औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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भयानकरसानुरूपसंवेगाभावात् न किंचिदौचित्यमुपचितं विवृद्ध-
मुपलभ्यते प्राप्यते ।
इस पद्य के द्वारा गज का जो वर्णन किया गया है उससे उसकी किसी ऐसी
चेष्टा का उल्लेख तो हुआ नहीं जो कि भयप्रयुक्त और विकारयुक्त समझा जाय ।
इसलिए भय के केवल नामतः कथन रहने पर भी उपयुक्त अनुभावादि से अपुष्ट
होने के कारण वह रसरूपता को प्राप्त ही नहीं कर सकता । अतः यह भयानक
रसानौचित्य का उदाहरण कहलाने के योग्य है ।
बीभत्से यथा मम मुनिमतमीमांसायाम्—
सर्वापायचयाश्रयस्य नियतं कुत्सानिकायस्य किं,
कायस्यास्य विभूषणैः सुवसनैरानन्दनैश्चन्दनैः ।
अन्तर्यस्य शकृद्यकृत्कृमिकुलक्लोमान्त्रमालाकुले,
क्लेदिन्यन्तदिने प्रयान्ति विमुखाः कौलेयकाका अपि ।
बीभत्सरसौचित्यमुदाहर्तुमाह—बीभत्से यथा ममेति । सर्वैति । सर्वा-
पायचयाश्रयस्य सर्वविधविनाशस्तोमाधारस्य, नियतं निश्चितं, कुत्सा-
निकायस्य निन्दैकसंस्थानस्यास्य घृणास्पदस्य, कायस्य शरीरस्य, विभूषणै-
रलङ्कारैः, सुवसनैर्विशिष्टाच्छादनैः, आनन्दनैर्मोदप्रदैश्चन्दनैः श्रीखण्डलेप-
नैश्च किं ? व्यर्थमिति भावः । शकृतो मलस्य, यकृतः पाचनयन्त्रस्य, कृमि-
कुलस्य श्वेतरक्तकीटाणुप्रभृतेः, क्लोम्न उदकवाहिस्रोतोमूलस्यान्त्रयोः क्षुद्रा-
न्त्रबृहदन्त्रयोर्माल्या समूहेनाकुले व्यापृतेऽत एव क्लेदिनि पङ्किले, यस्य
कायस्यान्तरभ्यन्तरे विषये, विमुखा उदासीनाः, अन्तदिने मृत्युकाले,
कौलेयकाकाः कुक्कुरकाकप्रभृतयो निर्घृण्यभोजिनोऽपि विमुखाः, प्रयान्ति
परावर्तन्ते ।
बीभत्सरस के औचित्य को प्रदर्शित करने के लिए कहा गया है—बीभत्से
यथा ममेति । सर्वैति । यह शरीर क्या है ? पुंजीभूत समस्त दोषों का एकमात्र
आश्रय और निन्दा का निश्चित स्थान ही तो है, फिर निरर्थक इसको सजाने के
लिए अलंकार, सुन्दर वस्त्र और सुगंधित चन्दनों के व्यवहार का क्या प्रयोजन ?
मृत्यु के पश्चात् मल, मूत्र, यकृत्, क्लोम, कीट और अंतड़ियों के समूह से क्लिन्न
हुए मानव शरीर को निर्घृण्यभोजी कुत्ते और कौवे भी तो नहीं पूछते ।
अत्र वैराग्यवासनाच्छुरितबीभत्सरसस्य जुगुप्सास्थायिभावोचित-