आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
३१६ आत्मतत्त्वविवेके
मात्र¹विप्लवो भवेत् । तथा च न्यायरुचिः प्रेक्षावान् न
तत्त्वमधिगच्छेदिति भियेति ॥
॥ इति बाह्यार्थभङ्गवादः ॥
जायगा और मननका आधारभूत प्रमाणमात्र ही विलुप्त हो जायगा ।
तथा श्रवणके बाद मनन करनेकी इच्छावाले बुद्धिमान् जन तत्त्वज्ञानको
नहीं प्राप्त कर सकेंगे ।
। इति बाह्यार्थभङ्गवादनिरास ।
१ 'न्यायमार्गविप्लवो इति १ पु० पा०
अथ गुणगुणिभेदभङ्गवादः
अस्तु तर्हि गुणगुणिनोरभेदान्नैरात्म्यम्, क्षणिकज्ञान-
मात्रपरिशेषादिति चेत्, उच्यते । अस्ति तावदिह दर्शन-
स्पर्शनाभ्यामेकार्थानुसन्धानम् । तदिदमेकैकविषयं वा स्यात् १
गुणगुणिभेदभङ्गवाद खण्डन
पूर्वपक्ष—यदि क्षणभङ्गवादके आधारपर अथवा बाह्यार्थभङ्गवादके
आधारपर नैरात्म्य नहीं हो सकता तो गुण और गुणीमे अभेदके कारण
ही नैरात्म्यकी सिद्धि हो जायेगी। अर्थात् गुणसे अतिरिक्त गुणीकी
सत्ता ही नहीं है। अतः ज्ञानरूप गुणसे भिन्न कोई गुणी भूत आत्मा
नहीं है। यही नैरात्म्यवादका अभिप्राय है। एव, स्वयंप्रकाश क्षणिक
विज्ञानोंके अलावा वेदान्तियोंके नित्यविज्ञानमें भी कोई प्रमाण नहीं है।
इसलिये क्षणिकविज्ञानको ही आत्मा कह सकते हैं। उससे अतिरिक्त
ज्ञानादिका आधारभूत आत्मा नहीं है, यह पर्यवसित हुआ।
समाधान—दर्शनक्रिया और स्पर्शनक्रियाके द्वारा एक ही वस्तुकी
उपलब्धि होती है, यह बात हम व्यवहारमें पाते हैं। जैसे, पहले देखकर
हम कहते है "यह घट है" वैसे ही बादमें छू कर भी कहते हैं कि "यह
घट है"। इससे सिद्ध होता है कि ज्ञानरूप-गुणसे भिन्न दर्शन स्पर्शन-रूप
उभयविध ज्ञानोंका आश्रयभूत एक अतिरिक्त आत्मा है। क्योंकि यदि
ज्ञान ही आत्मा होता तो वहा दो प्रकारका ज्ञान होनेसे आत्मा भी दो
होता। क्योंकि वहां एक आत्माने देखा और दूसरेने स्पर्श किया। ऐसी
स्थितिमें दूसरेके देखनेका प्रतिसन्धान दूसरेको नहीं हो सकता। अत
"जिसे मैंने देखा उसे ही मैं छू रहा हूँ" इस प्रकारका वस्तुकी एकताका
भान यहां नहीं होता। अतिरिक्त आत्मा माननेपर तो ज्ञानोंमे भेद
होनेपर भी चूँकि स्थायी आत्मा एक है, इसलिये वही दर्शनकालमें भी
था और स्पर्शनकालमें भी है। अत उसे यह प्रतिसन्धान (प्रत्यभिज्ञा)
हो सकता है कि जिसे देखा था उमे अभी छू रहा हूँ।
यह जो दर्शन-स्पर्शनरूप भिन्न क्रियाओंके द्वारा एक वस्तुका ग्रहण
३१८ आत्मतत्त्वविवेके
समुदायविषयं वा ? तदतिरिक्तविषयं वा ? वस्त्वनुरोध्याकार-
विषयं वा ? अलीकविषयं वा ?
न तावदाद्यः, न हि यदेव रूपं तदेव स्पर्श इति । न
च रूप त्वगिन्द्रियग्राह्यम् , अन्धस्यापि नीलादिप्रत्ययप्रस-
ङ्गात् । न चैकमेव वस्तु करणभेदेनान्यथा प्रथत इति युक्तम् ,
अनात्मकत्वप्रसङ्गात् , भेदाभेदव्यवस्थानुपपत्तेश्च ।
होता है, उसके सम्बन्धमें पूछना है कि यह चाक्षुष और स्पार्शन प्रत्यक्ष
केवल रूपको या केवल स्पर्शको विषय बनाता है ? अथवा रूप और स्पर्श
दोनोंके समुदायको ? अथवा इन दोनोंसे अतिरिक्त अवयवी को ? अथवा
वस्तुसे रहित ज्ञानका आकारविशेष वहा भासित होता है ? या शश-
शृङ्गवत् अलीकको विषय बनाता है ?
इनमें प्रथम कल्प नहीं हो सकता है । क्योंकि जो ही रूप है, वही
स्पर्श नहीं है, जिससे कि चाक्षुष और स्पार्शन उभयविध प्रत्यक्षावस्था-
में केवलरूपका ही या केवल स्पर्शका ही भान हो सके ! क्योंकि रूप
त्वगिन्द्रियका विषय नहीं है और स्पर्श चक्षुरिन्द्रियको विषय नहीं है ।
यदि वैसा होता तो अन्धेको भी नीलपीतादिका ज्ञान हो जाता और
दूरसे किसी वस्तुके शुक्लादिरूपके ग्रहणकालमे बिना छुये नेत्रसे ही
उसके उष्णत्व आदि का भी ज्ञान हो जाता ।
यह भी ठीक नहीं है कि—एक ही वस्तु इन्द्रियभेदसे भिन्न स्वरूपमें
भासित होती है । अर्थात् एक ही वस्तु चक्षुरिन्द्रियके द्वारा रूपत्वेन
और त्वगिन्द्रियके द्वारा स्पर्शत्वेन भासित होती है—क्योंकि रूपत्व और
स्पर्शत्व परस्पर विरोधी धर्म हैं, वे एक वस्तुमें साथ रह नहीं सकते,
बारी बारीसे रहेंगे—इसका कोई नियामक नहीं है । इसप्रकार उभय-
स्वरूपसे रहित होकर वह वस्तु शून्यात्मक हो जायगी । एव, यदि
परस्पर विरोधी धर्म एक जगह रहे तो वह धर्मी भी भिन्न हो जायगा ।
फिर भी यदि धर्मी अभिन्न ही रहे तो ससारसे भेदमात्रका उच्छेद हो
जायगा और भेद-अभेदकी व्यवस्था ही समाप्त हो जायगी ।
गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३१९
नापि द्वितीयः, स हि एकदेशतया वा ? एककालतया
वा ? एककार्यतया वा ? एककारणतया वेति ?
न तावदुपादानरूपैकदेशसंभव, तयोः प्रतिनियतोपादा-
नत्वात् । संभवे वा तदेव द्रव्यमिति पर्यवसितं विवादेन ।
नाप्यधिकरणीभूतभूतलाद्याधारतया तत्संभवः, चक्षुषा ह्युपल-
भ्यमाने भूतले रूपविशेषे घटोऽपि चक्षुषैवोपलभ्यमानो रूप-
विशेषस्तदाधार इति शक्यते निश्चेतुम्, तयोरधरोत्तरभावे-
यह भी नहीं हो सकता कि—उक्त दर्शन-स्पर्शन क्रियाद्वारा एक अर्थ
के ग्रहणका अभिप्राय है "रूप और स्पर्शके समुदायका ग्रहण" अर्थात्
उक्त प्रतीतियोंमें रूप और स्पर्शका समुदाय ही विषय बन रहा है-कारण,
यहाँ रूप और स्पर्शका समुदाय बन ही नहीं सकता है । क्योंकि वह
समुदाय उपादानरूप एकदेशके कारण होगा ? या एक कालके कारण ?
या उपादेयरूप एक कार्यके कारण होगा ? अथवा एक समुदाय इसलिये
होगा कि रूप और स्पर्श दोनोंका एक ही कारण है।
इन कल्पोंमें प्रथम कल्प कि—उपादानरूप एकदेशके कारण रूप-
स्पर्शका एक समूह बन जायगा--नहीं हो सकता । क्योंकि दोनोंके
भिन्न भिन्न उपादान नियत हैं । अर्थात् तुम्हारे मतमें रूपका रूप ही
और स्पर्शका स्पर्श ही उपादान होता है, अत दोनोंका एक उपादान
असंभव है । यदि दोनोंका एक उपादान मेरे ही समान तुम्हारे मतमें
भी हो तो फिर वही गुणी द्रव्य सिद्ध हो गया । इस प्रकार गुणातिरिक्त
गुणी होनेमे विवाद ही समाप्त हो गया ।
यदि कहो कि-एक उपादानके कारण नहीं, किन्तु भूतलादिस्वरूप
एक अधिकरणके कारण रूप और स्पर्शका एक समुदाय बन जायगा--तो
यह भी नहीं संभव है । क्योंकि तुम्हारे मतमें गुणातिरिक्त गुणी नहीं
होनेसे चक्षुद्वारा उपलभ्यमान भूतल पृथक् गुणी न होकर रूपविशेष है,
और उसपर चक्षुद्वारा उपलभ्यमान घट भी पृथक् गुणी न होकर रूप-
विशेष ही है । इसप्रकार "रूपविशेषात्मक भूतलमें रूपविशेषात्मक घट
आश्रित है" इसका निश्चय चक्षुद्वारा कर सकते है, क्योंकि आश्रयाश्रयि-
३२० आत्मतत्त्वविवेके
नैकज्ञानसंसर्गित्वात्, तदधिकरणाः स्पर्शादयोऽपीति तु कस्य
प्रमाणस्य विषयः ? न हि स्पर्शादयश्चाक्षुषे चेतसि चकासति ।
त्वचोऽय व्यापार इत्यपि नास्ति, तथापि भूतलघटस्पर्शयो
राधाराधेयभावप्रतीते ।
न च समुदाययोस्तत्संभवः, परस्पराश्रयत्वप्रसङ्गात् ।
एकाधारतायां हि समुदायानुसन्धान समुदायानुसन्धाने
चैकाधारतानुसन्धानसम्भव इति । अनवस्थाप्रसङ्गाच्च, भूतल
भावसे दोनों ही एक चाक्षुष ज्ञानमें संपृक्त हैं। किन्तु "उसी भूतल-
रूप अधिकरणमे स्पर्शादि भी है" यह किस प्रमाणसे जान सकोगे ?
क्योंकि चाक्षुषज्ञानमे स्पर्शादिका भान हो ही नहीं सकता है। अत
भूतलरूप एकाधिकरणको लेकर रूप स्पर्शका एक समुदाय नहीं बन
सकता है।
यदि कहो कि-स्पर्शका भान त्वचाका व्यापार है-तो इससे भी
काम नहीं चलेगा। क्योंकि त्वचाके द्वारा भी भूतल और घटके स्पर्श
का ही अर्थात् स्पर्शविशेषात्मक भूतल और स्पर्शविशेषात्मक घटका ही
परस्पर आधाराधेयभाव प्रतीत होगा, न कि उनके रूपोंका भी। क्योंकि
रूपग्रहणमे त्वचा असमर्थ है। इसप्रकार पुनरपि रूप स्पर्शका एक
समुदाय नहीं बन सका।
यदि कहो कि-रूप स्पर्शादिका समुदायात्मक भूतल एव रूप
स्पर्शादिका समुदायात्मक घटमें परस्पर आधाराधेयभाव बन जायगा-
तो यह भी सम्भव नहीं है। क्योंकि तब अन्योन्याश्रयदोषका प्रसङ्ग हो
जायगा। कारण, एकाधारताकी प्रतीति होनेपर ही रूप स्पर्शका समुदाय
ही प्रतीत सकेगा और उक्त कथनानुसार जब रूप स्पर्शका समुदाय प्रतीत
हो लेगा तभी एकाधारताकी प्रतीति होगी, इस प्रकार अन्योन्याश्रयदोष हो
जाता है। साथ ही अनवस्थादोषका भी प्रसङ्ग हो जाता है। क्योंकि
जिस प्रकार भूतलात्मक एक आधारके कारण आधेयभूत घटको रूप
स्पर्शादिका समुदायात्मक सिद्ध करते हो, उसी प्रकार भूतलको भी रूप
स्पर्शादिका एक समुदाय मानते हो, सो किस आधारको लेकर वह (भूतल)
[गुणगुणिभेदभङ्गवाद ३२१]
स्यापि समुदायत्वं किङ्कृतमित्यनुयोगानिवृत्तेः ।
अत एव नैककालतयाऽपि, तयोरेककालतायां प्रमाणा-
भावात् । भावे वा रासभकरभयोरप्येककालतया समुदायत्व-
प्रसङ्गः, भेदाग्रहस्य प्रकृतेऽप्यसंभवात् ।
अतएव नैककार्यतयाऽपि, उपादेयरूपस्यैककार्यस्याभा-
वात् । एकोदकाहरणलक्षणार्थक्रियेत्याद्यपि न युक्तम्, रूपा
समुदायात्मक बनेगा ? यह प्रश्न रह ही जाता है । इसी प्रकार उस
आधारको भी रूप स्पर्शादिका एक समुदाय होनेके लिये पुनः किसी अन्य
आधारकी अपेक्षा होगी । इस प्रकार आधार-कल्पनाका कहीं अन्त न
होनेसे अनवस्थादोष हो जायगा ।
इसीलिये एककाल होनेके कारण भी रूप-स्पर्शका समुदाय नहीं बन
सकेगा, क्योंकि रूप स्पर्शादिके एककालिक होनेमे कोई प्रमाण नहीं है ।
यदि वे कदाचित् एककालिक हों भी तथापि एककालिक होनेके कारण
समुदाय माननेपर रासभ और करभको भी एककालिक होनेके कारण
समुदायात्मक मानना पडेगा । यदि कहो कि—समुदायात्मक होनेके
लिये भेदाग्रह अपेक्षित है, परन्तु रासभ और करभमे भेदग्रह रहनेसे वे
समुदायात्मक नहीं हो सकते—तो रूप-रसादिमें भी भेदका अग्रह नहीं
है, इसलिये उनका भी समुदाय नहीं सिद्ध हो सक्ता । अर्थात् वे समु-
दायात्मक नहीं हो सक्ते हैं ।
इसीलिये एक कार्यताके कारण भी रूप रसादिका समुदाय असंभव
है । क्योंकि रूप-रस स्पर्शादिका कोई एक कार्य ( उपादेय ) तुम्हारे
या मेरे मतमे नहीं होता । अर्थात् रूपादिको उपादान मानकर इनसे
कोई एक उपादेय ( कार्य ) नहीं उत्पन्न होता है । यदि कहो कि—
रूपाद्दिका कोई एक उपादेयरूप कार्य भले ही न हो किन्तु घटके रूपमे
समुदित जो रूपरसादिक हैं, उनको निमित्त मानकर उनसे पानीका
लानारूप एक कार्य तो होता ही है—तो यह भी युक्त नहीं है । क्योंकि
तुम्हारे मतमें उदक ( पानी ) भी रूपादिसे अतिरिक्त कोई एक वस्तु
नहीं है । यदि कहो कि—इसीलिये रूप रस-गन्ध-स्पर्शात्मक जल ही
२१
१२२ आत्मतत्त्वविवेके
व्यतिरिक्तस्योदकस्यानभ्युपगमात्, एकैकस्यानेकाहार्यत्वे
प्रमाणाभावात्, समुदायस्य चासिद्धेः ।
अतएव नैककारणतयाऽपीति । निमित्तमन्तरेण तु समु-
दायव्यवहारेऽतिप्रसङ्गः । तृतीये न विवादः ।
नापि चतुर्थः, स हि विज्ञाननयमाश्रित्य वा स्यात् ?
द्विचन्द्रादिवद् विसंवादाद् वा ? आद्ये तु रूपादिषु कः
पक्षपातः ?
रूपाद्यात्मक घटके द्वारा लाया जाता है—तो यहाँ एक एक कर अर्थात्
केवलरूपात्मक जल या केवल रसात्मक, गन्धात्मक अथवा स्पर्शात्मक
जल रूप रस स्पर्शाद्यनेकात्मक घटका आहार्य ( आनेय ) नहीं हो सकता
है । क्योंकि जो रूपका कार्य है वह स्पर्शादिका कार्य कैसे हो सकता
है ? यदि कहो कि—एक एक कर नहीं किन्तु रूपादिसमुदायात्मक
जल रूपादिसमुदायात्मक घटका आहार्य होगा—तो यह भी नहीं हो
सकता । क्योंकि इसी समुदायकी सिद्धिके लिये तुम्हारा सारा प्रयास
चल रहा है और वह अभी सिद्ध ही नहीं हो सका है ।
इसीलिये एक कारणकी वजहसे भी रूपरसादिकोंका एक समुदाय
नहीं बन सकता है । क्योंकि रूप आदि चारोंका कोई एक कारण ही
नहीं है । उक्त परिस्थितियोंमें यदि बिना किसी निमित्तके ही रूपादिक।
समुदाय व्यवहार मानो तो अतिप्रसङ्गदोष हो जायगा । अर्थात् भिन्न-
कालीनों और भिन्नदेशीयोंमे भी समुदायव्यवहार होने लगेगा ।
यदि तृतीय पक्षका आश्रयण करते हुए दर्शन स्पर्शनके द्वारा रूपादि
गुणोंसे अतिरिक्त वस्तुका ग्रहण मानो तो उसमें मुझे कोई विवाद नहीं
है । क्योंकि वह वस्तु ही तो गुणातिरिक्त गुणी है ।
यदि चतुर्थ पक्षका आश्रयण करते हुए वस्तुरहित ज्ञानके आकार
विशेषको ही उक्त चाक्षुष एवं स्पार्शन प्रत्यक्षोंका विषय मानो तो वह
भी नहीं हो सकता है। क्योंकि वह भी क्या विज्ञानवादको लेकर होगा ?
या द्विचन्द्रादिके समान विसंवादी (अर्थशून्य) ज्ञान मानकर होगा ?
यदि प्रथम (विज्ञानवाद) को स्वीकार करो तो रूपादिगुणोंके प्रति
गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३२३
प्राप्तेरर्थक्रियास्थितेश्च न द्वितीयोऽपि । ते द्वे रूपादीना-
मिति चेत्, न तेषाम्, किन्तु तस्यैवेति किं न स्यात् ? बाध-
कादिति चेत्, न तावत् क्रमयौगपद्यविरोधो रक्तारक्तविरोधो
वा बाधकम्, निषिद्धत्वात्, क्षणिकपरमाणुरूपद्रव्येणाक्रा-
न्तेश्च । सम्बन्धाभाव इति चेत्, असम्बन्धस्तावदस्तु । कथं
तद्वत् प्रतीयत इति चेत्, तेषां तथोत्पादादिति परिहारोऽस्तु,
तत्रैव यथा शरीरं चेतनावदिति ।
क्यों पक्षपात है ? अर्थात् जैसे गुणी कोई वस्तु नहीं है, वैसे रूपादि
गुण भी कोई वस्तु नहीं हैं । इस प्रकार गुणीके साथ-साथ गुणोंका भी
विलोप ही तुम्हें मानना पड़ेगा ।
वस्तुकी प्राप्ति और उससे अर्थक्रिया ( प्रयोजनसिद्धि ) के होनेके
कारण द्वितीय पक्ष भी नहीं हो सकता है । यदि कहो कि—प्राप्ति और
अर्थक्रिया रूपादिगुणोंकी ही होती है—तो यहाँ यही क्यों न माना
जाय कि प्राप्ति और अर्थक्रिया रूपादिगुणोंकी नहीं होती है, किन्तु गुणी
द्रव्यकी ही होती है । यदि कहो कि—बाधकके कारण प्राप्ति और अर्थक्रिया
द्रव्यकी नहीं हो सकती—तो वह बाधक क्रमयौगपद्यका विरोधरूप या
रक्त-अरक्तका विरोधरूप नहीं हो सकता । क्योंकि इन दोनों बाधकोंका
पहले ही खण्डन किया जा चुका है । साथ ही जो स्थिर है, उसमें
क्रमयौगपद्यका विरोध तथा जो अवयवी होगा, उसमें रक्त अरक्तका
विरोध भले ही सम्भव हो किन्तु क्षणिक और निरवयव रूपादिगुण
वान् परमाणुमें ये दोनों ही बाधक नहीं हो सकते हैं ।
यदि कहो कि—गुणी तभी होगा, जब कि उसमें रूपादिगुण सम-
वाय सम्बन्धसे रहे । किन्तु यहाँ समवाय सम्बन्धका अभाव है । अतः
यही गुणी-द्रव्य होनेमें बाधक है—तो यहाँ सम्बन्धाभाव भले ही रहे,
इससे कोई क्षति नहीं है । यदि कहो कि—सम्बन्धके अभावमे रूपादि-
विशिष्टकी प्रतीति कैसे होगी ?—तो इसका उत्तर यही होगा कि रूपादि
गुणोंकी वैसी ही उत्पत्ति होती है, जिसमें सम्बन्धके बिना ही रूपादि-
विशिष्ट बुद्धि हो जाती है । जैसे, तुम्हें ही शरीरमें चैतन्यका समवाय
नहीं रहनेपर भी "शरीर चेतनावत्" यह प्रतीति होती है ।
३२४ आत्मतत्त्वविवेके
रूपादिभिरेव समस्तार्थक्रियासिद्धेः किं तदतिरिक्तद्रव्य-
कल्पनयेति चेन्न, तन्मात्रेणैव समस्तार्थक्रियासिद्धेः किं
रूपादिकल्पनयेत्यस्यापि वाचालवचसोऽवकाशप्रसङ्गात् । प्रती-
यमानत्वादिति चेन्, तुल्यम् ।
एतेनालीकविषयतापि निरस्ता ।
अभेदसाधनं बाधकमिति चेन्, किं तत् ? सहोपलम्भ-
नियम इति चेन्न, समसहोपलम्भनियमस्यासिद्धेः, पीतशङ्खोप-
लम्भादौ शैत्यानुपलम्भेऽपि शङ्खोपलम्भात् ।
यदि कहो कि—रूपादिगुणोंसे ही सम्पूर्ण अर्थक्रियायें (प्रयोजन)
सिद्ध हो जायेंगी, अत उनसे अतिरिक्त गुणी द्रव्यकी कल्पनाकी क्या
आवश्यकता है ?—तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि गुणातिरिक्त
द्रव्यसे ही समस्त अर्थक्रियायें सिद्ध हो जायेंगी, अतः रूपादिगुणोंकी
कल्पनाकी क्या आवश्यकता है ? ऐसा भी किसी वाचालको कहनेका
अवसर मिलने लगेगा। अर्थात् रूपादिगुणोंकी सत्ता भी लुप्त हो जायगी।
यदि कहो कि-गुणोंकी सत्ता तो उनकी प्रतीति होनेके कारण सिद्ध है—
तो वैसे ही गुणी द्रव्यको भी प्रतीति होती ही है, इसलिए द्रव्यकी भी
सत्ता सिद्ध ही है।
इससे पूर्वोक्त पञ्चम पक्ष भी खण्डित हो गया। अर्थात् उक्त चाक्षुष
और स्पार्शन प्रत्यक्ष यदि शशशृङ्गके समान अलीक (अत्यन्तासत्)
को विषय करें तो द्रव्यके समान ही रूपादिगुण भी अलीक ही हो
जायेंगे और गुणीके साथ-साथ गुणोंकी भी सत्ता लुप्त हो जायगी।
यदि कहो कि—अभेदका साधन ही गुणगुणिभेदका बाधक है—
तो वह (अभेदसाधन) क्या वस्तु है ? यदि कहो—गुण और गुणीकी
नियमत एक साथ उपलब्धि ही उनके अभेदका साधन है—तो यह नहीं
कह सकते। कारण, समानरूपसे नियमतः सहोपलब्धि असिद्ध है।
क्योंकि दोषवशात् जब पीतके रूपमें शङ्खकी उपलब्धि होती है,
तो वहाँ श्वेतगुणकी अनुपलब्धि होनेपर भी शङ्खद्रव्यका उपलम्भ
गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३९५
नासौ शङ्खः, किन्तु शङ्ख इव, तैमिरिककेशवदिति चेत् ,
-अहो गुणवद्विद्वेषः ! यत् तैमिरिककेशाः करतलपरामर्शनिय-
तार्थक्रिययोरपायान्न सम्भवन्तीति व्यवस्थापयति, इह तु
तत्सम्भवेऽपि शुभ्रतामात्रानुपलम्भादिति ।
व्यापकत्वादिति चेत्, वस्तुनोर्व्याप्तिः ? उपलम्भयोर्वा ?
आद्ये न विप्रतिपत्तिः । न च व्यापकानुपलब्धिमात्रेण व्याप्य-
तदुपलब्धी निवर्तेते, दहनानुपलब्धौ धूमतदुपलब्ध्योरपि
निवृत्तिप्रसङ्गात् । तत्रापि किं न परिकल्पयसि 'धूम इवासौ
होता है। इस प्रकार गुण और गुणीकी समनियत रूपसे सहोपलब्धिका
नियम कहाँ रहा ?
यदि कहो कि—पीतताकी प्रतीतिदशामे वह शङ्ख ही नहीं है, किन्तु
शङ्खजैसा है। जैसे कि तैमिरिक केश वास्तविक केश नहीं रहता है, किन्तु
तिमिर ही केशजैसा प्रतीत होता है—तो यह कैसा तुम्हारा गुणवान्से
विद्वेष है कि तैमिरिक केशोंकी सत्ता इसलिए नहीं है कि वे करतलसे
पकड़े नहीं जाते और केशों द्वारा होनेवाली प्रतिनियत अर्थक्रिया उनसे
नहीं होती है, ऐसी व्यवस्था तुम्हीं करते हो तथा यहाँपर उस शङ्खका
करतलसे परामर्श एवं उससे अर्थक्रियाके होनेपर भी केवल श्वेतताकी
उपलब्धि नहीं होनेके कारण शङ्खको असत् कह रहे हो।
यदि कहो—शुभ्रता शङ्खकी व्यापिका है। अर्थात् शङ्खमें शुभ्रता
अवश्य रहेगी, इसलिये दोषवशात् या जैसे भी हो शुभ्रताकी अनुपलब्धि
होनेपर शङ्खकी भी निवृत्ति हो जायगी, तो यहाँ व्याप्ति-सम्बन्ध शुभ्रता
-और शङ्ख इन दोनों वस्तुओं में मानते हो अथवा शुभ्रताकी उपलब्धि
और शङ्खकी उपलब्धिमे ? पहले पक्षमे तो हमे कोई विवाद नहीं है।
अतः व्यापककी निवृत्तिसे व्याप्यकी निवृत्ति भले ही हो किन्तु व्यापककी
अनुपलब्धि मात्रसे व्याप्यकी और उसकी उपलब्धिकी निवृत्ति नहीं हो
हो सकेगी। क्योंकि वैसा होनेपर अग्निकी अनुपलब्धि होनेपर धूमकी
और उसकी उपलब्धिकी निवृत्ति होने लगेगी। अथवा शङ्खके समान
वहां भी क्यों नहीं कल्पना करते हो कि अग्निके नहीं दीखनेपर भी जो
३६६ आत्मतत्त्व...
न धूम' इति, पावकवत्तानुपलब्धेरिति ।
तस्मान्न व्यापकानुपलब्धेर्व्याप्यनिवृत्तिः, किन्तु व्यापक-
निवृत्तेः। सा चात्रासिद्धेति वाच्यम् , तदेतत्तुल्यं प्रकृतेऽपि ।
उपलब्धेस्तु व्याप्तिरिहैव भग्ना, श्वैत्यानुपलम्भेऽपि शङ्खोप-
लम्भादित्युक्तम् ।
स्यादेतत्, पीत एव शङ्ख उत्पन्न इति चेन्न, पुरुषान्त-
रेण श्वेतस्यैवोपलब्धेः । नाप्यसम एव सहोपलम्भनियमो
धूम दिखाई पड़ता है, वह धूमजैसा है न कि वास्तविक धूम है।
क्योंकि वहां अग्निमत्ताकी उपलब्धि नहीं हो रही है।
इसलिये तुम्हें यही कहना होगा कि "व्यापककी अनुपलब्धि होनेसे
व्याप्यकी निवृत्ति नहीं हो जाती है, किन्तु व्यापककी निवृत्ति होनेसे ही
व्याप्यकी निवृत्ति हो सकती है। किन्तु यहां अग्निकी अनुपलब्धि भर
है, उसकी निवृत्ति (अभाव) तो असिद्ध है। अतः अग्निकी अनुप-
लब्धिमात्रसे धूमकी निवृत्ति नहीं होगी" तो यही बात शङ्खके सम्बन्धमें
भी समझो। अर्थात् श्वेतताकी अप्रतीतिमात्रसे शङ्खकी निवृत्ति नहीं हो
जायगी। यदि द्वितीय पक्षके अनुसार व्यापक और व्याप्यकी
उपलब्धियोंमें व्याप्ति सम्बन्ध कहो, तो यह व्याप्ति भी यहीं टूट गयी।
क्योंकि श्वेतताकी उपलब्धि नहीं होनेपर भी शङ्खकी उपलब्धि होती
है। यह बात पहले कही जा चुकी है।
यदि कहो कि—यही हो कि पाण्डुरोगकी दशामें श्वेत शङ्खकी
सचमुच ही निवृत्ति हो जाती है और वहीं नया ही पीला शङ्ख उत्पन्न
हो जाता है—तो यह नहीं हो सकता। क्योंकि दूसरे पुरुषको,
जिसे कि पाण्डुरोग नहीं हुआ है, वह उजला ही शङ्ख उपलब्ध
होता है।
यह भी नहीं हो सकता कि—गुण गुणीका समनियतरूपमें नहीं
किन्तु असमनियतरूपमें ही साथ साथ उपलब्धिका जो नियम है, वही
गुण गुणीमें अभेद-सिद्धिका हेतु है—क्योंकि यह नियम भी व्यभिचरित
हेतुः, अनैकान्तात् । अभास्वरं रूपं भास्वरेण सह नियमे-
नोपलभ्यते भिन्नं चेति ।
देशाविच्छेद इति चेन्न, असिद्धेः देहदेहिभ्यामनैका-
न्ताच्च । न तयोरविच्छेदस्तदनुपलम्भेऽप्युपलम्भादिति चेत् ,
तुल्यम्, रूपायनुपलम्भेऽपि तद्गतामुपलब्धेः ।
है । जैसे, घटका अभास्वर ( नहीं चमकनेवाला ) रूप आलोकके
भास्वर ( चमकनेवाले ) रूपके साथ ही नियमत उपलब्ध होता है,
फिर भी घटका रूप और आलोकका रूप परस्परमे अभिन्न नहीं बल्कि
भिन्न ही हैं ।
यदि कहो कि—सहोपलब्भ के साथ साथ देशका भी विच्छेद नहीं
होना चाहिये । इसलिये घटरूप और आलोकरूपका सहोपलम्भ होनेपर
भी उनका देश भिन्न भिन्न है । अर्थात् घटरूपका देश ( आश्रय ) घट
है और आलोकरूपका देश आलोक है । अत भिन्न देश होनेके कारण
सहोपलम्भ होनेपर भी घटरूप और आलोकरूप परस्पर अभिन्न नहीं
होंगे । गुण गुणीका तो सहोपलम्भके साथ साथ देश भी एक है, इस
लिये इनके अभेदमें कोई बाधा नहीं है—तो देशाविच्छेद भी यहाँ
असिद्ध है । क्योंकि गुणका देश ( आश्रय ) द्रव्य है और गुणीका
( द्रव्यका ) देश उसका अवयव है । इस प्रकार देशका विच्छेद (भेद)
होनेके कारण गुण गुणीमे अभेद नहीं सिद्ध हो सकेगा । एव, देशा-
विच्छेद हेतु भी देह देहीमे व्यभिचरित है । अर्थात् देह और देहीकी
एक देशमे प्रतीति होनेपर भी अप्रकाशात्मक देह भिन्न है और स्वप्रकाश-
ज्ञानात्मक देही भिन्न वस्तु है । इस प्रकार देशाविच्छेद होनेसे अभिन्न
होनेका नियम यहीं व्यभिचरित हो गया ।
यदि कहो कि—देह देहीको लेकर उक्त नियम व्यभिचरित नहीं
होगा, क्योंकि देह देहीमे अविच्छेद ही नहीं है । कारण, देहका
अनुपलम्भ होनेपर भी "अहम्" रूपमे स्वप्रकाशज्ञानात्मक देहीका
उपलब्ध होता रहता है, इसलिये इनमें भेद होनेपर भी हमारे पूर्वोक्त
नियममे व्यभिचार नहीं है—तो यह बात गुण गुणीके लिये भी तुल्य
है । क्योंकि रूपादिको अनुपलब्धि होनेपर भी आधारभूत गुणीकी
? No, it's डorइ! If it's इ: इhas a loop and tail at the bottom. Does this letter have a loop and tail? No! It just ends likeड! Wait, could it be ड र स े? -> डरसे! Wait, why डरसे? Wait! Look at the word before it: Is it दृष्ट्या? Wait! Look at the first letter of that word: Does IT have a vertical stem? Wait, look at: दृ? Wait, could the phrase be: दृष्टबाधाके डरसे? No, it's too short. Wait, what if the word is: दृष्टहानिके डरसे? No, it's: द ृ ष ्ट... wait, look at the letters: दृ ष्ट के डरसे? Look at the letters between अर्थात्andदेह`:
दृष्टया(orहा?वा?)
Wait, look at letter 3: it isयwithा? Orा`र
यहाँ पृष्ठ का देवनागरी में पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३८९
धर्मविरोध एव कोऽत्रेति चेत्, तदुपलम्भेऽप्यनुपलम्भः,
तदभिधानेऽप्यनभिधानं, तन्निषेधेऽप्यनिषेध इत्यादि। नील-
मुत्पलं चलतीत्यादौ च व्यावृत्तिभेदनिराकरणे पूर्वक एव
न्यायोऽनुसन्धेयः, अन्यत्रोपाधिभेदात्।
अभेदे च धर्मधर्मिणोर्दूरादूरवया ग्रहणे पट्वपटुनी कुतः?
यदि पूछो कि गुण गुणीमे विरोधी धर्म ही कहाँ हैं? तो यही
उत्तर होगा कि इनमें एकका उपलम्भ होनेपर भी दूसरेका अनुपलब्ध
होना, एकका कथन होनेपर भी दूसरेका अकथन होना तथा एकका
निषेध होनेपर भी दूसरेका अनिषेध होना आदि ही विरोधी धर्म हैं।
अर्थात् रूपगुणका ग्रहण नहीं होनेपर भी शङ्खका ग्रहण होता है, शङ्ख
कहनेपर भी उसका रूप नहीं कहा जाता तथा रूपका निषेध होनेपर भी
शङ्खका निषेध नहीं होता। ये सब बातें गुण गुणीके भेदपक्षमें ही
बन सकती हैं।
एवं, "नीलमुत्पलं चलति" यह व्यवहार होता है। इसमें गुण,
जाति और क्रियाका सामानाधिकरण्य सूचित होता है, और वह समान
अधिकरण द्रव्य ही है इस प्रकार गुणसे पृथक् गुणी द्रव्यकी सत्ता
सिद्ध होती है। यह नहीं कह सकते कि-उस व्यवहारमें अनीलादि-
व्यावृत्ति ही सूचित होती है-क्योंकि व्यावृत्तिविशेषके खण्डनमें पहले
ही बहुतसे न्याय दिये जा चुके हैं, उन्हें ही स्मरण करना चाहिये। हाँ,
जहाँ उपाधिविशेषसे विशिष्ट व्यवहार होता है, वहाँ अतद्व्यावृत्तिका
निराकरण नहीं करते। जैसे, कार्यत्व-उपाधिसे अवश्य ही अकार्यकी
व्यावृत्ति समझी जाती है तथा नित्यत्व उपाधिसे अवश्य ही अनित्यकी
व्यावृत्ति समझी जाती है।
एवं, धर्म और धर्मीमें यदि परस्पर अभेद है तो दूरसे किया
गया प्रत्यक्ष अपटु (अस्पष्ट) होता है तथा निकटसे किया गया प्रत्यक्ष
पटु (स्पष्ट) क्यों होता है? अर्थात् धर्मीके अधिकांश धर्मोंका ग्रहण
पटुत्व है तथा अल्प धर्मोंका ग्रहण अपटुत्व है। यदि धर्मी और
धर्म अभिन्न ही हैं तो धर्मीका ग्रहण तो दूर और निकट दोनों दशाओंमें
३३० आत्मतत्त्वविवेक
न च पुरुषभेदेन तथैवान्यस्योत्पादः, एकस्य द्वैरूप्याभावात् ।
न चान्यान्य एवासौ, एकदेशतया तत्त्वेन प्रतिसन्धानात् ।
न च सा भ्रान्ता, भिन्नदेशस्य तथाभूतस्य प्रत्यासीदताऽप्यनु-
पलम्भात् । न च निरालम्ब एव तदुपलम्भः, वृक्षादिदेश-
प्रतिनियमानुपपत्तेः ।
होता ही है, इसलिये उससे अभिन्न सभी धर्मोंका ग्रहण भी हो ही
जायगा । ऐसी स्थितिमें ज्ञानोंमें पटुत्व-अपटुत्वका भेद नहीं होना
चाहिये ।
यदि कहो कि—पुरुषभेदसे वृक्षादि वस्तु (धर्मी) ही किसी व्यक्ति
के लिये पटुरूपमें तथा किसी व्यक्तिके लिये अपटुरूपमें उत्पन्न हो जाती
है। अर्थात् पटुत्व-अपटुत्व वस्तुका धर्म है और उसका ग्राहक होनेसे
ज्ञानमें भी पटुत्व-अपटुत्वका व्यवहार हो जाता है । इसलिये एक ही
वस्तु निकटवर्ती पुरुषके प्रति पटरूपमें तथा दूरवर्ती पुरुषके प्रति अपटु-
रूपमें उत्पन्न होती है । अतः पटुत्वअपटुत्वका कारण धर्म-धर्मीका
भेद नहीं है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि एक वस्तु पुरुषभेदसे
भी दो नहीं हो सकती ।
यदि कहो कि—एक ही दो नहीं हो जाता, किन्तु एक पटु और
दूसरा अपटु, इसप्रकार भिन्न भिन्न दो वृक्ष ही पैदा होते हैं—तो यह भी
नहीं हो सकता । क्योंकि एक ही जगह पर अभिन्नरूपमें उस वृक्षकी
प्रत्यभिज्ञा होती है । अर्थात् निकट जानेपर जिसे दूरसे देखा था,
वही यह वृक्ष है, ऐसी प्रत्यभिज्ञा निकटस्थ व्यक्तिको होती है। यह
बात भी नहीं है कि एकदेशता की और अभिन्नता की प्रतीति भ्रमात्मिका
हो, क्योंकि दूरी और नजदीकीके कारण अपटु और पटु मालूम पड़ने
वाला भी वह वृक्ष निकटस्थ होनेपर भी भिन्न देशस्थ नहीं मालूम पड़ता
किन्तु उसी स्थानमें और वही मालूम पड़ता है । यह भी नहीं हो
सकता कि पटुत्व-अपटुत्वकी उपलब्धि निर्विषयक (शशविषाणज्ञानके
समान असद्विषयक) हो, क्योंकि वैसा होनेपर वृक्षादि-देशके साथ
पटुत्व-अपटुत्वका कोई प्रतिनियम नहीं बन सकेगा । अर्थात् नियतरूपसे
वृक्षादिमें ही पटुत्व-अपटुत्वकी प्रतीति होती है । सर्वथा निर्विषयक
गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३३१
न चाधिपतिप्रत्ययत्वात्तस्येति युक्तम्, अनुभवानां तद्-
देशोल्लेखानुरोधात् । उल्लेखे वा स एवालम्बनप्रत्ययः,
तावन्मात्रानुबन्धित्वादलम्बनव्यवहारस्य । न च देशोऽ-
स्त्वालम्बनं न तु वृक्षादिरिति साम्प्रतम्, अनुपलब्धविशेषतया
देशदेशिनोरविशेषात् ।
शशविषाणादि प्रतीतिमे तो पटुत्व अपटुत्वका कभी भान ही नहीं
होता है।
यदि कहो कि—वृक्षादिदेशके साथ नियतरूपसे होनेवाला पटुत्व-
अपटुत्वका उपलम्भ अनादिवासनारूप अधिपतिके कारण होता है।
सभी विकल्पोंका कारण होनेसे अनादिवासना ही अधिपति कही गयी
है। इसलिये वही प्रतिनियत देशमे पटुत्व-अपटुत्वके उपलम्भका प्रत्यय
अर्थात् कारण है—तो यह कथन भी युक्त नहीं है। क्योंकि अनुभवों
मे जब तुम प्रतिनियत देशका उल्लेख नहीं मानते हुए उन्हें निरालम्बन
कहते हो तो उससे होनेवाली वासनामे भी देशका उल्लेख नहीं हो
सकेगा। यदि अनुभवोंमें देशका उल्लेख मानो तो फिर वही आलम्बन-
प्रत्यय (विषय) सिद्ध हो गया। इसप्रकार वृक्षादि देश और उसमें
पटुत्व अपटुत्वका ग्रहण सिद्ध हो जाता है। अत पटुत्व-अपटुत्वज्ञान
को निरालम्बन (निर्विषयक) नहीं बता सकते हो। क्योंकि अनुभव-
का विषय होनेसे ही वस्तुमे आलम्बनत्व व्यवहार होता है।
यह भी कथन उचित नहीं है कि—पटु अपटु ग्रहणका विषय देश
ही है, वृक्षादि नहीं है—क्योंकि पटु अपटु ग्रहण वृक्षादिके समान ही
उस देशमे भी उसके विशेषधर्मोंकी उपलब्धि और अनुपलब्धिके कारण
ही होता है। अर्थात् देशमें भी दूरवर्ती व्यक्तिको विशेषधर्मोंकी
अनुपलब्धिके कारण अपटु (अस्पष्ट) तथा निकटवर्तीको विशेषधर्मोंकी
उपलब्धिके कारण पटु (स्पष्ट) ग्रहण होता है। यह बात भी तभी ही
हो सकती है, जब धर्म धर्मीमे भेद होगा। इस प्रकार देश
(भूतलादि) और देशी (वृक्षादि) दोनोंकी अविशेष (समान) ही
... है।
३३२ आत्मतत्त्वविवेके
न च दवीयांसोऽपि विशेषाः स्फुरन्त्येव न तु निश्चीयन्त
इति युक्तम्, न हि योगविमलाञ्जनधौतदृष्टेरन्यस्य ताराव्यूह-
गतयः प्रतिभान्तीति शक्यं प्रतिपादयितुम्।
अनिश्चयानुपपत्तेश्च। अनुभूतो ह्यात्मा न निश्चीयत
इत्यत्र हेतुर्वाच्यः। वासनानुद्भव इति चेन्न, निःशेषविशेष-
वन्तं धर्मिणमुपलभ्य विदूरवर्तिनस्तदखिलस्मरणेऽपि अनुभव-
व्यापारानुसारिनिश्चयानुदयात्।
यह भी कथन युक्त नहीं है कि—अतिदूरस्थ भी विशेषधर्म स्फुरित
(निर्विकल्पकज्ञानके विषय) होते ही हैं किन्तु निश्चय (सविकल्पकज्ञान)
भर नहीं हो पाता। अर्थात् ग्रहणोंमे पटु अपटुका विरोध नहीं है।
क्योंकि अपटु ग्रहण होता ही नहीं है। किन्तु सभी ग्रहण पटु (स्पष्ट)
ही होते हैं। इसलिये पटु अपटु ग्रहणके विरोधके आधारपर धर्म
(गुण) और धर्मी (गुणी) में भेदका साधन नहीं हो सकता है—
क्योंकि ऐसा प्रतिपादन नहीं किया जा सकता है कि योगरूपी निर्मल
अञ्जनसे जिनकी दृष्टि पवित्र हो चुकी है, ऐसे योगियोंके अतिरिक्त
दूसरे व्यक्तिको भी तारासमूहकी गतियोंका ज्ञान होता हो, केवल
निश्चय भर न होता हो। अर्थात् दूरवर्तीको विशेषधर्मोंका अग्रहण
होता ही है और वह ज्ञान भी अस्पष्ट होता ही है, इसमें सन्देह
नहीं है।
यह जो कहा कि-निर्विकल्पक ज्ञान तो होता है, किन्तु उस विषयका
सविकल्पात्मक निश्चय नहीं होता—तो यह अनिश्चय कहना भी अनुप
पन्न है। क्योंकि सूक्ष्म आत्माका अनुभव तो तुम्हें हो रहा है, किन्तु
उसका निश्चय नहीं होता, इसका कारण तुम्हें कहना चाहिये। यदि
कहो कि—सरकारका उद्बुद्ध न होना ही अनिश्चयका कारण है—तो
यह नहीं कह सकते। क्योंकि सम्पूर्ण विशेषधर्मोंके साथ धर्मीको
जान लेनेके बाद जब कोई व्यक्ति विशेष दूर चला जाता है, उस
अवस्थामें उसके सम्पूर्ण विशेष धर्मोंका स्मरण करा देने वाली वासनाके
उद्बुद्ध रहने पर भी पूर्वोक्त अनुभव-व्यापारके अनुसार निश्चय
गुणगुणिभेदभङ्गवाद ३३३
तथापि चानुभवकल्पनायां सर्वः सर्वदा सर्वं जानाति न'
तु निश्चिनोतीति किं न स्यात् ? भ्रान्तिवशात् तद्विपरीत-
विशेषनिश्चयेऽनुभूतविशेषाऽनिश्चय इति चेन्न, अनुभववैपरीत्ये
निश्चयस्य सर्वत्रानाश्वासप्रसङ्गात् । यत्र च विपरीतस्याप्य-
निश्चयस्तत्र का वार्ता ? यथा पराचीनैर्भागैरर्वाचीनानां संयोग-
( साक्षात्कारी ज्ञान ) नहीं होता है । अतः वासनाका उद्भव निश्चयका
हेतु नहीं हो सकता ।
एव अनुभवानुरूप निश्चय नहीं होनेपर भी यदि अनुभवकी कल्पना
की जाय तो यह भी क्यों न हो जाय कि-सभी सर्वदा सबको जानते
हैं, किंतु उसका केवल निश्चय भर नहीं करते । अर्थात् सभी सर्वज्ञ
हो जायेंगे । यदि कहो कि-अनुभवके बाद निश्चय होता ही है, यह
नियम नहीं हो सकता, क्योंकि अनुभवके अनन्तर भ्रमवश जहाँ विपरीत
निश्चय हो जाता है, वहाँ अनुभूत विषयका निश्चय नहीं होता है । जैसे,
शुक्तिविषयक निर्विकल्पक अनुभवके बाद रजतका भ्रमात्मक निश्चय
हो जानेपर शुक्तिविषयक सविकल्पक निश्चय नहीं होता-तो यह भी
नहीं कह सकते । क्योंकि अनुभव कुछ और निश्चय कुछ, इस प्रकार
निर्विकल्पक अनुभवके विपरीत भी सविकल्पक निश्चय हुआ करे तो
सर्वत्र निर्विकल्पक अनुभवोंके प्रति अविश्वास हो जायगा । क्योंकि
निर्विकल्पकके स्वय अतीन्द्रिय होनेसे उसकी कल्पनाका एकमात्र सवि-
कल्पक ही आधार होता है । इसलिये ज्ञापक ही जब विपरीत हो
जायगा तब उसके आधारपर अतीन्द्रिय निर्विकल्पकका ज्ञान कैसे हो
सकेगा ? अपने पक्षमे जो शुक्ति-रजतका दृष्टान्त दिये हो, वह उपयुक्त
नहीं है । क्योंकि रजतभ्रमस्थलमें शुक्तिका निर्विकल्पक अनुभव
पहले हुआ ही नहीं रहता है, बल्कि धर्मी-इन्द्रियके सन्निकर्ष होते
ही स्मर्यमाण रजतका एक ध एक विपरीत निश्चय ही उत्पन्न हो
जाता है ।
एव, जहाँ अनुभवानन्तर विपरीतका भी निश्चय नहीं हुआ, वहाँपर
अनुभवानुरूप निश्चयके नहीं उत्पन्न होनेका क्या हेतु बताओगे ? जैसे,
३३४ आत्मतत्त्वविवेके
विभागयोरिति ॥
॥ इति गुणगुणिभेदमङ्गवादः ॥
किसी पदार्थके परवर्ती भागोंके साथ अर्वाग्वर्ती भागोंका जो संयोग
विभाग होता है, वह प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष वस्तुवृत्ति होनेके कारण वायु
वनस्पतिके संयोग-विभागके समान अप्रत्यक्ष होता है तथा उसका
निर्विकल्पक ग्रहण तुम मानते हो, साथ ही वहाँ कोई विपरीत निश्चय
भी नहीं होता है । ऐसी परिस्थितिमें उस संयोग विभागका अनुभवानु
रूप निश्चय क्यों नहीं होता है ? अतः पूर्वोक्त अनुभवोंके द्वारा गुण
गुणिभेदके निश्चित हो जानेसे गुण गुणिभेदभङ्गके आधारपर आत्माकी
सत्ताका खण्डन नहीं किया जा सकता है ॥
इति गुण-गुणिभेदभङ्गवादनिरास
अथानुपलम्भवादः
अस्तु तर्हि नैरात्म्यम्, अनुपलब्धेरिति चेन्न—
सर्वदृष्टेश्च सन्देहात् स्वादृष्टेर्व्यभिचारतः ।
दृश्यत्वविशेषणान्नैवमिति चेन्न तदसिद्धेः । परोपगम-
अनुपलम्भवादका खण्डन
आशङ्का—पूर्वोक्त तीनों हेतुओंसे आत्माका अभाव भले ही सिद्ध
न हो सके फिर भी अनुपलब्धि हेतुसे ही आत्माका अभाव सिद्ध हो
जायगा । अर्थात् आत्मा नहीं है, क्योंकि उसकी उपलब्धि नहीं होती
है, जैसे उपलब्धि नहीं होनेसे शशविषाणका अभाव होता है ।
समाधान—अनुपलब्धिसे भी आत्माका अभाव नहीं सिद्ध हो
सकता है । क्योंकि यहाँ अनुपलब्धिसे सब व्यक्तियोंकी अनुपलब्धि
विवक्षित है ? अथवा पुरुषविशेष (बौद्धादि) की ? यदि प्रथमकल्प
हो तो अनुपलब्धि हेतु सन्दिग्धासिद्ध हो जायगा । क्योंकि सभीको
आत्माकी अनुपलब्धि है—यह निश्चय कैसे हो सकेगा ? कारण, दूसरेके
ज्ञान अज्ञानको दूसरा नहीं समझ सकता है । यदि दूसरा कल्प हो
तो वह भी ठीक नहीं है । क्योंकि, पुरुषविशेषकी अनुपलब्धि व्यभिचारी
है । अर्थात् व्यक्तिविशेषको अनुपलब्ध होनेसे भी वस्तुका अभाव
नहीं हो जाता है । कारण, सम्भव है, इन्द्रिय दोषादिके कारण उसे
उपलब्धि नहीं होती हो ।
यदि कहो कि—दृश्यत्व विशेषणके साथ अनुपलब्धिको हेतु मानने-
से उक्त व्यभिचारदोष नहीं होगा । अर्थात् प्रत्यक्षद्वारा देखने योग्य
होनेपर भी जिस वस्तुकी उपलब्धि नहीं होती है, उसका निश्चित ही
अभाव होता है—तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि तुम्हारे मतमें आत्मा-
का दृश्यत्व असिद्ध है । अर्थात् तुम आत्माको दृश्य नहीं मानते हो ।
यदि दृश्य मानो तो वह सिद्ध ही हो गया, उसका अभाव कहाँ हुआ ?