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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ६७
कायगतकुत्सिततरान्त्रतन्त्रादिसमुदीरणेन परा परिपुष्टिर्निःसारशरीराभि-
मानवैरस्यजननी प्रतिपादिता ।
अत्र पूर्वोक्तपद्ये, वैराग्यवासनाच्छुरितबीभत्सरसस्य वैराग्यसंस्कार-
सहकृतबीभत्साख्यरसस्य, जुगुप्साख्यस्थायिभावोचितकायगतकुत्सितत-
रान्त्रतन्त्रादिसमुदीरणेन जुगुप्सानामकस्थायिभावानुरूपशरीरगताति-
निन्दितमलमूत्रान्त्रादिवर्णने, निःसारशरीराभिमानवैरस्य जननी निस्त-
त्वकायिकगर्वखर्वकारिणी, परोत्कृष्टा, परिपुष्टिः परिपोषः, उत्पादितो
जनितः ।
उक्त पद्य में जुगुप्सारूप स्थायीभाव के अनुरूप शरीरगत घृणित आंत आदि
के वर्णन से, वैराग्य-भावना से सहकृत बीभत्सरस के शारीरिक गर्व को चूर्ण
करने वाला बहुत ही अच्छा परिपोष दृष्टिगोचर हो रहा है, जिससे बीभत्सर-
सौचित्य का एक जीता-जागता चित्र उपस्थित हो जाता है ।
नतु यथा चन्दकस्य—
कृशः काणः खञ्जः श्रवणरहितः पुच्छविकलः,
क्षुधाक्षामो रूक्षः पिठरककपालादितगलः ।
व्रणैः पूतिक्लिन्नैः कृमिपरिवृतैरावृततनुः,
शुनीमन्वेति श्वा तमपि मदयत्येष मदनः ॥
बीभत्सरसानौचित्यं प्रदर्शयितुमाह—नतु यथा चन्दकस्येति । कृश
इति । कृशो दुर्बलः, खञ्जः सञ्चारशक्तिविकलः, श्रवणरहितः श्रुतिहीनः,
पुच्छविकलः खण्डितलाङ्गूलः, क्षुधाक्षामो बुभुक्षामलिनः, रूक्षः शुष्कः,
स्निग्धतारहित इत्यर्थः, पिठरककपालादितगलः पीडितकपालगलादिः,
पूतिंक्लिन्नैर्दुर्गन्धियुक्तैः, कृमिपरिवृतैरुत्पन्नकृमिभिः, व्रणैरावृततनुः संयुक्त-
शरीरोऽपि, श्वा कुक्कुरः शुनीं कुक्कुरीमन्वेति संभोगार्थमनुधावत्येष जग-
दुन्मादको मदनः कामस्तमप्येतादृशं संयोगयोग्यतारहितमपि श्वानं
मदयति वासनाधीनं करोति ।
बीभत्सरस के अनौचित्य को प्रदर्शित करने के लिये कहा गया है—नतु
यथेति । कृश इति । संसार को मदमत्त करने वाले इस कामदेव की महिमा
विचित्र है, योग्य की तो बात ही अलग है । अयोग्य से अयोग्य जन्तुओं में भी
कामवासना का संचार कर देता है । ऐसे भी कुत्ते कामान्ध होकर कुतियों के पीछे
लगे रहते हैं जो कि बहुत ही दुर्बल, काने, लंगड़े, बहरे, और पुछकट्‌टे हैं । इतना