आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
४५६ आत्मतत्त्वविवेके
अथवा सर्गान्तरगृहीतव्याप्तिप्रादुर्भावे सुप्तप्रतिबुद्धवत् पितृत्वे-
नाविप्रलम्भकत्वमुच्चावचभूतनिर्माणदर्शनेन सार्वज्ञयमनुमायाऽऽ-
प्तत्वनिश्चयस्तस्य तेषाम् ।
यद्वा भगवान्नेव सम्प्रदायप्रवर्तनव्यसनव्यग्रः कायसहस्राणि
व्युत्पाद्यव्युत्पादकभावव्यवस्थितानि निर्माय तदातन महाजनं
परिग्राहितवान् नटोपाध्याय इव स्वयं नटित्वेति सर्वं सुस्थम् ।
पक्षत्रयेऽप्यत्र पुराणादिसंवादोऽप्यस्तीति ।
स्यादेतत्, परमेश्वरप्रवर्तितोऽयमेव वेदसंप्रदायः सर्गान्तर-
अथवा सोकर उठे हुए व्यक्तिके समान मन्वादि भी पूर्वसृष्टिमें गृहीत
व्याप्तिका स्मरण कर पितृत्वहेतुसे ईश्वरमे अविप्रलम्भकत्व (अवञ्चकत्व)
का अनुमान करते हैं। तथा अनेक प्रकारके प्राणियोंकी रचना देखकर
उसमें सर्वज्ञत्वका भी अनुमान करते हैं। क्योंकि जो जिसका पिता
होता है, वह उसके प्रति वञ्चक नहीं होता है। अतः ईश्वर भी सबका
पिता होनेके कारण वञ्चक नहीं है। एव सर्वज्ञ ही विविध रचनामे
समर्थ हो सकता है, इसलिये ईश्वर सर्वज्ञ भी है। इस प्रकार अवि
प्रलम्भकत्व और सर्वज्ञत्वका अनुमान होनेके बाद मन्वादिकों को ईश्वर
में आप्तत्वका निश्चय होता है और वे ईश्वर प्रणीत वेदोंका परिग्रह
करते हैं ।
अथवा स्वयं ईश्वर ही धर्मसम्प्रदायके सञ्चालनरूप व्यसनमे व्यस्त
होकर हजारों शरीरको व्युत्पाद्य और व्युत्पादक (शिष्य शिक्षक) के
रूपमे बनाकर (धारणकर) सर्गादिकालीन मन्वादि महाजनोंको वेदोंका
परिग्रह कराया । जैसे, कोई नाट्यविद्या का आचार्य स्वयं नाट्य कर
अन्योंको नाट्यकी शिक्षा देता है । इस प्रकार पूर्वोक्त सम्पूर्ण विषय
सुस्थिर है । इन तीनों ही पक्षोंमे पुराणादिकोंका संवाद भी है । अर्थात्
पुराणोंद्वारा भी इन तीनों पक्षोंकी पुष्टि होती है ।
यदि कहो कि-उक्त रीतियोंसे महाजनद्वारा वेदोंका परिग्रह भले ही
हो, फिर भी परमेश्वरद्वारा, सञ्चालित वर्तमान वेद सम्प्रदाय पूर्वसृष्टिगत
[Header] अनुपलब्धवादः ४४७
वेदापेक्ष एवेति सेश्वरमीमांसापक्षः कपिलपक्षो वा स्यादिति चेत्,
किमर्थं पुनरियम्पेक्षा पूर्ववेदे जगन्नाथस्य ? न तावद् वेदार्थोप-
लम्भाय, नित्यसर्वज्ञत्वात् ।
नापि रचनार्थम्, स्वभावतः सर्वकर्तृतया आदर्शानपेक्ष-
त्वात् । नापि विरोधपरिहारार्थम्, प्रतिपाद्यानां तदनुसन्धान-
वेदके अनुसार ही सञ्चालित हो तो यह एक नया ही सेश्वर मीमांसापक्ष
हो गया, जो ईश्वरको वेदका कर्ता माननेसे सेश्वर हुआ और पूर्व पूर्व
वेदोंकी अपेक्षा करनेसे मीमांसा भी हुआ । अथवा कपिलपक्ष हो गया,
जिसके अनुसार धर्म, विज्ञान, और ऐश्वर्यसे सम्पन्न कपिलमुनिने ही
सुप्त-प्रबुद्धके समान पूर्वसृष्टिगत वेदोंका स्मरणकर वर्तमान सृष्टिके प्रारम्भ
में वेदोंको प्रकाशित किया—तो बताओ कि परमेश्वरको वर्तमान वेद-
सम्प्रदायको सञ्चालित करनेके लिये पूर्ववेदकी क्यों अपेक्षा होगी ? यदि
कहो कि—वैदिक विषयोंके ज्ञानके लिये पूर्ववेदकी अपेक्षा है । अर्थात्
जिन विषयोंका प्रतिपादन वर्तमान वेदद्वारा परमेश्वरको करना है, उन
विषयोंको वह पूर्ववेदसे ही जानता है—तो यह नहीं कह सकते ।
क्योंकि नित्य-सर्वज्ञ होनेके कारण वह स्वयं सम्पूर्ण वेदार्थका ज्ञान
रखता है ।
यदि कहो कि—वर्तमान वेदकी रचनाके लिये आदर्श ( नमूना ) के
रूपमें पूर्ववेदकी अपेक्षा है—तो यह भी नहीं हो सकता । क्योंकि
स्वाभाविकरूपसे ही वह सम्पूर्ण वस्तुओंका कर्ता होनेके कारण किसी
आदर्शकी अपेक्षा नहीं करता है। यदि कहो कि—पूर्ववेदसे वर्तमान
वेदमें विरोध-परिहारके लिये पूर्ववेदकी अपेक्षा है । कारण, पूर्ववेदसे
आजके वेदमें विरोध होनेपर मन्वादिद्वारा परिग्रह होनेमें शिथिलता
आ जायगी—तो यह भी ठीक नहीं है । क्योंकि मनु आदिको पूर्ववेदका
अनुसन्धान ही नहीं होता है, जिसके विरोध-परिहारार्थ परमेश्वरको पूर्व-
वेदकी अपेक्षा हो । यदि सर्वज्ञ होनेके कारण मन्वादिको पूर्ववेदका
अनुसन्धान संभव है, इसलिये उसके साथ विरोध-निवारणार्थ पूर्ववेदके
अनुसार ही परमेश्वरको वर्तमान वेद बनाना पड़ता है—ऐसा मानो, तो
भी सर्वज्ञ होनेसे मनु आदि परमेश्वरकी सर्वज्ञताको भी जानते ही
४४८ आत्मतत्त्वविवेके
विधुरत्वात् । अवैधुर्य्ये वा कर्तुः सार्वश्यविज्ञानादेव समस्तविरोध-
विधूननात् ।
तथापि पूर्वसर्गान्तरवेदव्यवहारोऽपि परमेश्वरस्य गोचर
इति चेत् , कः सन्देहः ? यदि चैतदेव वेदस्य प्रवाहनित्यत्वम् ,
न केवलमेतस्य, किंतु घटादेरपीति न्याय एव दर्शनम् । अन्यथा
मीमांसेति क्व सेश्वरमीमांसेति । तस्मादुक्तरूपः परिग्रहो
नान्यथा संभवतीति प्रतिबन्धसिद्धिः । तथा चाप्तोक्तत्वात्
प्रामाण्यसिद्धिः ।
हैं, उससे ही मनु आदिको समस्त विरोधोंका विधूनन हो जाता है ।
अर्थात् परमेश्वरकी सर्वज्ञताके ज्ञानसे ही मनु आदिको परमेश्वरकृत वेद
में विरोध-बुद्धिका उदय नहीं होता है ।
फिर भी यदि कहो कि—वर्तमान वेदके रचयिता परमेश्वरको पूर्व-
सृष्टिगत वेद-व्यवहारका भी ज्ञान रहता ही है, क्योंकि वह सर्वज्ञ है ।
अत एव यहाँ सेश्वर मीमांसापक्ष ही आता है—तो इसमे क्या सन्देह
है ? क्योंकि यदि इसे ही (वेदनिर्माता ईश्वरको पूर्ववेदका ज्ञान रहनेको
हो) वेदकी प्रवाह नित्यता कहो तो इस प्रकारका प्रवाह-नित्यत्व न
केवल वेदका ही है किन्तु घटादि वस्तुओंका भी है । अतः यह न्याय-
दर्शन ही हुआ । किन्तु यदि इससे भिन्न प्रवाह-नित्यत्व कहो, अर्थात्
जो वेद पूर्वसृष्टिमें था वही इस समयमें भी है, यही प्रवाह-नित्यत्व
है—तो यह शुद्ध मीमांसापक्ष होगा, जिसका खण्डन किया जा
चुका है । इसलिये सेश्वमीमांसानामक अतिरिक्त पक्षका प्रसङ्ग कहाँ
आता है ?
इसलिये मन्वादिकोंद्वारा वेदोंका पूर्वोक्त परिग्रह वेदोंमें आप्तोक्तत्व-
निश्चयके बिना नहीं हो सकता । अतः महाजनपरिग्रह और आप्तोक्तत्व
मे परस्पर व्याप्तिसम्बन्धकी सिद्धि हो जाती है । अर्थात् जो जो महाजन-
परिगृहीत होता है, वह आप्तोक्त होता है । वेद भी मन्वादि महाजनद्वारा
परिगृहीत है, इसलिये वह आप्तोक्त (ईश्वरोक्त) है । तथा आप्तोक्त
होनेके कारण ही वेदोंका प्रामाण्य भी सिद्ध होता है ।
अनुपलम्भवादः ४४९
कथं पुनः सुगताद्यागमेषु नादरश्छान्दसानाम् ? वेदविद्वेषि-
दर्शनान्तःपातिपुरुषप्रणीतत्वादिति मा शङ्किष्ठाः, जिनेन्द्रजग-
दिन्द्रप्रभृतिप्रणीतेष्वप्यादरात् । तत्कस्य हेतोः ? महाजन-
परिगृहीतपूर्वागमाविरुद्धतया तदनुसारित्वात् । कुतस्तर्हि ?
सिद्धप्रामाण्यवेदविरोधात् । कथं तर्हि कतिपयैरपि तत्परिग्रहः ?
अलसभीरुमृदुःषमयजात्यनुरूपधर्मविशेषात्, उदुम्बरगर्तौयतन्तुवाय-
प्रश्न—तो फिर बुद्धादिके आगमोंके प्रति वैदिकोंके अन्दर आदरकी
भावना क्यों नहीं है ?
उत्तर—यहाँ ऐसी आशङ्का मत करो कि—वेदोंके प्रति द्वेषभाव
रखनेवाले नास्तिक-दर्शनोंकी सीमामें आये हुए पुरुषों
(बुद्धादि) के द्वारा निर्मित होनेके कारण सुगतादि प्रणीत
आगमोंके प्रति वैदिकोंमे आदरभाव नहीं है—क्योंकि
जिनेन्द्र-जगदिन्द्र प्रभृति नास्तिकोंद्वारा प्रणीत आगमोंमें भी
वैदिकोंका आदर देखा जाता है ।
प्रश्न—वैसा किस कारण से है ?
उत्तर—वैसा इसलिये है कि महाजनद्वारा परिगृहीत वेदरूप पूर्व-
वर्त्ती आगमसे अविरुद्ध होनेके कारण जिनेन्द्र-जगदिन्द्र
प्रभृतिका आगम वेदानुसारी है । अर्थात् वेदानुकूल होनेके
कारण ही उक्त आगमोंमें वैदिकोंका आदर है, न कि
नास्तिक या आस्तिक नामधारी किसी पुरुषद्वारा प्रणीत
होनेके कारण ।
प्रश्न—तो फिर क्यों बुद्धादिकोंके आगमोंमें भी वैदिकोंके अन्दर
आदरभाव नहीं है ?
उत्तर—उक्त आगमोंमें आदरभाव इसलिये नहीं है कि—जिनका
प्रामाण्य सिद्ध हो चुका है, ऐसे वेदोंसे बुद्धादिके आगम
विरुद्ध हैं ।
प्रश्न—तो फिर क्यों कुछ लोगोंके द्वारा भी बुद्धादिके आगमोंका
परिग्रह किया गया है ?
४५० आत्मतत्त्वविवेके
चेत् । न त्वेवं वेदे, कर्मण्येव निर्भरत्वात् । त्रैवर्णिकबहिष्कृतै-
रनधिकारिभिरनन्यगतिकत्वात् कीर्तिप्रज्ञाकरवत् । न त्वेवं श्रुतौ,
परैः पूज्यानामप्यत्राप्रवेशात् , इतः पतितानामपि परैरुपादानात् ।
भक्ष्यपेयाद्यद्वैतरुचिभिश्च रागात् सरभादिवत् । नत्वेवमा-
म्नाये, तद्विभागव्यवस्थापरत्वात् कुतर्काभ्यासिभिश्च मोहात्
काणादादिवत् । न त्वेवं ब्रह्मणि, आबालभावं प्रवृत्तेः ।
उत्तर—बौद्धादि-आगमोंका ग्रहण वे आलसी और भीरु ही करते
हैं, जिन्हें कष्टमय आश्रमीय भद्रकर्मोंसे द्वेष है। जैसे,
उदुम्बरगर्तनामक देशके निवासी कुविन्दों (जुलाहों) ने
आलस्यवश वैदिककर्मको छोड़कर संसारमोचकागमोंमें
बताये कर्मको गृहीत कर लिया। किन्तु वेदोंके सम्बन्धमें
ऐसी बात नहीं है कि आलसी और भीरु ही उनका ग्रहण
किये हों। क्योंकि कष्टमय कर्ममें ही वेदोंका निर्भर है।
अर्थात् कष्टमय कर्मके ही वे प्रतिपादक हैं।
अथवा त्रैवर्णिकोंसे बहिर्भूत होनेके कारण वैदिककर्मके लिये
अनधिकारी होनेसे अनन्यगत्या कुछ लोगोंने सुगतागमोंका परिग्रह
किया। जैसे, कीर्ति-प्रज्ञाकरप्रभृति बौद्धोंने किया था। ऐसी
अनन्यगति वेदोंके सम्बन्धमे नहीं है। क्योंकि जो दूसरोंके पूज्य हैं,
उनका भी वेदोंमें प्रवेश वर्जित कर दिया गया है। तथा वैदिक सम्प्रदाय
की दृष्टिसे जो पतित हो गये हैं, उन्हें भी बौद्धादि-आगमवाले ग्रहण
कर लेते हैं।
अथवा भक्ष्याभक्ष्य और पेयापेय आदि वस्तुओंके सम्बन्धमे कोई
भेदभाव नहीं चाहनेवाले व्यक्तियोंके द्वारा रागवशात् सौगतादि-आगमों
का ग्रहण किया गया है। जैसे, सरभप्रभृति बौद्धोंने किया है। किन्तु
ऐसी बात वेदोंके सम्बन्धमें नहीं है। क्योंकि भक्ष्य-पेय आदिके विभाग
की व्यवस्था वेदको अभिप्रेत है।
अथवा सत्तर्कको छोडकर जो केवल कुतर्कोंके ही अभ्यस्त हैं, उन्हों-
के द्वारा मोहवश सौगतादि-आगमोंका परिग्रह हुआ है। जैसे, काणा-
अनुपलम्भवाद | ४५१
अविवेकिभिश्च पाषण्डिसंसर्गात् शौण्डिकादिवत् । न त्वेवं
प्रकृते, पित्रादिक्रमेण प्रवर्तनात् । योगाभ्यासाभिमानिभि-
श्चाव्यग्रताभिसन्धेः सुभूत्यादिवत् । न त्वेवं प्रस्तुते, प्रथमस्य
कर्मकाण्ड एव नियोगात् ।
अयोग्यैराजीवनात् सामान्यश्रमणकवत् । न त्वेवं प्रक्रान्ते,
आगन्तुकानामधिकारात् । कुहकवञ्चितैः समीचीनप्रत्ययात्
दीपङ्करसुषिरदर्शिशालिशवत् । न त्वेवं प्रकृते, तदभावात् ।
चार्यप्रभृति बौद्धोंके द्वारा हुआ था। ऐसी बात वेदके सम्बन्धमें नहीं
है। क्योंकि कुतर्काभ्याससे पहले ही बालभाव अर्थात् मोहावस्थासे
उन्मुक्त होते ही वेदपरिग्रहमें प्रवृत्ति होती है।
एव, अज्ञानियोंके द्वारा ही पाखण्डियोंका संसर्ग पाकर सौगतादि-
आगमोंका परिग्रह किया गया है। जैसे, शौण्डिकप्रभृतिने किया था।
वेदके सम्बन्धमें यह बात नहीं है। क्योंकि पित्रादि-परम्परासे ही
वेदमें प्रवृत्ति होती है न कि पाखण्डियोंके संसर्गवशसे ।
एव, योगाभ्यासका मिथ्या अभिमान रखनेवाले व्यक्तियोंके द्वारा
कर्मकाण्डके लिये व्यग्र न होनेके अभिप्रायसे बौद्ध आगमोंका परिग्रह
किया गया है। जैसे सुभूतिप्रभृति बौद्धोंने किया था। किन्तु वेदके
सम्बन्धमें ऐसी बात नहीं है। वैदिक आगमके अनुसार गार्हस्थ्यके
बाद ही योगविधि एवं उपासनाआका उपदेश किया गया है। इसलिये
प्रथम प्रथम अत्यन्त कष्टमय गृहस्थ कर्मोंमें ही नियुक्त किया जाता है।
अथवा अपनी जीविकाके सम्पादनमें स्वयं असमर्थ व्यक्तियोंद्वारा
जीविकाके रूपमें बौद्धागमोंका परिग्रह किया गया है। जैसे, सामान्य
नामक भिक्षुको बौद्धोंने बहुत धन देकर अपने धर्ममें प्रवृत्त करा लिया
था। एसी बात वेदके सम्बन्धमें नहीं है। क्योंकि आगन्तुकोंका
अर्थात् पाखण्डियोंका इसमें अधिकार ही नहीं है।
अथवा ऐन्द्रजालिकोंसे ठगे गये व्यक्तियों भ्रमसे समीचीन (यथार्थ)
समझ कर सुगतादिकोंके आगमोंका ग्रहण कर लिया। जैसे, काठके बने
बहुत छिद्रवाले यन्त्रविशेषमें एक ही दीप रखा हुआ रहता है, किन्तु
४५२ आत्मतत्त्वविवेके
किन्तु महाजनपरिग्रहात् वक्तृप्रामाण्यमनुमाय, आयुर्वेदे नै-
रुज्यकामवदिति ।
किं पुनरमीषां मूलम् ? न ह्येतावन्तो ग्रन्थराशयः पर-
विप्रलम्भनार्थं प्रणीयन्ते, न च विश्वमेव विप्रलभ्यमिति चेत्,
भवतु किञ्चिन्मूलं किमनेन चिन्तितेन ? अतिनिर्वन्धे तु क्षणि-
कनैरात्म्यादिप्रतिपादकानां तर्काभ्यासः । प्रतिपादितं च तथा ।
मूर्खोंको उसके अनेक छिद्रोंसे निकलती हुई प्रभाओमे अनेक दीपोंका
भ्रम हो जाता है। किन्तु वेदके सम्बन्धमें ऐसी बात नहीं है। क्योंकि
वेदका मूलभूत कोई वञ्चक पुरुष नहीं है। अतः सौगतागमोंमें प्रवृत्ति-
के यही सब कारण हैं। किन्तु वैदिक यागादिकोंमें प्रवृत्ति तो—महा-
जन-परिगृहीत होनेके कारण वेद प्रामाणिक वक्ताद्वारा निर्मित है—
ऐसा अनुमान करके ही होती है। जैसे, नीरोगताकी कामना करने
वाला व्यक्ति आयुर्वेदमे उसकी प्रामाणिकताका अनुमान करके प्रवृत्त
होता है।
अस्तु, आलस्यादि कारणवश कुछ व्यक्तियोंद्वारा गृहीत किये गये
इन बौद्ध-आगमोंका फिर मूल क्या है ? अर्थात् कोई वस्तु निर्मूल नहीं
हुआ करती। अतः इनका भी कोई मूल होना चाहिये और समूल
होनेसे ही उन्हें प्रमाण भी मानना उचित है। क्योंकि अत्यन्त कष्ट
उठाकर रची गयी इतनी ग्रन्थराशियाँ केवल दूसरोंको ठगनेके लिए नहीं
बनायी गयीं हैं। यदि ठगना ही लक्ष्य हो, तो भी सम्पूर्ण विश्व नहीं
ठगा जा सकता है। अभिप्राय यह है कि ससारको ठगनेके लिये
बौद्ध-आगमोंकी रचना हुई है, ऐसी बात नहीं कही जा सकती—तो इन
आगमोंका भले ही कुछ मूल हो, उस चिन्तासे क्या प्रयोजन है ?
क्योंकि हमारी इष्टसिद्धि तो हमारे वेदागमोंकी प्रामाण्यसिद्धिसे ही हो
चुकी है। फिर भी बौद्धागमोंके मूलज्ञानार्थ हठ करो तो सुनो—
जो आगम क्षणिकवाद और नैरात्म्य (आत्माका अभाव) वादके
प्रतिपादक हैं, [उनका मूल है कुतर्कोंका अभ्यास। अर्थात् वस्तु यदि
स्थिर होती तो अर्थक्रियामे क्रमयौगपद्यकी उपपत्ति नहीं हो सकती है,
एवं आत्मा यदि हो तो आत्मदर्शी व्यक्ति उस आत्मामें अनुरागवान्
अनुपलम्भवाद' ४५३
शून्यसाकारादिप्रतिपादकानां तु दुरभ्यासः, योगशास्त्रेष्वभ्य-
स्यतः स्वरूपशून्यमिव भाव्यमेकमेवेति प्रतिपादनात् ।
चैत्यचीवरादिप्रतिपादकानां तु स्वस्थितिमभिसन्धाय
दर्शनान्तरस्थितिद्वेषः, स्वस्थितौ प्रमाणमनपेक्ष्य परस्थितौ
विगानात् । ब्रह्मचर्यप्रतिपादकानां तु वेदा एव, न्यायावि-
रुद्धं परतन्त्रोक्तमप्यानुकूल्यप्रसिद्धेर्गृह्यत इति विमर्शात् । मन्त्र-
कोपप्रतिपादकानां तु प्रणवबीजजातयः सर्वसाधारणाः, श्रद्धेय-
होनेके कारण कभी मुक्त नहीं हो सकेगा—इत्यादि कथन कुतर्काभ्यास
ही है । इनका कुतर्कत्व पूर्व प्रकरणमे सिद्ध किया जा चुका है ।
जो आगम 'शून्यवाद' एव 'बाह्यपदार्थ ज्ञानके ही आकारविशेष हैं'
इत्यादि वादके प्रतिपादक हैं, उनका मूल तो दुरभ्यास (दूषित भावना)
है । क्योंकि योगशास्त्रका अभ्यास करते हुए चित्तको बाह्यवस्तुओंसे
पृथक्कर जगत् शून्यताको ही एकमात्र अपनी भावनाका विषय बनाते
हुए किसीने शून्यवादका सिद्धान्त बना डाला ।
जो आगम चैत्य (बौद्धोंका देवताविशेष) वन्दना एव चीवर-
(वस्त्र) परित्यागके प्रतिपादक हैं, उनका तो मूल दिगम्बरोंका अपने
सिद्धान्तके मोहमे अन्यदर्शनके साथ द्वेष ही है। क्योकि चैत्यवन्दन
एव चीवरपरित्यागके सिवाय अन्य कुछ भी मानने योग्य नहीं है—
अपने इस सिद्धान्तमे बिना कुछ प्रमाण दिये ही दूसरोंके सिद्धान्तका
केवल निन्दा करते हैं ।
जो आगम ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा आदिके प्रतिपादक हैं, उनका
मूल तो वेद ही है । क्योंकि अपने न्यायसे जो विरुद्ध न हो, ऐसा
परकीय आगममें कहा हुआ भी अपने अनुकूल होनेसे ग्राह्य होता है—
ऐसा विचार कर ब्रह्मचर्य आदिका प्रतिपादन किया गया है । अथवा
ब्रह्मचर्यके प्रतिपादनसे एक भागमें विश्वास उत्पन्न कर उसी दृष्टान्तसे
बौद्धागमोंके सभी भागोंके प्रति विश्वास पैदा करनेके लिये सुगतोंने
ब्रह्मचर्य आदिका प्रतिपादन कर दिया ।
बौद्धोंके जो आगम मन्त्र समुदायके प्रतिपादक हैं, उनका मूल तो
देवतानामाङ्कस्त्वधिकः । श्रद्धापरिगृहीतश्चाकारो देवतेति
हस्तसमालोचः ।
सत्यतपःशालिनां वचनं मन्त्रो, विषयवत्यां चिन्तायां
चित्तस्थैर्यं प्रयोजनम् । कथमन्यथा महर्षीणां शापानुग्रह-
क्षमता; कथं वा चतुर्भुजाष्टभुजाद्यवस्थेति¹ दुरुहादिति ।
हमारे वैदिक-मन्त्रगत प्रणवजातियाँ और उन उन देवताओंके बीज-
मन्त्राक्षर ही हैं, जो सर्वत्र एक रूपसे प्रयुक्त हैं। अर्थात् उन्हें ही
देखकर तदनुसार रूप कल्पनाकर या कहीं साक्षात् उन बीजाक्षरोंको ही
बौद्धोंने अपने मन्त्रोंमें प्रक्षिप्त कर लिया है तथा उन्हींके प्रभावसे बौद्धों
में आदित्यस्तम्भन या प्रतिमाका बोलना आदि शक्ति देखी जाती है।
श्रद्धेय देवताओंके सूर्य आदि नामकी जगह चैत्य आदि भिन्न नामोंका
निर्देश ही उनकी अपनी विशेषता है। चैत्य आदि जिस आकारका
श्रद्धासे ध्यान किया जाय, वही देवता है—यह तो उनकी अपने हाथ
की कल्पनामात्र है। अर्थात् सूर्य आदि देवताओंका अपना अपना रूप
निश्चित होता है। यह नहीं की ध्याताके ध्यानके अनुसार परिवर्तित
होने वाला हो।
यह कहना कि—सत्य और तपस्यासे युक्त व्यक्तियोंका वचन ही
मन्त्र है न कि आस्तिकोंका वेदभाग मन्त्र है। तथा किसी भी आकार-
का चिन्तन करनेपर जो चित्तमे स्थिरता आती है, वही उन देवताओंके
ध्यानका प्रयोजन है। यदि सत्य और तपस्याशील व्यक्तियोंका
वचन मन्त्र नहीं होता तो महर्षियोंमे शाप और वरदानकी क्षमता कैसे
आती। एव ध्यानानुसार यदि देवताका आकार नहीं होता तो चतुर्भुज,
अष्टभुज आदि अवस्थायें देवताकी कैसे होतीं—तो दुरुह (कल्पनातीत)
होनेके कारण यह पक्ष ठीक नहीं है। अर्थात् यदि तपस्वियोंका
वचन ही मन्त्र होता तो अनेक तपस्वियोंके अनेक वचन होनेसे किस
तपस्वीका कौन सा वचन मन्त्र है, यह कल्पना कठिन है। एव यदि
चित्तका स्थैर्यमात्र ही चतुर्भुज आदि अवस्थाओंका उपयोग होता तो
१. दुरुह वात् इति शङ्करमिश्रसम्मतः पाठः ।
अनुपलम्भवादः ४५५
एकविप्रलम्भार्थं वा केनचित् कियदेव प्रणीतं तेनानुष्ठित-
मपरैस्तदनुयायिभिर्गृहीतमन्वष्ठितं व्याख्यातं विवर्धितं चेति
किमनुपपन्नम् ? तस्माद् विरुद्धागमव्युदासेन वेदा एवार्वा-
चीनपुरुषपूर्वकत्वशङ्काव्युदासेन परमेश्वरप्रणीतत्वादेव भूतार्थ-
भागस्याप्रामाण्यशङ्काव्युदासेन प्रमाणमेवेति नियमः ।
कथं चरम इति चेत् ? महाजनपरिग्रहस्य तत्साध्यस्य
वा सर्वज्ञपूर्वकत्वस्य पुरुषदोषाभावस्य वा प्रामाण्यहेतोर्भूतभा-
जिस किसी वस्तुकी चिन्तासे ही चित्त स्थिर हो जा सकता है, फिर
मूर्तिविशेषको देवताके रूपमें कैसे कल्पित कर सकते हैं ?
अथवा यों कहनेमें भी कोई अनुपपत्ति नहीं है कि किसी एकको
ठगनेके लिए किसीने कुछ बना दिया तथा उस वञ्चित व्यक्तिने तदनुसार
अनुष्ठान किया और उसीकी देखादेखी और अनुयायियोंने भी उसे
ग्रहण कर लिया, तदनुसार अनुष्ठान किया, उसकी व्याख्यायें कीं तथा
लोकमें उसे फैला दिया ।
इसलिये वेदविरुद्ध आगमोंके परवञ्चनार्थ बनाये होनेके कारण
अप्रामाणिक होनेसे उनके खण्डितकर दिये जानेसे ही, एवं वेदोंके
आधुनिक पुरुषद्वारा निर्मित होनेकी शङ्काके खण्डित हो जानेसे
परमेश्वरप्रणीत होनेसे ही, तथा वेदके भव्यार्थभाग ( साध्यार्थभाग
अर्थात् क्रियाभाग ) के समान भूतार्थभाग ( सिद्धार्थभाग ) में भी
अप्रामाण्यशङ्काके खण्डित हो जानेसे प्रमाण ही है, ऐसा नियम सिद्ध
हो जाता है । अर्थात् वेद ही प्रमाण है, अन्य नहीं--ऐसा उद्देश्यगत
नियम, तथा ईश्वरप्रणीत होनेसे ही प्रमाण है, अन्य कारणसे नहीं---
ऐसा हेतुगत नियम, तथा वेद प्रमाण ही है, अप्रमाण नहीं--ऐसा
विधेयगत नियम होकर त्रिविध नियम सिद्ध होते हैं ।
यदि पूछो कि - पूर्वके दो नियम भले ही हों, किन्तु अयोगव्यवच्छे-
दार्थक एवकारका प्रयोग कर, वेद प्रमाण ही है—यह अन्तिम नियम
कैसे है ?--तो इसका यही उत्तर है कि महाजनद्वारा परिगृहीत होना
अथवा महाजनपरिग्रहसे सिद्ध सर्वज्ञपूर्वक ( सर्वज्ञप्रणीत ) होना या
पुरुषगत दोषसे रहित होना ही वेदकी प्रामाणिकताका कारण है, जो
व्यार्थभागयोः साधारणत्वात् । किं तस्य फलमिति चेत् ?
स्वार्थप्रतिपादनम् । किं तेन प्रयोजनम् ? यथायथमुपादानं
हानं मोक्षश्च । तत्रानर्थहेतूनां तत्त्वज्ञानाद्धानमर्थहेतूनामुपादा-
नमात्मनो मोक्ष इति ।
कः पुनरयं मोक्षः ? आत्यन्तिकी दुःखनिवृत्तिरात्मनः ।
किमात्यन्तिकत्वम् ? तज्जातीयात्यन्ताभावविशिष्टत्वम् । तेषां-
वेदके भूतार्थभाग और भव्यार्थभाग दोनों में समानरूपसे है । अतः
भव्यार्थभागके समान ही अर्थवादादिरूप भूतार्थभाग भी प्रमाण ही है ।
यदि पूछो कि—भव्यार्थभागका तो प्रवृत्ति या निवृत्ति फल है, किन्तु
भूतार्थभाग (अर्थवादादि भाग) का क्या फल है?—तो यही उत्तर
है कि स्वार्थका प्रतिपादन करना भूतार्थभागका साक्षात् फल है । पुनः
पूछो कि—स्वार्थप्रतिपादनका प्रयोजन क्या है ?—तो यही कि यथा-
योग्य कहीं उपादान (ग्रहण) करना, कहीं परित्याग करना और कहीं
मोक्षप्राप्ति । उनमें जो अनर्थके हेतु हैं, उनके तत्त्वज्ञानसे उनका
परित्याग करना होगा । जो इष्टके साधन हैं, उनके तत्त्वज्ञानसे उनका
ग्रहण होगा तथा आत्माके तत्त्वज्ञानसे मोक्ष होगा । अर्थात् अर्थवाद-
भागके भी परम्परया प्रवृत्ति, निवृत्ति और मोक्ष ही यथायोग्य फल हैं ।
जैसे, "वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता" "तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजेत"
इत्यादिका वायुयागादिमें प्रवृत्ति प्रयोजन है । "अन्धन्तमः प्रविशन्ति
ये के चात्महनो जनाः" इत्यादिका आत्महत्यासे निवृत्ति फल है । तथा
उपनिषद्भागका मोक्ष फल है ।
मोक्षका स्वरूप
प्रश्न—यह मोक्ष क्या वस्तु है ?
उत्तर—आत्मामें दुःखोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति ही मोक्ष है ।
प्रश्न—आत्यन्तिक किसे कहते हैं ?
उत्तर—दुःखमात्रका अत्यन्ताभाव होना दुःखकी आत्यन्तिकी
निवृत्ति है ।
प्रश्न—दुःखोंका अत्यन्ताभाव कैसे होता है ?
अनुपलम्भवादः ४५७
मभावः कथम् ? कारणमात्रोच्छेदात् । अपुरुषार्थोऽयमिति
चेत् , न, असत्यस्याकाम्यस्याशक्यस्य दुरन्तस्य तथाभावात् ।
न त्वयं तथा । सत्योऽयम् , प्रमाणसिद्धत्वात् सर्वैरभ्युपगमात् ।
काम्यश्च, दुःखस्य स्वभावहेयत्वात् । सुखार्थं तद्धानमिति चेत्,
न, अतद्धेतुत्वात् ।
व्याप्तेरिति चेत् , न असिद्धेः । न हि दुःखाभावः सुखेन
व्याप्यत इति । सुखं तावत्तेन व्याप्यत इति चेत् , तर्हि सुखे
सत्यवश्यं दुःखाभावो भवेदिति सुखप्रार्थनेति विपरीतापत्तिः ।
नावेद्यत्वादसौ काम्य इति चेत् , न, दुःखार्तानां तद-
उत्तर—दुःखके जितने भी कारण हैं, उनका उच्छेद हो जानेसे
दुःखोका अत्यन्ताभाव हो जाता है और वही मोक्ष है ।
यदि कहो कि—दुःखकी निवृत्ति तो पुरुषार्थ नहीं है—तो ऐसा
नहीं कह सकते । क्योंकि जो असत्य है, अकाम्य है, असाध्य है या
जिसका अन्त ( परिणाम ) दोषमय है, वही अपुरुषार्थ होता है । यह
तो वैसा है नहीं । बल्कि यह प्रमाणसिद्ध होनेसे सत्य है । सभीके
द्वारा अभीष्ट होनेसे काम्य भी है । क्योंकि दुःख स्वभावसे ही सबके
लिये त्याज्य है । यदि कहो कि—दुःख स्वरूपतः त्याज्य नहीं है किन्तु
सुखके लिये उसका त्याग होता है । अर्थात् मुख्यरूपसे सुख ही काम्य
है, दुःखाभाव तो उसका साधन है, इसलिये वह गौणरूपसे काम्य है—
तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि दुःखका त्याग सुखके प्रति हेतु
नहीं है ।
यदि कहो कि—दुःखाभाव और सुखमे परस्पर व्याप्ति होनेसे हेतु
है—तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि उनकी परस्पर व्याप्ति ही असिद्ध
है । कारण, दुःखाभाव सुखसे व्याप्त नहीं है । क्योंकि सुषुप्त-अवस्था
में दुःखाभाव रहनेपर भी सुख नहीं रहता है । यदि कहो—दुःखाभाव
सुखसे व्याप्त भले ही न हो किन्तु सुख तो दुःखाभावसे व्याप्त है,
क्योंकि सुख होनेपर दुःखाभाव अवश्य रहता है—तब तो सुख होनेपर
अवश्य ही दुःखाभाव हो जायगा, इसी अभिप्रायसे सुखकी प्रार्थना होगी ।
४५८ आत्मतत्त्वविवेके
भाववेदनमनभिसन्धायैव तज्जिहासादर्शनात् । कथमन्थथा
देहमपि जह्युः । अविवेकिनस्त इति चेत्, किमत्र विवेकेन ?
इष्यमाणतामात्रानुबन्धित्वात् पुरुषार्थत्वस्य, गम्यागम्ययोः
कामवत्¹ । बहुतरानर्थप्रसक्तिशङ्कया शास्त्रमनुकूलयन्तस्त
इतरेभ्यो भिद्यन्ते ?
अपि चैवं कण्टकादिजन्यदुःखनिवृत्तिरपि पुरुषार्थो न
स्यात्, अवेद्यत्वात् । प्रथमं विद्यते तावदसाविति चेत्,
ऐसी स्थितिमे सुख गौण काम्य हो गया और दुःखाभाव ही मुख्यरूपसे
अभीष्ट (काम्य) सिद्ध हो गया । इस प्रकार "सुखके लिये दुःखका
अभाव होता है" इस तुम्हारे पूर्ववचनके विपरीत ही सिद्ध हो गया ।
यदि कहो, दुःखाभावका अनुभव नहीं होता है, इसलिये वह काम्य
नहीं होता—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि दुःखसे पीड़ित व्यक्ति
दुःखाभाव प्रतीतिकी बिना ख्याल किये ही दुःखसे छुटकारा पानेकी
इच्छा करता है, ऐसा देखा जाता है । यदि उसे दुःखाभावकी अनुभू-
तिकी भी कामना रहती तो विषादिका भक्षण कर क्यों देहको भी छोड़
देना चाहता है ? जब कि अनुभूतिके लिये देह अपेक्षित है । यदि
कहो—वे अविवेकी हैं—तो इसमें विवेकका क्या प्रयोजन है ? इष्य-
माणतामात्रसे ही पुरुषार्थका सम्बन्ध है । अर्थात् जो अभीष्ट है, वही
पुरुषार्थ है । जैसे कामनामक पुरुषार्थ गम्या या अगम्याके विवेककी
अपेक्षा नहीं करता । अर्थात् गम्याकी कामना भी काम है और अगम्या
की कामना भी । हाँ विवेकियोंमें अविवेकियोंसे इतना अन्तर है कि
विवेकी लोग अत्यधिक अनर्थोंकी प्रसक्तिकी आशङ्कासे शास्त्रानुकूल ही
आचरण करते हैं। अर्थात् दुःखसे छुटकारा पानेकी इच्छासे
विषभक्षणादिद्वारा आत्महत्या या कामशान्तिके लिये अगम्यागमन
नहीं करते हैं ।
एवं अनुभूयमानताकी दशामें ही यदि दुःखाभाव पुरुषार्थ माना
जाय तो कण्टकादिसे होनेवाले दुःखकी निवृत्ति भी पुरुषार्थ नहीं होगा ।
क्योंकि उस दुःखनिवृत्तिका सदा अनुभव नहीं होता रहता है ।
१ काममह्ववत् इति २ पु० पा०
तुल्यं मोक्षेऽपि । नाध्यक्षेणेति चेत्, तर्हि दुरितक्षयकामस्य
कर्मानुष्ठानानर्थक्यप्रसङ्गः, तदभावतत्फलाभावयोरप्यनध्यक्ष-
त्वात् । उपलब्धियोग्यतापन्नानिष्टनिवृत्तिरूपत्वादयमदोष-
इति चेत्, तुल्यम् ।
दुःखवत् सुखस्याप्युच्छेदादकाम्योऽयमिति चेत्, न,
तृष्णया दोषतिरस्कारेण प्रवृत्तिवदलंप्रत्ययेन गुणतिरस्कारान्नि-
यदि कहो कि—कण्टक निकल जानेपर प्रथम कालमे दुःखनिवृत्तिका
अनुभव होता है, इसलिये उसके पुरुषार्थ होनेमे कोई बाधा नहीं है।
अर्थात् कदाचित् अनुभूयमान होना ही पुरुषार्थका लक्षण है—तो यह
बात आत्यन्तिकी दुःखनिवृत्तिरूप मोक्षमे भी तुल्य है। अर्थात् शब्द,
अनुमान आदि द्वारा मोक्षकालिक दुःखनिवृत्ति भी अनुभूयमान ही है।
यदि कहो कि—उस दुःखनिवृत्तिका शाब्दबोध या अनुमिति होनेपर भी
साक्षात्कार नहीं होता है, अत वह पुरुषार्थ नहीं हो सकता है—तब तो
पापनाशकी इच्छासे प्रायश्चित्तादि कर्मोंका अनुष्ठान ही अनर्थक हो
जायगा। क्योंकि पापाभाव और पापके फलस्वरूप दुःखके अभावका
भी साक्षात्कार नहीं होता।
यदि कहो कि—प्रायश्चित्त-जन्य दुःखनिवृत्तिके प्रत्यक्षसे उपलब्ध-
मान न होनेपर भी उपलब्धिकी योग्यतासे युक्त दुःखनिवृत्तिरूप होनेसे
यहाँ कोई दोष नहीं है। अर्थात् पुरुषार्थ होनेके लिये उपलब्धि अपे-
क्षित नहीं है, किन्तु उपलब्धिकी योग्यता अपेक्षित है। तथा वह
योग्यता प्रायश्चित्त-जन्य दुःखप्रागभावमे भी है, क्योंकि उसका प्रतियोगी-
भूत दुःख उपलब्धिके योग्य है—तो ऐसी उपलब्धि-योग्यता आत्यन्तिक
दुःखनिवृत्तिरूप मोक्षमें भी तुल्य है।
यदि कहो—दुःखके समान सुखका भी इस पक्षमे उच्छेद हो जाने
से दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष किसीका काम्य नहीं हो सकता—तो ऐसा नहीं
कह सकते। क्योंकि जैसे, अत्युत्कट रागवश अगम्यागमनादिमे दोष
की उपेक्षा कर उसमे अविवेकीकी प्रवृत्ति होती है, वैसे ही सुख-
साधनों में विवेकियोंको अलबुद्धि (अनपेक्षाबुद्धि) होनेसे उनके गुणोंकी
उपेक्षा कर सुख साधनोंसे निवृत्ति भी देखी जाती है। इसमें मधु
४६० आत्मतत्त्वविवेके
वृत्तेरपि दर्शनात् । मधुविषसंपृक्तमन्नमत्रोदाहरणम् । सन्ति
च केचनालंप्रत्ययवन्तः । न च समत्वम्, दुःखस्यैव प्राचुर्यात्,
दुःखे सुखहेत्वननुषङ्गेऽपि सुखे दुःखहेत्वनुषङ्गनियमात् ।
तथाहि न्यायोपार्जितेष्वेव विषयेषु कियती सुखखद्यो-
तिका कियन्ति चार्जनरक्षणादिभिर्दुःखदुर्दिनानि । अन्यायो-
पार्जितेषु यद् भविष्यति तन्मनसापि चिन्तयितुमशक्यम् ।
विदाङ्कुर्वन्तु च सन्तो यदि कण्टकादिजन्येषु दुःखेषु लेशतोऽपि
-सुखानुषङ्गः । अस्ति च स्वर्गादिसुखेष्वपि बहुलो दुःख-
एवं विषसे संपृक्त अन्न उदाहरण है । अर्थात् मधुका लोभी व्यक्ति
-विषसे होने वाले अनिष्टकी उपेक्षा कर उस अन्नको खा लेता है, तथा
मधुका जो लोभी नहीं है, ऐसा व्यक्ति मधुकी मधुरतागुणकी उपेक्षा कर
विषमिश्रित अन्नका परित्याग कर देता है । दुःखरूपी दुर्दिनसे डरे हुए
बहुतसे व्यक्ति हैं, जो उस सुखके प्रति भी विरक्त हैं । तात्पर्य यह है
कि सुखका भी उच्छेद हो जायगा, इस कारण दुःखनिवृत्तिरूप पुरुषार्थमें
अकाम्यत्वका प्रसङ्ग नहीं आयगा ।
साथ ही दुःख और सुखमें कोई समता भी नहीं है । क्योंकि
संसारमे दुःख ही अधिकमात्रामें है । अतः अधिक दुःखोंकी निवृत्ति-
रूप लाभकी मात्रा विशेष है तथा उसके समक्ष स्वल्प सुखका उच्छेदरूप
हानिकी मात्रा बहुत थोड़ी है, इसलिये दुःख-निवृत्ति अवश्य काम्य
होगी । क्योंकि दुःखमे सुखहेतुकी अनुवृत्ति नहीं भी रहती है, किन्तु
प्रत्येक सुखमें दुःखका हेतु अवश्य ही अनुवर्तमान रहता है । जैसे कि
न्यायपूर्वक उपार्जित विषयोंमें ही कितनी सुखरूपी जुगनू भासित होती
है ? और अर्जन एवं रक्षा आदिको लेकर कितने दुःखरूपी दुर्दिनोंका
सामना करना पड़ता है ? अर्थात् न्यायोपार्जित विषयोंमें भी सुखसे
अधिक दुःख ही भोगना पड़ता है । किन्तु जो विषय अन्यायसे उपार्जित
होंगे, उनमें जो भोगना पड़ेगा, उसकी तो मनसे भी कल्पना नहीं की जा
सकती है । सज्जन ही अनुभव करें, यदि कण्टकादिसे होनेवाले दुःखोंमें
-लेशमात्र भी सुखका संसर्ग हो । और स्वर्गादि सुखोंमें भी बहुल-
अनुपलब्धवादः ४६१
शल्यसम्मेदः । अत एव विविच्य भुज्यतां तुषतण्डुलवदित्य-
शक्यमिति ।
शक्यश्चायं, निवर्त्यत्वात् । स्वन्तश्च, अपरावृत्तेरनर्थवा-
सनानुकूलाभिसन्धित्वाच्चेति ।
नित्यं तु सुखं न सत्यम्, योग्यानुपलम्भबाधितत्वात् ।
मात्रामे दुःखरूपी काटोंका ही सम्मिश्रण है । इसीलिये भूसी और
चावलके न्यायसे दुःखरूपी काँटाको बिलगा बिलगा कर सुखका भोग
किया जाय, यह भी असम्भव है ।
एव, दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष साध्य भी है, अर्थात् असाध्य नहीं है ।
क्योंकि उपायद्वारा उसे किया जा सकता है । अर्थात् दुःखात्यन्ताभाव-
रूप मुक्तिके पक्षमे यद्यपि अत्यन्ताभावके नित्य होनेसे वह उत्पाद्य नहीं
हो सकता है, तथापि सम्पूर्ण दुःखसाधनोंका ध्वंस उत्पाद्य है, अत उसके
साथ दुःखात्यन्ताभावका सम्बन्ध भी उत्पाद्य होनेसे वह भी साध्य कोटि
मे आ जाता है । यदि विशिष्ट दुःखका ध्वंसरूप मुक्ति हो तो वह स्वतः
ही साध्य है । यदि दुःखका प्रागभाव ही मुक्ति हो तो वह भी दुःख-
कारणोंके विघटनके द्वारा साध्य ही है ।
साथ ही यह दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष परिणाममे भी अच्छा है ।
अर्थात् तक्षकसर्पके शिरका मणि लेनेके समान दुष्परिणामवाला भी
नहीं है । क्योंकि निवृत्त हुआ दुःख फिर नहीं पैदा होता है ।
तथा किसी अन्य अनर्थकामनाकी प्रयोजिका भी वह दुःखकी आत्य-
न्तिक निवृत्तिकी कामना नहीं है । अर्थात् जैसे, सुखाभिलाषी
व्यक्ति सुखका भोग होनेपर बारबार सुख और उसके साधनकी कामना
करता रहता है । तथा सुखका उचित साधन नहीं मिलनेपर अनुचित
साधनकी भी कामना करता है । जैसे, कामी व्यक्ति अपनी स्त्रीके
नहीं मिलनेपर परस्त्रीकी कामना करने लगता है, किन्तु वह कामना
परिणाममे महान् अनर्थका हेतु है । इस प्रकार सुखकी कामना उत्तरो-
त्तर अनर्थकामनाको ही उद्बुद्ध करनेवाली होती है । किन्तु यह दुःख-
निवृत्तिरूप मोक्षकी कामना वैसी नहीं है ।
नित्य सुख तो कोई सत्य वस्तु है ही नहीं । इसलिये नित्य सुख
४६२ आत्मतत्त्वविवेके
श्रुतिस्तत्र मानमिति चेत्, न, योग्यानुपलब्धिबाधिते तदनव-
काशात् अवकाशे १ वा ग्रावप्लवनश्रुतेरपि तथाभावप्रसङ्गात् ।
नापि काम्यं, सदातनत्वात् । न हि यद् यस्यास्ति स
तत्कामयते । भ्रान्तेरेवम्, कण्ठस्थचामीकरवदिति चेत्, न
स्वसंवेद्ये तदभावात् ।
मोक्ष है—यह पक्ष नहीं हो सकता । क्योंकि सुख और दुःख नियमतः
प्रत्यक्षयोग्य ही होते हैं । अतः यदि नित्य सुख होता तो उसका प्रत्यक्ष
होता । इसलिये प्रत्यक्षयोग्यता होनेपर भी उसकी उपलब्धि नहीं होनेसे
नित्य सुखका होना बाधित है । यदि कहा जाय कि—नित्य सुखकी
सत्तामें श्रुति प्रमाण है—तो यह नहीं हो सकता । क्योंकि जो योग्य
होता हुआ भी अनुपलब्धिके कारण बाधित है, उसका बोधक श्रुति भी
नहीं हो सकती है। यदि हो तो ग्रावप्लवन (पत्थरका तैरना) की
प्रतिपादिका श्रुति भी वस्तुगत्या ग्रावप्लवनकी प्रतिपादिका हो जायगी ।
अर्थात् 'नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म, आनन्दं ब्रह्मणो रूपं तच्च मोक्षे
प्रतिष्ठितम्' इत्यादि श्रुतियाँ मोक्षावस्थामें नित्य सुखको नहीं बताती हैं,
किन्तु दुःखात्यन्ताभावपरक हैं ।
एवं, नित्य सुख काम्य भी नहीं हो सकता है । क्योंकि नित्य होने
से वह सदा है ही, फिर कामना क्यों ? ऐसा नहीं होता कि जो वस्तु
जिसके पास है, उसकी वह कामना करता हो । यदि कहें कि—नित्य
सुखके विद्यमान होनेपर भी उसके अविद्यमान होनेकी भ्रान्तिसे उसकी
कामना होती है । जैसे कण्ठमें ही स्थित स्वर्णाभरणको नहीं देखनेसे
भ्रमवशात् उसकी कामना होती है—तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि
स्वकण्ठस्थित स्वर्णाभरण दूसरेके द्वारा संवेद्य होनेके कारण भ्रमवशात्
भले ही काम्य हो, किन्तु सुख तो सदा स्वसंवेद्य है, अर्थात् रहनेपर स्वयं
ही विदित होता रहता है । इसलिये स्वयंप्रकाश सुखमें भ्रम हो ही
नहीं सकता । अतः नित्य सुखरूप मोक्ष सदा प्राप्त और सदा प्रत्यक्ष
होनेके कारण काम्य नहीं हो सकता है ।
१. संभव वा इति क्वचित् पाठ
अनुपलब्धवादः ४६३
नापि शक्यम्, न हि तन्निर्वर्त्यं नित्यत्वात् । नापि
विकार्यम्, अपरिणामित्वात् । नापि संस्कार्यम्, अनाधेया-
तिशयत्वात् । न प्राप्यम्, नित्यसम्बन्धवत्त्वात् ।
न ज्ञेयम्, ज्ञानस्यापि नित्यत्वात् । अनित्यत्वे वा
शरीरादिकारणापाये तदनुत्पत्तेः । उत्पत्तौ वा तेषामकारण-
त्वप्रसङ्गात् । तथा च सर्वः सर्वदर्शी स्यात्, आत्ममनः-
संयोगादेः सर्वत्राविशेषात् ।
एव, नित्यसुखरूप मोक्ष शक्य ( साध्य ) भी नहीं है । क्योंकि
शक्यका क्या अर्थ है ? उत्पाद्य या विकार्य या सस्कार्य या प्राप्य अथवा
ज्ञेय । यदि शक्यका अर्थ उत्पाद्य लें तो वह उत्पाद्य नहीं हो सकता,
क्योंकि नित्य है । नित्य सुख विकार्य भी नहीं हो सकता, क्योंकि यह
अपरिणामी है । सस्कार्य ( सस्कारद्वारा कुछ अतिशय लानेयोग्य )
भी वह नहीं है, जैसा कि “व्रीहीन् प्रोक्षति” यहाँ प्रोक्षणद्वारा व्रीहिका
सस्कार होता है—क्योंकि नित्य सुख अनाधेयातिशयरूप है । अत
उसमें सस्कारद्वारा किसी प्रकारके अतिशयका आधान नहीं किया जा
सकता है ! नित्यसुखको प्राप्य भी नहीं कह सकते, जैसा कि नित्य भी
वेद अध्ययनद्वारा प्राप्त किया जाता है—क्योंकि नित्य होनेसे सदा
प्राप्त ही है ।
ऐसे ही नित्य सुखवादी वेदान्तियोंके यहाँ ज्ञान भी नित्य ही होता
है । अत ज्ञान और सुख दोनोंके नित्य होनेसे उपासनादि विधियोंसे
नित्य सुखको ज्ञेय कहना भी ठीक नहीं है ।
यदि कहो कि—ज्ञान अनित्य है—तो मुक्तिदशामे शरीरादि ज्ञान
साधनोंके अभावमे नित्यसुखका ज्ञान ही नहीं उत्पन्न हो सकता है ।
यदि उस कालमें शरीरादि कारणोंके अभावमे भी सुखज्ञानकी उत्पत्ति
मानो तो ज्ञानोत्पत्ति के प्रति शरीरादि अहेतु हो जायगा । अर्थात् बिना
शरीरेन्द्रियादिके भी ज्ञान पैदा होने लगेगा । ऐसी स्थितिमें सब सर्वज्ञ
हो जायेंगे । क्योकि ज्ञानका कारण जो आत्मा और मनका सयोग है,
वह सबमे समानरूपसे है ।
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४६४ आत्मतत्त्वविवेके
ज्ञानज्ञेययोर्नित्यत्वेऽपि तत्सम्बन्धो जन्यते, स च षट्-
पदार्थव्यतिरेकादुत्पन्नोऽपि न निवर्तते ध्वंसवदिति चेत्, न,
भावाभावयोः प्रकारान्तराभावात् ।
तत्र स नाभावः, प्रतियोग्यनुपपत्तेः। भावत्वे त्ववश्यमुत्पन्नो
निवर्त्तेत, उपाध्यन्तराभावात् । अविद्याविध्वंसनमेव तत्प्राप्ति-
रिति चेत्, अत्र न नो विवादः । न ह्येकविंशतिप्रभेदभिन्न-
दुःखव्यतिरिक्ता अविद्या नाम । तद्विध्वंसनञ्च पुरुषार्थ
इति प्रतिपादनादिति ।
दुरन्तं च तत्, तदभिसन्धेः सुखसंस्कारसहकारितया
तदुद्भवे विशिष्टसुखाभिलाषिणो वैषयिकेऽपि प्रवृत्तिसंभवात् ।
यदि कहो कि—ज्ञान और सुखरूप ज्ञेय इन दोनोंके नित्य होनेपर
भी उनका सम्बन्ध उत्पन्न होता है। अतः वह उपासनादि विधियोंके
द्वारा साध्य है। तथा वह सम्बन्ध उत्पत्तिशाली होनेपर भी द्रव्यादि
षट् पदार्थोंसे भिन्न होनेके कारण विनष्ट नहीं होता है। जैसे, ध्वंस
उत्पत्तिमान् होनेपर भी विनष्ट नहीं होता—तो ऐसा नहीं हो सकता है।
क्योंकि भाव और अभावके अतिरिक्त पदार्थोंका कोई दूसरा प्रकार ही
नहीं होता है। उसमें वह सम्बन्ध अभावरूप नहीं है। कारण, निष्प्र-
प्रतियोगिक अभाव होता ही नहीं है। यदि वह सम्बन्ध भावरूप हो तो
उत्पन्न होनेके कारण वह अवश्य विनष्ट हो जायगा। क्योंकि उत्पन्न
वस्तुके विनाशो होनेमे भावत्व ही उपाधि है, अन्य नहीं। यदि कहो
कि—अविद्याका ध्वंस होना ही नित्यज्ञान और नित्यसुखका सम्बन्ध
है—तो इसमें हमारा कोई विरोध नहीं है। क्योंकि इक्कीस प्रकारोंमें
विभक्त दुःखके अलावे कोई अविद्या नहीं है तथा इन दुःखोंका विध्वंस
ही पुरुषार्थ (मोक्ष) है, यह न्यायमे प्रतिपादित किया गया है।
अर्थात् न्यायसम्मत दुःखध्वंस ही अन्ततोगत्वा मोक्षका स्वरूप सिद्ध
होता है।
एव, नित्यसुखरूप मोक्ष दुरन्त अर्थात् परिणाममें दोषपूर्ण भी है।
क्योंकि सुखकी कामनासे पूर्वमें प्राप्त सुखोंके संस्कारोंकी सहायता पाकर
अनुपलम्भवादः ४६५
“अलाभे मत्तकाशिन्या दृष्टा तिर्यक्षु कामिता” इत्युदा-
हरणादिति ।
स्यादेतत्, आत्मा तु किं स्वप्रकाशसुखस्वभावोऽन्यथा
वेति पृच्छामः । श्राद्धोऽसि चेदुपनिषदः पृच्छ । मध्यस्थोऽसि
चेत्, अनुभवं पृच्छ ।
नैयायिकोऽसि चेत्, न वैषयिकसुखज्ञानस्वभाव इति
सुखसंस्कारके उद्बुद्ध होनेपर पूर्वकी अपेक्षा उत्कृष्ट सुखकी अभिलाषा
करनेवाले व्यक्तिको उस उत्कृष्ट सुखके नहीं मिलनेपर निम्नकोटिके
वैषयिक सुखमें ही प्रवृत्ति होने लगेगी, जो कि मोक्षका विरोधी है ।
क्योंकि “मत्तकाशिनी (सुन्दरी स्त्री) की अप्राप्तिमें तिर्यग्योनियों
के प्रति भी कामवासना देखी जाती है” ऐसा उदाहरण है । अर्थात्
मोक्षको सुखरूप माननेमें उत्तरोत्तर बन्धन ही बढ़ता जायगा तथा
मुक्ति असंभव हो जायगी ।
आत्माका स्वरूप
“अस्तु, आत्मा क्या स्वप्रकाश-सुखस्वभाव है ? यह हम पूछते हैं ।
आशय यह है कि आत्मा यदि स्वप्रकाश-सुखस्वभाववाला हो तो
उसमें दुःखकी संभावना ही कहाँ है कि आत्यन्तिकी दुःखनिवृत्ति मोक्ष-
का स्वरूप हो” । इसका उत्तर यह है कि यदि श्रद्धालु रूपमें पूछते हो
तो उपनिषदोंको पूछो । अर्थात् उपनिषदोंमें आत्माका प्रतिपादन ज्ञान
और सुखसे भिन्नरूपमें ही किया गया है । जहाँ कहीं सुखज्ञान-
स्वभावत्वका प्रतिपादन है, उसका दूसरा तात्पर्य बताया जा चुका है ।
यदि मध्यस्थके रूपमें अर्थात् न्याय और आगमका अपक्षपाती होकर
पूछते हो तो अपने अनुभवको पूछो । अर्थात् “अहं सुखी, अहं जाने”
इत्यादि अनुभवसे आत्मा सुख और ज्ञानसे युक्त प्रतीत होता है न कि
सुख और ज्ञानरूप । यदि वैसा होता तो “अहं ज्ञानम् अहं सुखम्”
ऐसा अनुभव होता ।
यदि नैयायिकके रूपमें अर्थात् आत्माका स्वरूप न्यायद्वारा जानने-
की रुचिसे पूछते हो तो यही निर्णय करो कि आत्मा वैषयिक-सुख और
३०