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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 490, कुल 530 में से

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पृष्ठ 490

४३८ आत्मतत्त्वविवेके

यथा हि पूर्वविरुद्धपूर्वव्याकरणादिवैद्यकादिषु विगानाद-
परिग्रहः, तथा तथाविधे धर्मशास्त्रेऽपि । व्यामोहाद् भवन्नपि
कस्यचिदेव न तु सर्वेषाम् । अथ पूर्वाविरुद्धं चेत्, तथापि
पूर्वस्य पूर्ववदपरिग्रहे केनचित् परिग्रहे वा कथं तन्मूलस्यान्यस्य
सर्वैः परिग्रहः ?
न च नासीदेव पूर्वं धर्मशास्त्रम्, मानान्तरस्यात्र वस्तुनि

असर्वज्ञ प्रणीत होनेपर असम्भव हैं, इसलिये वेदोंमे सर्वज्ञपूर्वकत्वका
निश्चय होता है।
इसमे तर्क यह है कि जैसे पूर्ववर्ती व्याकरणादिसे विरुद्ध नवीन
व्याकरणादि एव वैद्यक आदिके निन्दित होनेके कारण वे महाजनद्वारा
परिगृहीत नहीं होते, वैसे पूर्वसे विरुद्ध नवीन धर्मशास्त्र भी निन्दित
होनेसे महाजनपरिगृहीत नही होता है। अर्थात् विवादका विषय
वेदरूप धर्मशास्त्र यदि सर्वज्ञपूर्वक (ईश्वरप्रणीत) नहीं होता तो वह
उक्त तीनों ही प्रकारके महाजनपरिग्रहका विषय नहीं होता। जैसे
कि आधुनिक व्याकरण वैद्यक आदि सर्वज्ञपूर्वक नहीं होनेके कारण
महाजनपरिग्रहका विषय भी नहीं होता है।
यदि उस पूर्वविरुद्ध संसारमोचकादि धर्मशास्त्रके प्रति अज्ञानतावश
परिग्रह होता भी है तो किसीको ही होता है न कि सबको। अर्थात्
वेद सभी महाजनोंद्वारा परिगृहीत है, इसलिये वेदका परिग्रह अज्ञान-
पूर्वक नहीं हो सकता है। यदि संसारमोचकादिकोंका या सुगतोंका
धर्मशास्त्र (आगम) पूर्ववर्ती धर्मशास्त्रसे अविरुद्ध हो तो भी उसका वह
पूर्ववर्ती धर्मशास्त्र स्वयं यदि महाजन परिगृहीत न हो या किसी एकके ही
द्वारा परिगृहीत हो तो तन्मूलक सुगतादिका धर्मशास्त्र सबके द्वारा परि-
गृहीत कैसे हो सकेगा ? अर्थात् सौगतोंको भी उस पूर्ववर्ती धर्मशास्त्रको
अवश्य ही महाजनपरिगृहीत मानना होगा। इस प्रकार वह पूर्ववर्ती
धर्मशास्त्र हमारा वेद ही है, जो महाजनपरिगृहीत होनेके कारण सर्वज्ञ
पूर्वक (सर्वज्ञप्रणीत) सिद्ध हो जाता है।
यह नहीं कह सकते कि—वेदरूप कोई पूर्ववर्ती धर्मशास्त्र था ही