप सकता है ?
इस अर्थ के व्यक्त हो जाने से उसकी महत्ता नष्ट हो जाती है । इस प्रकार
अनौचित्य के कारण अद्भुतरस का समुचित परिपाक यहाँ नहीं हो सका है ।
शान्ते यथा मम चतुर्वर्गसंग्रहे—
भोगे रोगभयं सुखे क्षयभयं वित्तेऽग्निभूभृद्भयं.
दास्ये स्वामिभयं गुणे खलभयं वंशे कुयोषिद्भयम् ।
माने म्लानिभयं जये रिपुभय काये कृतान्ताद्भयं,
सर्वं नाम भवे भवेद्भयमहो वैराग्यमेवाभयम् ॥
शान्तरसौचित्यमुदाहर्तुमाह—शान्ते यथा ममेति । भोगे इति । भोगे,
रोगस्यामयस्य, भयं भीतिरसंयतभोगस्य रागकारणत्वेन सुतरां रोगसंभव
इति भावः । सुखे मोदानुभव, क्षयभयं विनाशभीतिः, सांसारिकसुखस्य
क्षणभङ्गुरत्वेनाहर्निशं तद्विनाशभीतिरस्त्येवेति भावः । वित्ते सम्पत्तावग्नि-
भूभृद्भयमग्नेः भूभृतो राज्ञश्च भयम्, अग्निदाहेन राज्ञः कोपेन च संपत्ति-
विनाशंशंकेति भावः । दास्ये भृत्यतायां स्वामिनः पत्युर्भयमातङ्कः, गुणे
दयादाक्षिण्यादौ खलस्य दुष्टस्य भयं, खलाः परनिन्दने स्वभावपटवो
भवन्तीति गुणवतोऽपि निन्दन्त्येवेति भावः । वंशे कुले, कुयोषितः कुल-