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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 256 में से

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पृष्ठ 124

६४ औचित्यविचारचर्चा
भागा हुआ वानर महाराज के अंतःपुर में प्रवेश कर रहा है, वह अपने कंठ की
टूटी हुई भूलुंठित स्वर्णमय डोरी को खींचता हुआ द्वार पर द्वार टपता जा रहा
है, पैर की क्षुद्रघंटिकायें (घुंघरू) रनरना रही हैं, और पशुशाला के रक्षक उसे
पकड़ने के लिये वेग से उसके पीछे-पीछे दौड़े जा रहे हैं, फिर भी वह पकड़ में
नहीं आ पाता, भीतर घुसता ही जा रहा है, जिससे अन्त:पुर की स्त्रियां
आतंकित हो रही हैं।
और भी—
उस बंदर के भय से राजा के अंतःपुर में एक भगदड़ सी मच गयी है,
नपुंसक सब भागे जा रहे हैं, क्योंकि उनकी गणना पुरुषों में तो होती नहीं, फिर
उन्हें पीठ दिखाने में कैसी लज्जा ? बोने वृद्ध कंचुकियों के कंचुक में छिप रहे हैं,
किरात नगर के किनारे की ओर भागते हुए अपने नाम की (किर = नगर का
भाग विशेष, अतति = जाता है इस व्युत्पत्ति से) सार्थकता सिद्ध करने लग गये
हैं, कुबड़े एक तो वैसे ही नवे हुए हैं, अभी डर के कारण और भी नव कर
धीरे-धीरे निकले जा रहे हैं, क्योंकि उनके मन में शंका बनी हुयी है कि कहीं
देख न लिए जांय ।
अत्राङ्गनानां निशितदशननखशिखोल्लेखातङ्कदानेन प्रचुरतरवानरा-
भिसरणभयसंभ्रान्तान्तःपुरिकवृद्धवामनकिरातकुब्जादीनां पुरुषगणना-
विहीनतया धैर्यविरहकातराणामुचितचेष्टानुभाववर्णनया भयानकरस-
संवादिरुचिरौचित्यमाचकास्ति ।
अत्र श्लोकद्वयेऽङ्गनानामन्तःपुरस्त्रीणां, निशितदशननखशिखोल्ले-
खातङ्कदानेन तीक्ष्णदन्तनखाग्रोल्लेखजन्यभयप्रदानेन, पुरुषेषु गणनायाः
संख्यानस्याभावेन, धैर्यविरहकातराणां धृतिविरहिततया कातरात्मनां,
प्रचुरतरवानराभिसरणभयसंभ्रान्तःपुरिकवृद्धवामनकिरातकुब्जादीनां वान-
रागमनबहुतरभयभीतान्तःपुरस्थकञ्चुकिवामनकिरातकुब्जप्रभृतीनाम्, उ-
चितचेष्टानुभाववर्णनया समुचिताचरणरूपानुभाव (कार्य) वर्णनेन,
भयानकरससंवादिरुचिरौचित्यं भयानकरसपोषकसुन्दरौचित्यम्, आच-
कास्ति सुशोभते ।
इन पद्यों में स्त्रियों को डराने के लिये वानर के तेज नख और दांत के
आघात के आतंक का जो उल्लेख किया गया है उससे अपने को पुरुषों की श्रेणी
में नहीं गिनने वाले वृद्ध, वामन, कुबड़े और किरातों के चेष्टास्वरूप (भागना,