सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 137

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ७७
अनौचित्यरजसाऽनौचित्यकणमात्रेणापि, स्पृष्टः संपृक्तो रससंयोगो रस-
सङ्करो, न कस्यचित्कस्याप्यभिगतोऽभीष्ट इत्यर्थः ।
पूर्वोक्त कारिका की ही व्याख्या की जा रही है - रसा इति। मीठा, खट्टा,
कड़वा आदि रस ( जिनके प्रत्यक्षीकरण का माध्यम जिह्वा है ) भी कुशल-पाचक
के द्वारा वेसवार ( शुंठीमिश्रित पानकविशेष ) के पान में मिश्रित होकर अपूर्व
स्वाद प्रदान करता है वैसे ही परस्पर अविरुद्ध शृङ्गारादिरस ( जिनके प्रत्यक्षी-
करण का माध्यम हृदय है ) के अङ्गाङ्गिभाव की योजना में प्राणस्वरूप औचित्य
की रक्षा करनी ही चाहिये, क्योंकि अनौचित्य की छाया भी पड़ जाने पर रस-
सङ्कर अपनी महिमा खो बैठता है ।
रससङ्करौचित्ये शान्तशृङ्गारयोरङ्गाङ्गिभावो यथा भगवतो
महर्षेर्व्यासस्य-
सत्यं मनोरमा रामाः सत्यं रम्या विभूतयः ।
किन्तु मत्ताङ्गनापाङ्ग-भङ्गिलो लं हि जीवितम् ॥
रससङ्करौचित्ये प्रस्तुते प्रथमं शान्तशृङ्गारयोः सङ्करस्योदाहरणं
प्रदर्शयितुमाह-यथा भगवतो महर्षेर्व्यासस्येति । सत्यमिति । रामा नार्यः,
सत्यं वस्तुतो, मनोरमा मनोमोदहेतवः, विभूतयः सांसारिकैश्वर्याणि, रम्या
मनोरमा इत्यपि सत्यमेव, किन्तु, जीवितं जीवनं, हि निश्चयेन, मत्ताया
मदव्याघूर्णितलोचनायाः, अङ्गनाया रमण्याः, अपाङ्गस्य नेत्रकोणभागस्य,
भङ्गिवत्कटाक्षवदिति यावल्लोलं चञ्चलमचिरव्यापीति भावो वर्तते
इति शेषः ।
शान्त शृङ्गार के अङ्गाङ्गिभाव से सम्पन्न रससंकर का उदाहरण दिखाने
के लिए कहा गया है यथा भगवतो व्यासस्येति । सत्यमिति । यह सत्य है कि
सुन्दरियाँ पुरुषों के चित्त को आनन्द प्रदान करती हैं और यह भी सत्य है कि
सांसारिक ऐश्वर्य उपभोग करने के योग्य है, परन्तु मनुष्य का जीवन ही मदमत्त-
कामिनी की अपाङ्गवीक्षणशैली के समान अत्यन्त अञ्चल ( अचिरस्थायी ) है ।
इससे यह व्यक्त होता है कि सांसारिक सुख का चिन्तन छोड़कर आध्यात्मिक
चिंतन ही उचित है ।
अत्र भगवता जन्तुहिताभिनिविष्टेन मोक्षक्षमोपदेशोऽङ्गिनः शान्त-
रसस्य रागिजनानिष्टत्वात्सकलजनमनः प्रह्लादने बालगुडजिह्विकया