आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 498, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें४५६ आत्मतत्त्वविवेके
अथवा सर्गान्तरगृहीतव्याप्तिप्रादुर्भावे सुप्तप्रतिबुद्धवत् पितृत्वे-
नाविप्रलम्भकत्वमुच्चावचभूतनिर्माणदर्शनेन सार्वज्ञयमनुमायाऽऽ-
प्तत्वनिश्चयस्तस्य तेषाम् ।
यद्वा भगवान्नेव सम्प्रदायप्रवर्तनव्यसनव्यग्रः कायसहस्राणि
व्युत्पाद्यव्युत्पादकभावव्यवस्थितानि निर्माय तदातन महाजनं
परिग्राहितवान् नटोपाध्याय इव स्वयं नटित्वेति सर्वं सुस्थम् ।
पक्षत्रयेऽप्यत्र पुराणादिसंवादोऽप्यस्तीति ।
स्यादेतत्, परमेश्वरप्रवर्तितोऽयमेव वेदसंप्रदायः सर्गान्तर-
अथवा सोकर उठे हुए व्यक्तिके समान मन्वादि भी पूर्वसृष्टिमें गृहीत
व्याप्तिका स्मरण कर पितृत्वहेतुसे ईश्वरमे अविप्रलम्भकत्व (अवञ्चकत्व)
का अनुमान करते हैं। तथा अनेक प्रकारके प्राणियोंकी रचना देखकर
उसमें सर्वज्ञत्वका भी अनुमान करते हैं। क्योंकि जो जिसका पिता
होता है, वह उसके प्रति वञ्चक नहीं होता है। अतः ईश्वर भी सबका
पिता होनेके कारण वञ्चक नहीं है। एव सर्वज्ञ ही विविध रचनामे
समर्थ हो सकता है, इसलिये ईश्वर सर्वज्ञ भी है। इस प्रकार अवि
प्रलम्भकत्व और सर्वज्ञत्वका अनुमान होनेके बाद मन्वादिकों को ईश्वर
में आप्तत्वका निश्चय होता है और वे ईश्वर प्रणीत वेदोंका परिग्रह
करते हैं ।
अथवा स्वयं ईश्वर ही धर्मसम्प्रदायके सञ्चालनरूप व्यसनमे व्यस्त
होकर हजारों शरीरको व्युत्पाद्य और व्युत्पादक (शिष्य शिक्षक) के
रूपमे बनाकर (धारणकर) सर्गादिकालीन मन्वादि महाजनोंको वेदोंका
परिग्रह कराया । जैसे, कोई नाट्यविद्या का आचार्य स्वयं नाट्य कर
अन्योंको नाट्यकी शिक्षा देता है । इस प्रकार पूर्वोक्त सम्पूर्ण विषय
सुस्थिर है । इन तीनों ही पक्षोंमे पुराणादिकोंका संवाद भी है । अर्थात्
पुराणोंद्वारा भी इन तीनों पक्षोंकी पुष्टि होती है ।
यदि कहो कि-उक्त रीतियोंसे महाजनद्वारा वेदोंका परिग्रह भले ही
हो, फिर भी परमेश्वरद्वारा, सञ्चालित वर्तमान वेद सम्प्रदाय पूर्वसृष्टिगत