आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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चेत् । न त्वेवं वेदे, कर्मण्येव निर्भरत्वात् । त्रैवर्णिकबहिष्कृतै-
रनधिकारिभिरनन्यगतिकत्वात् कीर्तिप्रज्ञाकरवत् । न त्वेवं श्रुतौ,
परैः पूज्यानामप्यत्राप्रवेशात् , इतः पतितानामपि परैरुपादानात् ।
भक्ष्यपेयाद्यद्वैतरुचिभिश्च रागात् सरभादिवत् । नत्वेवमा-
म्नाये, तद्विभागव्यवस्थापरत्वात् कुतर्काभ्यासिभिश्च मोहात्
काणादादिवत् । न त्वेवं ब्रह्मणि, आबालभावं प्रवृत्तेः ।
उत्तर—बौद्धादि-आगमोंका ग्रहण वे आलसी और भीरु ही करते
हैं, जिन्हें कष्टमय आश्रमीय भद्रकर्मोंसे द्वेष है। जैसे,
उदुम्बरगर्तनामक देशके निवासी कुविन्दों (जुलाहों) ने
आलस्यवश वैदिककर्मको छोड़कर संसारमोचकागमोंमें
बताये कर्मको गृहीत कर लिया। किन्तु वेदोंके सम्बन्धमें
ऐसी बात नहीं है कि आलसी और भीरु ही उनका ग्रहण
किये हों। क्योंकि कष्टमय कर्ममें ही वेदोंका निर्भर है।
अर्थात् कष्टमय कर्मके ही वे प्रतिपादक हैं।
अथवा त्रैवर्णिकोंसे बहिर्भूत होनेके कारण वैदिककर्मके लिये
अनधिकारी होनेसे अनन्यगत्या कुछ लोगोंने सुगतागमोंका परिग्रह
किया। जैसे, कीर्ति-प्रज्ञाकरप्रभृति बौद्धोंने किया था। ऐसी
अनन्यगति वेदोंके सम्बन्धमे नहीं है। क्योंकि जो दूसरोंके पूज्य हैं,
उनका भी वेदोंमें प्रवेश वर्जित कर दिया गया है। तथा वैदिक सम्प्रदाय
की दृष्टिसे जो पतित हो गये हैं, उन्हें भी बौद्धादि-आगमवाले ग्रहण
कर लेते हैं।
अथवा भक्ष्याभक्ष्य और पेयापेय आदि वस्तुओंके सम्बन्धमे कोई
भेदभाव नहीं चाहनेवाले व्यक्तियोंके द्वारा रागवशात् सौगतादि-आगमों
का ग्रहण किया गया है। जैसे, सरभप्रभृति बौद्धोंने किया है। किन्तु
ऐसी बात वेदोंके सम्बन्धमें नहीं है। क्योंकि भक्ष्य-पेय आदिके विभाग
की व्यवस्था वेदको अभिप्रेत है।
अथवा सत्तर्कको छोडकर जो केवल कुतर्कोंके ही अभ्यस्त हैं, उन्हों-
के द्वारा मोहवश सौगतादि-आगमोंका परिग्रह हुआ है। जैसे, काणा-