आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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यथा भविष्यन् विश्रमर्गं उच्छेदपूर्वकस्तथाऽयमपीति । समय-
नियमस्तु प्राणिनां कर्मवैषम्येऽपि वर्षादिनियमवदुदयास्तनियमवद्
वा द्रष्टव्यः, कर्मणामेवैवंस्वभावत्वात् । एतदर्थमेव हि पुराणेषु
सृष्टिप्रलययोर्दिवसरात्रिव्यवहारः ।
तथापि सर्वप्राणिनाशयौगपद्ये किं प्रमाणमिति चेत्, द्वि-
सप्तभौमभुवनप्रासादभङ्गेऽपि निर्भया एव ग्रामकुटीहट्टविहारिणः १
हो जानेसे कर्मप्रवाहका निरोध भी नहीं हो सकेगा । अर्थात् मुक्ति
भी असम्भव हो जायगी । क्योंकि प्रारब्धकर्मोंका भोगद्वारा ही नाश
होगा तथा अन्य कर्मोंका तत्त्वज्ञानसे । अतः मोक्षोपयोगी भोग और
तत्त्वज्ञानके साधनके लिये प्रलयोत्तर पुन सृष्टि अनिवार्य है ।
यहाँ प्राणियोंके कर्मोंके विपाकका समय यद्यपि भिन्न भिन्न होता है,
फिर भी ब्रह्माकी आयुके सौ वर्ष काल बीतनेपर प्रलय होनेका जो नियम
है, वह तो वर्षाकाल आदिके नियमके समान अथवा सूर्योदय सूर्यास्त
काल (दिन रात) के नियमके समान है, ऐसा जानना चाहिये । अर्थात्
जैसे, वर्षा आदि ऋतुओंके जनक कर्म एक नियत अवधिके बाद ही
वर्षादिकालको उत्पन्न करते हैं, न कि कभी घण्टा प्रहर आदिके बाद
और कभी वर्ष दो वर्ष आदिके बाद । एव जैसे, दिन और रात नियमवत
होती है, वैसे ही सृष्टि और प्रलयके जनक कर्म भी ब्रह्माकी आयुके
हिसाबसे सौ सौ वर्ष बीतने पर ही सृष्टि और प्रलयको नियमवत उत्पन्न
करते रहते हैं । क्योंकि कर्मोंका ही ऐसा स्वभाव है कि सुषुप्ति अवस्था
के समान उन सबोंकी वृत्ति एक साथ निरुद्ध हो जाती है । इसीलिये
पुराणोंमें सृष्टि और प्रलयका दिन और रातके रूपमें व्यवहार किया
गया है ।
यदि कहो कि-कुछ प्राणियोंके कर्मका एकसाथ निरोध और
प्राकट्य भले ही हो किन्तु सभी प्राणियोंका एकसाथ नाश होनेमें क्या
प्रमाण है ? तो चौदह कोठों वाले भुवनरूपी महलके ध्वस्त हो जानेपर
भी गाँवकी कुटिया एवं हट्ट (झापड़ी) में विहार करनेवाले शरीरधारी
१. ग्रामटीहट्टकुटीविहारिण इति २ पु० पा० ।