आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 500, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें४४८ आत्मतत्त्वविवेके
विधुरत्वात् । अवैधुर्य्ये वा कर्तुः सार्वश्यविज्ञानादेव समस्तविरोध-
विधूननात् ।
तथापि पूर्वसर्गान्तरवेदव्यवहारोऽपि परमेश्वरस्य गोचर
इति चेत् , कः सन्देहः ? यदि चैतदेव वेदस्य प्रवाहनित्यत्वम् ,
न केवलमेतस्य, किंतु घटादेरपीति न्याय एव दर्शनम् । अन्यथा
मीमांसेति क्व सेश्वरमीमांसेति । तस्मादुक्तरूपः परिग्रहो
नान्यथा संभवतीति प्रतिबन्धसिद्धिः । तथा चाप्तोक्तत्वात्
प्रामाण्यसिद्धिः ।
हैं, उससे ही मनु आदिको समस्त विरोधोंका विधूनन हो जाता है ।
अर्थात् परमेश्वरकी सर्वज्ञताके ज्ञानसे ही मनु आदिको परमेश्वरकृत वेद
में विरोध-बुद्धिका उदय नहीं होता है ।
फिर भी यदि कहो कि—वर्तमान वेदके रचयिता परमेश्वरको पूर्व-
सृष्टिगत वेद-व्यवहारका भी ज्ञान रहता ही है, क्योंकि वह सर्वज्ञ है ।
अत एव यहाँ सेश्वर मीमांसापक्ष ही आता है—तो इसमे क्या सन्देह
है ? क्योंकि यदि इसे ही (वेदनिर्माता ईश्वरको पूर्ववेदका ज्ञान रहनेको
हो) वेदकी प्रवाह नित्यता कहो तो इस प्रकारका प्रवाह-नित्यत्व न
केवल वेदका ही है किन्तु घटादि वस्तुओंका भी है । अतः यह न्याय-
दर्शन ही हुआ । किन्तु यदि इससे भिन्न प्रवाह-नित्यत्व कहो, अर्थात्
जो वेद पूर्वसृष्टिमें था वही इस समयमें भी है, यही प्रवाह-नित्यत्व
है—तो यह शुद्ध मीमांसापक्ष होगा, जिसका खण्डन किया जा
चुका है । इसलिये सेश्वमीमांसानामक अतिरिक्त पक्षका प्रसङ्ग कहाँ
आता है ?
इसलिये मन्वादिकोंद्वारा वेदोंका पूर्वोक्त परिग्रह वेदोंमें आप्तोक्तत्व-
निश्चयके बिना नहीं हो सकता । अतः महाजनपरिग्रह और आप्तोक्तत्व
मे परस्पर व्याप्तिसम्बन्धकी सिद्धि हो जाती है । अर्थात् जो जो महाजन-
परिगृहीत होता है, वह आप्तोक्त होता है । वेद भी मन्वादि महाजनद्वारा
परिगृहीत है, इसलिये वह आप्तोक्त (ईश्वरोक्त) है । तथा आप्तोक्त
होनेके कारण ही वेदोंका प्रामाण्य भी सिद्ध होता है ।