औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 141, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ८१
वासितचेतसः, हृद्गतोग्रवैराग्यभावनासंवलितचित्तस्य, कुत्सार्हजुगुप्सया
निन्दनीयघृणया, औचित्यरुचिरतामौचित्यचारुतामावहति धारयति ।
यद्यप्यत्र महावाक्ये पूर्णकाव्ये, शान्तस्यैव ( रसस्य ) प्राधान्यं मुख्यत्वं
प्रधानतया वर्णनमिति यावत्, अस्तीति शेषः, तथापि उदाहरणश्लोक-
वाक्ये प्रस्तुतश्लोके बीभत्सस्यैव प्राधान्यमस्तीति भावः ।
इस श्लोक में श्लेषगर्भ उपमालंकार के द्वारा दोनों अर्थ समान स्तर पर
आधारित हैं और परस्पर विरुद्ध भी हैं, फिर भी उन दोनों ( बीभत्स तथा
शृंगार ) के अङ्गाङ्गिभाव की योजना करने पर यद्यपि ( शृगाली मत्त के समान
निश्चल पड़े हुए मृत युवक का हृदय निकाल कर, पक्षान्तर में स्वयं आकृष्ट
होकर कण्ठ पकड़ कर खून चूसने की कामना से, अथवा अनुरक्त होने के कारण
कामवासना प्रगट करने की भावना से, नख-प्रहार करती हुई, दन्तक्षत से चिह्नित
अधर का बार-बार आस्वादन करके अंगच्छेद क्रिया में अथवा कामोपभोग क्रिया
में लगी हुई, शरीर के ऊपरी भाग के कर्षण को, अथवा रति-कला के उत्कर्ष
को प्रकाशित कर रही है )। ये दोनों अर्थ समान रूप से व्यक्त होते हैं । लेकिन
कामिनी पद का परित्याग कर जम्बुकी को कर्ता बनाने के कारण यहाँ पर
बीभत्सरस की ही प्रधानता हो जाती है, शृंगार उसका अंग हो जाता है । ऐसी
स्थिति में हार्दिक गहन वैराग्यभावना से युक्त चित्तवाले वक्ता बोधिसत्त्व
( भगवान् बुद्ध ) की निन्दनीय घृणास्पदताजन्य अभिव्यक्ति के द्वारा "कामिनी-
कल्लोल एक व्यर्थ की चीज है" ऐसा अभिप्राय अत्यन्त समीचीनता को धारण
कर लेता है । यद्यपि इस काव्य ( बौद्धावदान-कल्पलता ) में शान्तरस की ही
प्रधानता प्रतिपादित की गयी है, परन्तु प्रस्तुत श्लोक में बीभत्स-रस की ही प्रधा-
नता है । अतएव उपर्युक्त विवेचना संगत हुई ।
वीरकरुणयोर्यथा मम मुनिमतमींसायाम्—
गाण्डीवस्स्रुवमार्जनप्रणयिनः स्नातस्य बाष्पाम्बुभि-
श्चण्डं खाण्डवपावकादपि परं शोकानलं बिभ्रतः ।
जिष्णोर्नूतनयौवनोदयदिनच्छिन्नाभिमन्योश्चिरं,
हा वत्सेति बभूव सैन्धववधारब्धाभिचारे जपः ॥
वीरकरुणयोः सङ्करस्योदाहरणमुपस्थापयितुमाह—यथा ममेति ।
गाण्डेवेति । गाण्डीवो नाम धनुर्विशेषः स एव स्रुवस्तस्य तत्कर्मकस्येति
भावः, मार्जनस्य परिशुद्धेः प्रणयिनः प्रियस्य गाण्डीवधन्वन इति भावः,
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