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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 501

अनुपलम्भवादः ४४९
कथं पुनः सुगताद्यागमेषु नादरश्छान्दसानाम् ? वेदविद्वेषि-
दर्शनान्तःपातिपुरुषप्रणीतत्वादिति मा शङ्किष्ठाः, जिनेन्द्रजग-
दिन्द्रप्रभृतिप्रणीतेष्वप्यादरात् । तत्कस्य हेतोः ? महाजन-
परिगृहीतपूर्वागमाविरुद्धतया तदनुसारित्वात् । कुतस्तर्हि ?
सिद्धप्रामाण्यवेदविरोधात् । कथं तर्हि कतिपयैरपि तत्परिग्रहः ?
अलसभीरुमृदुःषमयजात्यनुरूपधर्मविशेषात्, उदुम्बरगर्तौयतन्तुवाय-
प्रश्न—तो फिर बुद्धादिके आगमोंके प्रति वैदिकोंके अन्दर आदरकी
भावना क्यों नहीं है ?
उत्तर—यहाँ ऐसी आशङ्का मत करो कि—वेदोंके प्रति द्वेषभाव
रखनेवाले नास्तिक-दर्शनोंकी सीमामें आये हुए पुरुषों
(बुद्धादि) के द्वारा निर्मित होनेके कारण सुगतादि प्रणीत
आगमोंके प्रति वैदिकोंमे आदरभाव नहीं है—क्योंकि
जिनेन्द्र-जगदिन्द्र प्रभृति नास्तिकोंद्वारा प्रणीत आगमोंमें भी
वैदिकोंका आदर देखा जाता है ।
प्रश्न—वैसा किस कारण से है ?
उत्तर—वैसा इसलिये है कि महाजनद्वारा परिगृहीत वेदरूप पूर्व-
वर्त्ती आगमसे अविरुद्ध होनेके कारण जिनेन्द्र-जगदिन्द्र
प्रभृतिका आगम वेदानुसारी है । अर्थात् वेदानुकूल होनेके
कारण ही उक्त आगमोंमें वैदिकोंका आदर है, न कि
नास्तिक या आस्तिक नामधारी किसी पुरुषद्वारा प्रणीत
होनेके कारण ।
प्रश्न—तो फिर क्यों बुद्धादिकोंके आगमोंमें भी वैदिकोंके अन्दर
आदरभाव नहीं है ?
उत्तर—उक्त आगमोंमें आदरभाव इसलिये नहीं है कि—जिनका
प्रामाण्य सिद्ध हो चुका है, ऐसे वेदोंसे बुद्धादिके आगम
विरुद्ध हैं ।
प्रश्न—तो फिर क्यों कुछ लोगोंके द्वारा भी बुद्धादिके आगमोंका
परिग्रह किया गया है ?