आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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अपि तैः पालनीया भवन्तु । त एवेति कुतः ? संसारमोचका-
गमोऽपि तत्पालनीयः किन्न स्यादिति चेत्, न, तत्कर्तृभिस्तथा-
नभ्युपगमात्, अव्युत्पादनात्, असाधारणलिङ्गाभावात्, विरुद्ध-
लिङ्गसद्भावाच्च । न हि वेदशब्दार्थाविव सुगताद्यागमा-
साधारणशब्दार्थाननुरुध्य तेषां प्रवृत्तिर्यत एवमुन्नीयत, प्रत्युत
विरोध एव, तैस्तदप्रामाण्यव्युत्पादनात् । तस्मात् सर्वाभ्युपेत-
व्यवहारव्याकरणादिपालनीयत्वमपि वेदानामेव नान्येषाम् ।
पालन उन व्याकरणादि शास्त्रोंका मुख्य उद्देश्य भी हो, फिर भी वेद ही
उनका पालनीय है, यह कैसे माना जाय ? ससारमोचकादि आगम भी
उनका पालनीय ( उद्देश्य ) क्यों न होगा ?—तो इस प्रकारकी शङ्का
नहीं की जा सकती । क्योंकि व्याकरणादिके रचयिता पाणिनि आदिके
द्वारा ससारमोचकागममे प्रतिपादित शब्द एव अर्थका अभ्युपगम नहीं
किया गया है। क्योंकि उनके द्वारा जैसे वैदिक पदोंका व्युत्पादन
किया गया है, वैसे बौद्धादि आगमोंके पदोंका व्युत्पादन नहीं किया गया
है। क्योंकि व्युत्पादित किये जानेका जो असाधारण लिङ्ग है, वह
उनमें नहीं है । अर्थात् वैसे पद उन आगमोंमे प्रयुक्त होते जो भाषामें
प्रयुक्त नहीं हैं, तब वे पद ही उनके असाधारण लिङ्ग होते और उनका
भी व्युत्पादन व्याकरणादिका उद्देश्य माना जाता, किन्तु वैसा है नहीं ।
बल्कि व्युत्पादनके विरोधी लिङ्ग ही ससारमोचकागमोंमें विद्यमान हैं ।
क्योंकि जैसे वेदमें असाधारण शब्द एव अर्थ हैं, वैसे सौगतादि आगमों
में असाधारण शब्द एव अर्थ नहीं हैं, जिनके अनुरोधसे मुनियोंकी
प्रवृत्ति होती और उनके द्वारा व्युत्पादन किये जानेकी कल्पना की
जाती । बल्कि अनुरोधकी जगह विरोध ही पाया जाता है । क्योंकि
मुनियोंने उन आगमोंके अप्रामाण्यका ही व्युत्पादन किया है । इस
प्रकार सिद्ध होता है कि सर्व स्वीकृत है व्यवहार जिसका, ऐसे व्याकर-
णादिके द्वारा वेदका ही पालन लक्ष्य है न कि सौगतादि आगमोंका ।
यह द्वितीय प्रकारका महाजनपरिगृहीतत्व है ।