सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 492, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 492

८० आत्मतत्त्वविवेके

पायमविदुषोऽननुष्ठाने तदा ( भाव ) भासानुष्ठाने वाऽसर्वज्ञस्योप-
देशो विप्रलम्भ एवेति ।
तत्र न प्रथमः, वेदपरम्पराऽनुपलम्भात्, अर्वाचीनानां पाठ-
पारतन्त्र्यमात्रेण प्रवाहोपपत्तौ तत्कल्पनायां प्रमाणाभावात् ।
नापि द्वितीयः, वेदह्रासदर्शनात् । यत इदानीमश्रूयमाणस्यापि
बातको नहीं जाननेवाले उस असर्वज्ञ व्यक्तिद्वारा यागादिके अननुष्ठान
का उपदेश देना अथवा मण्डलीकरण केशोल्लुञ्चन प्रभृति सुखके उपाया-
भासोंके अनुष्ठानका उपदेश देना संसारको ठगना ही है । क्योंकि अर्थ-
निर्णय किये बिना ही स्वकपोलकल्पित ऐसा उपदेश दिया गया है ।
अर्थात् उक्तप्रकारका वञ्चनात्मक उपदेश महाजनपरिग्रहका विषय नहीं
हो सकता है ।
महाजनपरिग्रहके प्रति सम्भावित पूर्वोक्त तीन हेतुओंमें प्रथम हेतु
नहीं हो सकता है । क्योंकि पूर्वपूर्वागमपूर्वकत्व-हेतुमें “पूर्वपूर्वागम”
पदसे विजातीय वेदपरम्परा विवक्षित हो तो वैसी वेदपरम्परा प्रत्यक्ष-
प्रमाणसे सिद्ध नहीं है । यदि अनुमानद्वारा वर्तमान वेदके मूलके
रूपमें विजातीय वेदपरम्पराकी कल्पना करो तो यह संभव नहीं है ।
क्योंकि जैसे अर्वाचीन ( वर्तमान ) वेदोंका प्रवाह गुरु-शिष्यके केवल
क्रमिक पाठके द्वारा सजातीय प्रवाह ही चल रहा है, न कि शिष्यद्वारा
पढे जानेवाले वेदका मूल गुरुद्वारा पढा जानेवाला कोई विजातीय वेद
होता है । वैसे ही परम्परागत पाठके द्वारा सजातीय वेद परम्पराको
वर्तमान वेदके मूलके रूपमें कल्पना करना अप्रामाणिक है ।
प्रबाहनित्यत्वरूप द्वितीय पक्ष भी नहीं हो सकता है । अर्थात्
“प्रवाहरूपसे वेद नित्य है, इसलिये यह महाजनपरिगृहीत है” यह
पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि वेदका ह्रास देखे जानेसे वेदप्रवाह नित्य
नहीं हो सकता । कारण, जो वेदभाग इस समय उपलब्ध नहीं है,
उसके विषयका भी अनुष्ठान देखा जाता है तथा मनु आदि स्मृतिकारोंने
उस विषयको भी अपनी स्मृतियोंमें निबद्ध किया है । अर्थात् होलाका
( होली ) करनी चाहिये—इसका सूचक वेदभाग यद्यपि अनुपलब्ध है,
फिर भी उसका अनुष्ठान सर्वजन-प्रसिद्ध है । तथा अष्टकनामक याग