आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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अपि च वाचकापभ्रंशविभागोऽस्तु न वा, तद्व्यवहार-
स्तावत् सर्वैरेव तीर्थिकैरविगानेन स्वीकृतः । तथा शिक्षा-
ज्योतिषच्छन्दोनिगमनिरुक्ताद्यर्थश्च । तेषां च वेदरक्षैव परमं
प्रयोजनमिति ।
स्यादेतत्, व्याकरणादीनि तावत् सर्वैरभ्युपगतार्थानि, वेदा
अपने विशेष विषय हैं, जिनका सभी महाजन अनुष्ठान करते हैं।
इसप्रकार महाजनद्वारा वैदिक विधानोंका अनुष्ठान होनेसे वेदोंका
सर्वज्ञ-प्रणीत होना सिद्ध होता है ।
एवं वाचकशब्द और अपभ्रंशात्मक शब्दका विभाग भले ही
व्याकरण द्वारा न हो सकता हो, क्योकि “गां गृहाण” इत्यादिमें वाचक-
भूत गो-प्रकृति और अम्-प्रत्यय तथा ग्रह्-प्रकृति एव सिप्-प्रत्यय इनमेंसे
कोई भी नहीं है किन्तु विकार या आदेश बन गया है। लोप स्थलमें
तो मूलशब्दका पता भी नहीं रहता, फिर भी उन स्थलोंमें व्याकरणद्वारा
परिकल्पित प्रकृति-प्रत्यय और आगमादिको व्याकरणद्वारा ही सभी
जानते और “गां गृहाण” आदिका अर्थ समझते हैं। इस प्रकार
व्याकरणका व्यवहार सभी दार्शनिकोंने श्रद्धापूर्वक स्वीकार किया है।
तथा उस सर्व-स्वीकृत व्याकरणने ‘बहुल छन्दसि’ इत्यादि सूत्रोंके द्वारा
“भद्रं कर्णेभि” इत्यादि वेदोक्त पदोंका ही साधन किया है न कि
बौद्धादि-आगमोक्त पदोंका। बल्कि व्याकरणके व्याख्याता महाभाष्य-
कारादिने सौगत आगमोंका अप्रमाण ही प्रतिपादित किया है।
एवं, वेदाङ्गभूत शिक्षा, ज्योतिष, छन्द, निगम और निरुक्तादिद्वारा
कथित अर्थका भी सभी तीर्थिकोंने स्वीकृत किया है। तथा प्रकृति-
प्रत्ययके व्यवहारको बतानेवाले व्याकरण और वेदोक्त अर्थोंको स्फुट
करनेवाले शिक्षादिका भी मुख्य प्रयोजन वेदोंकी रक्षा ही है। अर्थात्
वेदार्थोंका निश्चय करना और उनका अनुष्ठान किया जाना इसी मुख्य
प्रयोजनके उद्देश्यसे पाणिन्यादि मुनियोंने व्याकरण शिक्षा आदिकी
रचना की है। यदि वेद अप्रमाण होते तो उनके अर्थोंके निर्णयार्थ एवं
अनुष्ठानार्थ उन उन शास्त्रोंकी रचना ही मुनिगण नहीं करते ।
अस्तु, व्याकरणादिके विषय सभीके द्वारा स्वीकृत हों, तथा वेदोंका