आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुपलम्भवादः ४३७
सर्वाभ्युपेतप्रामाण्यैरायुर्वेदादिभिः स्वीकृतश्चैषामर्थः, प्रतिपदं
तदीयशान्तिकपौष्टिकप्रायश्चित्ततपोजपदानहोमाद्युपदेशात् ।
न चैष भागस्तत्राप्रमाणमेव, तुल्ययोगक्षेमत्वात् । एतदेवा-
सिद्धम्, प्रक्षेपस्यापि सम्भवादिति चेत्, न, अध्येतृऽध्यापयितृ-
संप्रदायाविच्छेदात् ।
“अन्यथाकरणे चास्य बहुभ्यः स्यान्निवारणम्”
इति न्यायात् ।
तस्मादेवंरूपोऽपि महाजनपरिग्रहो वेदानामिति । सोऽयमी-
दृशो महाजनपरिग्रहोऽसर्वज्ञपूर्वकत्वेऽसंभवन् सर्वज्ञपूर्वकत्वेन
व्याप्यते ।
एवं, सभीने जिसका प्रामाण्य माना है, ऐसे आयुर्वेदादिके द्वारा
भी वैदिक विषय स्वीकृत किया गया है। क्योंकि पद-पदपर वेदोक्त
शान्तिक, पौष्टिक, प्रायश्चित्त तप, जप, दान और होम आदिका उपदेश
पाया जाता है। यह नहीं हो सकता कि—आयुर्वेदका यह शान्तिक
पौष्टिकादि भाग अप्रमाण ही है—क्योंकि आयुर्वेदके सम्पूर्ण भागों
का समान योगक्षेम है। अर्थात् आयुर्वेदका जैसे औषधवाला भाग
प्रमाण है, वैसे ही शान्तिकादि भाग भी प्रमाण होगा, क्योंकि वह
भी उसीका भाग है। अन्यथा औषधवाला भाग भी प्रमाण नहीं हो
सकेगा।
यदि कहो कि—आयुर्वेदमे शान्तिकादि भाग प्रक्षिप्त हो सकते हैं,
अतः तुल्य योगक्षेमत्व ही असिद्ध है—तो यह नहीं हो सकता है।
क्योंकि उसके पढ़ने और पढ़ानेवालेका सम्प्रदाय कभी टूटा नहीं है,
इसलिये प्रक्षेपकी संभावना ही नहीं है। क्योंकि “अन्यथाकरणे चास्य
बहुभ्यः स्यान्निवारणम्” इस कुमारिलभट्टोक्त न्यायके अनुसार सर्वत्र
प्रक्षेपकी आशङ्का होने लगेगी। और तुम्हारे आगममें भी तुम्हें प्रक्षेप
मानना पड़ जायगा। इसलिये इस तृतीय प्रकारका महाजनपरिग्रह
भी वेदोंमें है। अतः पूर्वोक्त दोनों ही प्रकारके महाजनपरिग्रह वेदोंके