औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 135, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ७५
नगरावस्करकूटे च विमलात्मलाभतृप्ततया समानदृशः क्वचित्पुण्या-
रण्यादिवचनमनुचितोच्चारणमेव ॥ १६ ॥
अत्र पद्ये, जीवन्मुक्तोचितं जीवनकालेऽपि ब्रह्मज्ञानसम्पदा यो
भवबन्धरहितः स जीवन्मुक्तस्तदनुरूपं, प्रियाप्रिययोः रागद्वेषयोश्च य
उपशमो निवृत्तिस्तत्क्षणो यो मोक्षस्तत्क्षमम्, अहिहारसुहृदरिसमदृष्टि-
रूपं सर्पमाल्यमित्रामित्रादिषु तुल्यदृष्टिस्वरूपं, सर्वसाम्यं सरलाभेदाव-
भासम्, अभिदधता प्रतिपादयता क्वचित्पुण्यारण्ये इति यदभिहितं
यत्प्रतिपादितं, विकल्पप्रतिपादकं द्वैताबोधकमत एवाभेदवासनाविरुद्धमे-
कत्वसंस्कारप्रतिकूलं, तत्कथनमनुचितमवभासते प्रतीयते । तत्र हेतुमाह-
धारेति । धाराधिरूढसर्वसाम्यविगलितभेदाभिमानग्रन्थेः प्रवाहाश्रितसम-
भावविनष्टभेदाहङ्कारस्य, हीति निश्चयेन, सर्वत्र सर्वं निखिलं, शिवमयं
कल्याणमयं, पश्यतोऽवलोकयतः, तपोवने पावनकानने, नगरावस्करकूटे
पुरविष्ठासमुदाये, च, विमलात्मलाभतृप्ततया निर्मलात्मतत्त्वज्ञानसन्तुष्ट-
तया, समानदृशः समदृष्टेः, क्वचित्पुण्यारण्यादिवचनं "क्वचित्पुण्यारण्ये"-
इत्याकारकोक्तिरनुचितोच्चारणमेव विरुद्धकथनमेव ॥ १६ ॥
इस पद्य में जीवन्मुक्त महापुरुष के अनुरूप, प्रिय-अप्रिय, और राग-द्वेष के
प्रशमरूप मोक्ष के योग्य, सर्प और माल्य, मित्र और शत्रु में समदृष्टतारूप
सर्वसाम्य का प्रतिपादन करके "क्वचित्पुण्यारण्ये" इस अंश का जो उपाख्यान
किया गया है वह द्वैतभावप्रतिपादक है, अतएव अभेदभावना के विरोधी होने के
कारण अनुचित प्रतीत होता है क्योंकि अविच्छिन्न समभाव के प्रभाव से
जिनके मिथ्या ज्ञान की गुत्थी सुलझ चुकी है । अतएव जो समूचे जगत् को कल्याण-
मय देख रहे हैं ऐसे महात्माओं के लिये "तपोवन या नागरिक अपावन भूभाग"
दोनों के मूल्य बराबर होने चाहिये । फिर "क्वचित्पुण्यारण्ये" इस वचन के
द्वारा उनमें जो पावन-अपावन का भेदभाव उत्पन्न किया गया है वह है अयुक्त
ही नहीं अपि तु नितान्त अनुचित भी है । वस्तुतः इस कथन से शान्तरस का
पोषण न होकर शोषण हो जाता है । इसलिये यह पूर्णतया शान्तरसानौचित्य का
द्योतक है ॥ १६ ॥
यथा मधुरतिक्ताद्या रसाः कुशलयोजिताः ।
विचित्रास्वादतां यान्ति शृङ्गाराद्यास्तथा मिथः ॥ १७ ॥