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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 504

४५२ आत्मतत्त्वविवेके
किन्तु महाजनपरिग्रहात् वक्तृप्रामाण्यमनुमाय, आयुर्वेदे नै-
रुज्यकामवदिति ।
किं पुनरमीषां मूलम् ? न ह्येतावन्तो ग्रन्थराशयः पर-
विप्रलम्भनार्थं प्रणीयन्ते, न च विश्वमेव विप्रलभ्यमिति चेत्,
भवतु किञ्चिन्मूलं किमनेन चिन्तितेन ? अतिनिर्वन्धे तु क्षणि-
कनैरात्म्यादिप्रतिपादकानां तर्काभ्यासः । प्रतिपादितं च तथा ।
मूर्खोंको उसके अनेक छिद्रोंसे निकलती हुई प्रभाओमे अनेक दीपोंका
भ्रम हो जाता है। किन्तु वेदके सम्बन्धमें ऐसी बात नहीं है। क्योंकि
वेदका मूलभूत कोई वञ्चक पुरुष नहीं है। अतः सौगतागमोंमें प्रवृत्ति-
के यही सब कारण हैं। किन्तु वैदिक यागादिकोंमें प्रवृत्ति तो—महा-
जन-परिगृहीत होनेके कारण वेद प्रामाणिक वक्ताद्वारा निर्मित है—
ऐसा अनुमान करके ही होती है। जैसे, नीरोगताकी कामना करने
वाला व्यक्ति आयुर्वेदमे उसकी प्रामाणिकताका अनुमान करके प्रवृत्त
होता है।
अस्तु, आलस्यादि कारणवश कुछ व्यक्तियोंद्वारा गृहीत किये गये
इन बौद्ध-आगमोंका फिर मूल क्या है ? अर्थात् कोई वस्तु निर्मूल नहीं
हुआ करती। अतः इनका भी कोई मूल होना चाहिये और समूल
होनेसे ही उन्हें प्रमाण भी मानना उचित है। क्योंकि अत्यन्त कष्ट
उठाकर रची गयी इतनी ग्रन्थराशियाँ केवल दूसरोंको ठगनेके लिए नहीं
बनायी गयीं हैं। यदि ठगना ही लक्ष्य हो, तो भी सम्पूर्ण विश्व नहीं
ठगा जा सकता है। अभिप्राय यह है कि ससारको ठगनेके लिये
बौद्ध-आगमोंकी रचना हुई है, ऐसी बात नहीं कही जा सकती—तो इन
आगमोंका भले ही कुछ मूल हो, उस चिन्तासे क्या प्रयोजन है ?
क्योंकि हमारी इष्टसिद्धि तो हमारे वेदागमोंकी प्रामाण्यसिद्धिसे ही हो
चुकी है। फिर भी बौद्धागमोंके मूलज्ञानार्थ हठ करो तो सुनो—
जो आगम क्षणिकवाद और नैरात्म्य (आत्माका अभाव) वादके
प्रतिपादक हैं, [उनका मूल है कुतर्कोंका अभ्यास। अर्थात् वस्तु यदि
स्थिर होती तो अर्थक्रियामे क्रमयौगपद्यकी उपपत्ति नहीं हो सकती है,
एवं आत्मा यदि हो तो आत्मदर्शी व्यक्ति उस आत्मामें अनुरागवान्