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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 530 में से

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पृष्ठ 494

दृष्टायुपेतपदकदम्बादन्यद् वाक्यं नामेति गुरुरपि लघुरेव ।
तस्मात् पुरुषाणामनुष्ठानशक्तिवत् अध्ययनशक्तिरपि युग-
क्रमेणापचीयते, ततो वेदानां शाखोच्छेदः, तदर्थानामन्ष्ठानो-
च्छेदः, वर्णाश्रमाचारव्यवस्थाविप्लवश्चेति ।
अतएव भगवतो व्यासस्य पुरुषशक्त्यपचयमपेक्ष्य वचनानि
“अल्पायुषो ऽल्पसत्त्वा” इत्यादीनि । वेदोच्छेदसवेक्ष्य “प्रति-
मन्वन्तरं चैषा श्रुतिरन्या विधीयते” इत्यादीनि । अनुष्ठानो-
त्सादमवेक्ष्य “दानमेकं कलौ युगे” इत्यादीनि । आचारविप्लव-
मवेक्ष्य “प्रजास्तत्र भविष्यन्ति शिरनोदरपरायणाः” इत्यादीनि ।
तथा च श्रूयमाणा अपि वेदा उच्छेदमुपयास्यन्ति, वेदत्वाद्
वाक्यत्वाद् वा, उच्छिन्नशाखावदिति न्यायात् । यथा चैतत् तथा
आश्रय भी नहीं होता । अतः पूर्वोक्त रीतिसे वेदको नित्यानुमेय
प्रतिपादित करनेवाले गुरु 'प्रभाकर' भी वस्तुत लघु ही हैं ।
इसलिये पुरुषोंकी अनुष्ठान-शक्तिके समान अध्ययनशक्ति भी युग-
क्रमके अनुसार क्षीण होती है और अध्ययन-शक्तिके क्षीण होनेके कारण
वेदकी शाखाओंका उच्छेद, उसके विधियोंके अनुष्ठानका उच्छेद तथा
वर्णाचार एवं आश्रमसम्बन्धी आचारोंकी व्यवस्था भी छिन्न-भिन्न हो
जाती है। इसीलिये पुरुष-शक्तिके ह्रासकी दृष्टिसे भगवान् व्यासके
"अल्पायुषोऽल्पसत्त्वाः" इत्यादि वचन हैं। वेद सम्प्रदायके ह्रासकी
दृष्टिसे "प्रतिमन्वन्तर चैषा श्रुतिरन्या विधीयते" इत्यादि वचन हैं।
अनुष्ठान ह्रासकी दृष्टिसे "दानमेकं कलौ युगे" इत्यादि वचन हैं।
तथा आचारोंके ह्रासकी दृष्टिसे "प्रजास्तत्र भविष्यन्ति शिरनोदर-
परायणाः" इत्यादि वचन हैं।
इस प्रकार जो वेद आज श्रूयमाण (प्रत्यक्ष) हैं, वे भी उच्छिन्न हो
जायेंगे, वेद होनेके कारण या वाक्य होनेके कारण, पूर्वमें उच्छिन्न
वेदकी शाखाओंके समान—यह अनुमान उच्छेदमें प्रमाण है। एवं, जैसे
भविष्यमें वेदोंका उच्छिन्न हो जाना अनुमान-प्रमा...