आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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शरीरिण इति महती प्रेक्षा । तस्मात् सर्गादिमहाजनमन्वादि-
परिग्रहपूर्वकोऽयमद्याप्यनुवर्तत इति नानवमरदोषावकाशोऽ-
पीति युक्तमुत्पश्यामः ।
तदेवं कथं मन्वादिभिः परिगृह्यन्तां वेदा इति चेत्, आयुर्वेद-
वदाप्तोक्तत्वनिश्चयात् । स एव कुत इति चेत्, अध्यक्षतः, तेषाम-
प्यतीन्द्रियार्थदर्शित्वात् । तादृशां तेषां तत्परिग्रहेण किं प्रयोजन-
मिति चेत्, अस्मद्व्यवहारेणास्मदपत्यादि व्युत्पद्यताम्, तथा च
धर्मसंप्रदायः प्रवर्ततामिति भूतदया स्वाधिकारसम्पादनं च ।
जीव निर्भय ही हैं—यह आपकी अच्छी सूझ है । इसलिये सृष्टिके
आदिमें वेदोंके प्रणयनकालमे ही ईश्वरके द्वारा मनु आदि मानस
महाजन भी उत्पन्न किये गये और उन्हींके द्वारा पहिले वेदोंका परिग्रह
हुआ, जो आजतक चला आ रहा है । अतः "महाजनके अभावमें
महाजनद्वारा परिग्रहका अवसर ही कहाँ है !" इस दोषका भी अवकाश
नहीं है । अत हमारा यह विचार युक्त है ।
यदि कहो कि—सृष्टिके आदिकालमे मनुपभृति महाजन भले ही हों,
फिर भी उस समय उनके द्वारा परिग्रह कैसे हुआ ?—तो इसलिये कि
जैसे आप्तोक्तत्वके निश्चयसे आजकल हम लोग आयुर्वेदका परिग्रह
करते हैं, वैसे ही उस समय मनु आदिने वेदोंमे आप्तोक्तत्वका निश्चय
होनेसे उनका परिग्रह किया । यदि कहो कि—उन्हें वेदोंमें आप्तोक्तत्व-
का निश्चय ही कैसे हुआ ?—तो यही उत्तर है कि "प्रत्यक्षसे"। क्योंकि
वे भी अतीन्द्रिय विषयोंके द्रष्टा थे । यदि पूछो कि—वेदोंके परिग्रहसे
उनका क्या प्रयोजन था ?—तो यही कि हमारे वेदार्थानुष्ठानरूप
व्यवहारसे हमारे पुत्रादि भी परिचित होकर वैसा अनुष्ठान करें और
उनकी देखादेखी अन्य लोग भी वैसा अनुष्ठान करें । इस प्रकार लोकमे
धार्मिक सम्प्रदाय चालू हो-ऐसी भूतानुकम्पा तथा अपने अधिकारका
पालन ही उनका प्रयोजन था । अर्थात् सर्गादिकालमें मन्वादिकने
लोककल्याणकी भावनासे वेदार्थानुष्ठान ( वेदपरिग्रह ) किया । तथा
इसलिये भी वैसा किया कि ईश्वरने ही वेदोंका निर्माण कर उनके परि-
ग्रहार्थ मनु आदिको अधिकारी बनाया था ।