आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुपलम्भवादः ४४३
पर्वता अपि चूर्णीभविष्यन्ति, पार्थिवत्वात्, घटवत् । समुद्रा अपि
शोषमेष्यन्ति, जलाशयत्वात्, स्थलीपल्वलवत् । सूर्योऽपि निर्वा-
स्यति, तैजसत्वात् प्रदीपवत् । ब्रह्मापि प्रैष्यति, शरीरित्वात्,
अस्मदादिवदित्यागमाविरोधेनानुमीयताम् ।
स्यादेतत्, भविष्यन्नुच्छेदोऽनुमितः । न तु भूतोऽपीति
कुत इति चेत्, यत एव १ उच्छेदानन्तरं पुनः सर्गेण भाव्यम् ।
अन्यथा संसारिणां कृतहानप्रसङ्गात् । न हि विश्वनिर्माणमन्तरेण
भोगज्ञानयोः सम्भवः । न च तेन विना कर्मप्रवाहसंरोधः । ततो
ही-पर्वत भी चूर्ण हो जायेंगे, पार्थिव अर्थात् पृथिवीसमवेत द्रव्य होनेके
कारण, घटके समान । समुद्र भी सूख जायेंगे, जलाशय होनेके कारण,
पोखरोंके समान । सूर्य भी बुझ जायगा, तैजस अर्थात् तेजःसमवेत द्रव्य
होनेके कारण, प्रदीपके समान । तथा ब्रह्मा भी मरेंगे, शरीरधारी होनेके
कारण, हम लोगोंके समान । इस प्रकार आगमानुसार अनुमान कर लें ।
शङ्का—अस्तु, पूर्वोक्त हेतुओंसे कार्य जगत्के भावी उच्छेदका
अनुमान हुआ । किन्तु भूतकालमें भी उच्छेद था, यह कैसे सिद्ध होगा ?
अर्थात् यदप्रवाहके अनादि होनेसे ही वह महाजनपरिगृहीत क्यों न है ?
समाधान—इसलिये कि उच्छेदके बाद पुनः सृष्टि होनी चाहिये ।
अन्यथा संसारियोंके लिये कर्मोंकी हानि अर्थात् निष्फलता हो जायगी ।
तात्पर्य यह है कि वर्तमान सृष्टिमें जो कर्म प्राणियोंने किये हैं, वे
निष्फल हो जायेंगे, यदि भविष्यमें सृष्टि न हो । अतः वर्तमान सृष्टिके
बाद प्रलय होने पर पुनः सृष्टिका होना अनिवार्य है । इसी प्रकार यह
वर्तमान सृष्टि भी पूर्वप्रलयके बाद हुई है तथा उस प्रलयके पूर्वकी
सृष्टि भी उसके पूर्ववर्ती प्रलयके बाद हुई थी । इस प्रकार यह सृष्टि
और प्रलयका प्रवाह अनादि ही सिद्ध है ।
यदि प्रलयके बाद पुनः सृष्टि न हो तो कर्मोंके फलस्वरूप सुखदुःख-
साक्षात्काररूप भोग तथा तत्त्वज्ञान नहीं हो सकेंगे । इस प्रकार कृतहान-
दोषकी प्रसक्ति हो जायगी । एवं भोग और ज्ञान इन दोनोंके असम्भव
१. अत एव यत इति क्वचित् पाठः ।