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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 499, कुल 530 में से

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पृष्ठ 499

[Header] अनुपलब्धवादः ४४७

वेदापेक्ष एवेति सेश्वरमीमांसापक्षः कपिलपक्षो वा स्यादिति चेत्,
किमर्थं पुनरियम्पेक्षा पूर्ववेदे जगन्नाथस्य ? न तावद् वेदार्थोप-
लम्भाय, नित्यसर्वज्ञत्वात् ।
नापि रचनार्थम्, स्वभावतः सर्वकर्तृतया आदर्शानपेक्ष-
त्वात् । नापि विरोधपरिहारार्थम्, प्रतिपाद्यानां तदनुसन्धान-

वेदके अनुसार ही सञ्चालित हो तो यह एक नया ही सेश्वर मीमांसापक्ष
हो गया, जो ईश्वरको वेदका कर्ता माननेसे सेश्वर हुआ और पूर्व पूर्व
वेदोंकी अपेक्षा करनेसे मीमांसा भी हुआ । अथवा कपिलपक्ष हो गया,
जिसके अनुसार धर्म, विज्ञान, और ऐश्वर्यसे सम्पन्न कपिलमुनिने ही
सुप्त-प्रबुद्धके समान पूर्वसृष्टिगत वेदोंका स्मरणकर वर्तमान सृष्टिके प्रारम्भ
में वेदोंको प्रकाशित किया—तो बताओ कि परमेश्वरको वर्तमान वेद-
सम्प्रदायको सञ्चालित करनेके लिये पूर्ववेदकी क्यों अपेक्षा होगी ? यदि
कहो कि—वैदिक विषयोंके ज्ञानके लिये पूर्ववेदकी अपेक्षा है । अर्थात्
जिन विषयोंका प्रतिपादन वर्तमान वेदद्वारा परमेश्वरको करना है, उन
विषयोंको वह पूर्ववेदसे ही जानता है—तो यह नहीं कह सकते ।
क्योंकि नित्य-सर्वज्ञ होनेके कारण वह स्वयं सम्पूर्ण वेदार्थका ज्ञान
रखता है ।
यदि कहो कि—वर्तमान वेदकी रचनाके लिये आदर्श ( नमूना ) के
रूपमें पूर्ववेदकी अपेक्षा है—तो यह भी नहीं हो सकता । क्योंकि
स्वाभाविकरूपसे ही वह सम्पूर्ण वस्तुओंका कर्ता होनेके कारण किसी
आदर्शकी अपेक्षा नहीं करता है। यदि कहो कि—पूर्ववेदसे वर्तमान
वेदमें विरोध-परिहारके लिये पूर्ववेदकी अपेक्षा है । कारण, पूर्ववेदसे
आजके वेदमें विरोध होनेपर मन्वादिद्वारा परिग्रह होनेमें शिथिलता
आ जायगी—तो यह भी ठीक नहीं है । क्योंकि मनु आदिको पूर्ववेदका
अनुसन्धान ही नहीं होता है, जिसके विरोध-परिहारार्थ परमेश्वरको पूर्व-
वेदकी अपेक्षा हो । यदि सर्वज्ञ होनेके कारण मन्वादिको पूर्ववेदका
अनुसन्धान संभव है, इसलिये उसके साथ विरोध-निवारणार्थ पूर्ववेदके
अनुसार ही परमेश्वरको वर्तमान वेद बनाना पड़ता है—ऐसा मानो, तो
भी सर्वज्ञ होनेसे मनु आदि परमेश्वरकी सर्वज्ञताको भी जानते ही