आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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तथापि न सर्वो वेदार्थ एवमिति चेत्, मा भूत् । न हि
सर्वो वैद्यकार्थ एवमपि तु कश्चित् केनापि ।
एवं तर्हि सौगताद्यागमार्थोऽपि कश्चिदहिंसादिः सर्वदर्श-
नान्तःपातिभिरनुष्ठेयत एव कैश्चिदिति सोऽपि महाजनपरि-
गृहीतः स्यात्, न, सन्देहात् । किमयमहिंसादिर्वैदिक एवार्थो
बिडालव्रतन्यायेन श्रद्धाऽऽपादनाय शौद्धोदनिप्रभृतिभिरुप-
निबद्धः ? आहो स्वयं दृष्ट एवेति ? न तावत् स्वयं दृष्टः,
क्षपणकाद्यागमसाधारणत्वात् । यस्त्वसाधारणो मण्डली-
करणादिः केशोल्लुञ्चनादिर्वा, नासौ सर्वैरनुष्ठोयते । वैदिकस्तु
असाधारण एव निषेकादिस्तथेति ।
है ! क्योंकि आयुर्वेदोक्त सभी उपचारोंका अनुष्ठान सभी महाजन
नहीं करते किन्तु कोई किसीका ही अनुष्ठान करता है । वैसे ही वैदिक
विधानोंको भी समझना चाहिये ।
यदि कहो कि--ऐसे तो बौद्ध-आगमोंके अहिंसा आदि कुछ विषय
भी सभी दर्शनोंके कुछ जनोंके द्वारा अनुष्ठित होते ही हैं, इसलिये वे
भी महाजनपरिगृहीत हों—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि अहिंसा
आदिके बौद्ध आगमोक्त होनेमें सन्देह है । कारण, क्या अहिंसा आदि
वेदोक्त विषय ही बिडालव्रत-न्यायसे लोगोंमें अपने प्रति श्रद्धा उत्पन्न
करनेके लिये बुद्धदेवाद्दिके द्वारा अपने ग्रन्थमें कहा गया है ? अथवा
स्वयं प्रत्यक्ष करके ही कहा गया है ? यहाँ स्वयं प्रत्यक्ष करके बुद्धदेवने
अहिंसाका प्रतिपादन किया है, यह पक्ष नहीं हो सकता । क्योंकि
जिस क्षपणक आदिके आगमको स्वयं बुद्धदेवने भी अप्रामाणिक माना
है, उसमें भी अहिंसाका प्रतिपादन हुआ है । इससे मालूम पडता है
कि वेदोक्त अहिंसाका तत्त्व बुद्धदेवने स्वयं प्रत्यक्ष नहीं किया है । किन्तु
बेडालव्रतके समान ही क्षपणक आदिकी तरह केवल दिखानेके लिये
उसे अपनाया है । जो तो मण्डलीकरण या केशोल्लुञ्चन आदि
बौद्धादि आगमोंका अपना विशेष विषय है, उसका अनुष्ठान सभी
नहीं करते । वेदमें कहे हुए निषेक (गर्भाधान) आदि तो वेदके